देखिए राज्यसभा में गूंजे ठहाकों का पूरा सच

कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी (Renuka Chowdhury) की हंसी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कटाक्ष किया, उसे खूब पसंद किया जा रहा है. सोशल मीडिया पर इसकी अनगिनत वीडियो क्लिप मौजूद हैं. लेकिन आखिर चौधरी ने ठहाके क्यों लगाए इसका जवाब आपको केवल आज का खबरी पर ही मिलेगा. देखिए सदन में लगे ठहाकों पूरी स्टोरी.

मोदीजी अब तो दिखा दीजिए 56 इंच का सीना

कश्मीर में आतंकवादी अस्पताल पर धावा बोलकर अपने साथी को छुड़ा ले गए. इस कवायद में दो पुलिसकर्मी शहीद हो गए. इससे ठीक पहले पाकिस्तान की तरफ से किए गए सीजफायर के उल्लंघन में कैप्टन कुंडू सहित चार जवान शहीद हो गए थे. सैनिकों की शहादत का सिलसिला पिछले कुछ वक़्त में तेज़ी से बढ़ा है, या यूं कहें कि मोदी (Modi) सरकार के कार्यकाल में जवान ज्यादा शहीद हुए हैं. बावजूद इसके सरकार ज़ुबानी कार्रवाई ही कर रही है. ऐसे में यह सवाल उठाना लाज़मी है कि वो 56 इंच का सीना कहां है, जिसका हवाला देकर नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तानी को मुंहतोड़ जवाब देने की बात कही थी. महज एक महीने में ही सैकड़ों सीजफायर उल्लंघन के मामले सामने आ चुके हैं और इसमें 10 सैनिकों सहित कई आम नागरिकों को जान गंवानी पड़ी है. सेना भले ही जवाब में गोलियां दाग रही हो, लेकिन क्या इससे नुकसान की भरपाई की जा सकती है? जिन घरों के चिराग हमेशा के लिए भुझ गए क्या वहां खुशियों के द्वीप जलाए जा सकते हैं? सेना की कार्रवाई महज ज़ख्मों पर फौरी मरहम भर है.

आप पहले किसी को खुद पर हाथ उठाने दें फिर उसके गाल पर उंगलियों के दो-तीन निशान बनाकर अपनी बहादुरी का डंका पीटने लगें तो इसे क्या कहा जाएगा? क्या यह पराक्रम है? इस सवाल का जवाब मोदी सरकार को खुद से पूछना चाहिए. महज यह कहकर कि सेना माकूल जवाब देगी हालात बदलने वाले नहीं हैं. देश को नरेंद्र मोदी और भाजपा से बड़ी अपेक्षाएं हैं. ऐसा इसलिए नहीं कि पिछली सरकार ने कुछ काम नहीं किया, बल्कि इसलिए कि दावे बहुत बड़े-बड़े किए गए थे. गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने कहा था कि पाकिस्तान हमारे सैनिकों के सिर काट रहा है और हमारी सरकार वहां के प्रधानमंत्री को चिकन बिरयानी खिला रही है. इसी तरह जब पाक सेना ने लांसनायक हेमराज समेत दो सैनिकों के सिर काट लिए थे तो लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा था कि पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई हो और एक सिर के बदले 10 सिर लाए जाएं. लेकिन अब तक भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है, तो हर तरफ ख़ामोशी है.

इस साल अब तक हमारे 4 जवान शहीद हो चुके हैं, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 83 था. थोड़ा और पीछे जाएं तो 2016 में हमने अपने 88 जवानों को खोया. 2015 में 41 जवान शहीद हुए और 2014 में 51. अगर मनमोहन सिंह और मोदी सरकार के तीन सालों की तुलना की जाए तो इस सरकार के कार्यकाल में जवान ज्यादा शहीद हुए हैं. अब क्या इसके लिए भी भाजपा नेता पिछली सरकार को कुसूरवार ठहराएंगे? जैसा कि वो हर मामले में करते रहते हैं.

अब समय आ गया है कि जिस आक्रामकता के साथ मोदी चुनावी रैलियों में पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात किया करते थे, वैसे ही कुछ निर्णय लिए जाएं. आक्रामकता से आशय प्रत्यक्ष युद्ध से नहीं बल्कि रणनीतिक एवं कूटनीति मोर्चे पर ठोस कदम उठाने से है. पाकिस्तान से बातचीत की जो कोशिश हो रही हैं केवल उन पर ही पूर्ण विराम नहीं लगाना चाहिए, बल्कि उससे सभी तरह के रिश्तों को अनंतकाल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया जाना चाहिए. तमाम बुद्धिजीवी पाकिस्तान से वार्ता बहाली पर जोर देते हैं, लेकिन क्या वास्तव में बातचीत की मेज़ पर यह मसला सुलझाया जा सकता है? भारत अब तक बात ही करता आया है, और यदि इससे हल निकलता तो अब तक निकल गया होता. पाकिस्तान जो भाषा समझता है, उसी भाषा में जवाब दिए जाने का समय आ गया है मगर देखने वाली बात यह होगी कि क्या 56 इंच का सीना कोई करामात दिखा पाता है?

क्या भाजपा के लिए ख़तरे की घंटी बज रही है?

कई विधानसभा चुनाव जीत चुकी भाजपा (BJP) यूँ तो मज़बूत नज़र आती है, लेकिन राजस्थान के उपचुनाव और मध्य प्रदेश के नगरीय निकाय चुनावों में मिली शिकस्त ने उसके माथे की लकीरों को गहरा कर दिया है. भले ही पार्टी नेता ऊपरी तौर पर इन पराजयों को ज्यादा महत्व न दे रहे हों, परंतु अंदर ही अंदर वह इसे लेकर चिंता और चिंतन की स्थिति में हैं. राजस्थान में दो विधानसभा और एक लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए. भाजपा को पूरी उम्मीद थी कि वह आसानी से यहाँ जीत दर्ज कर लेगी, लेकिन परिणाम इसके बिल्कुल विपरीत रहे. हालांकि इस हार को फिल्म पद्मावत के मुद्दे पर केंद्र एवं राज्य सरकार से खफा करणी सेना से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

राजपूत संगठनों ने पद्मावत और दूसरे मुद्दों को लेकर भाजपा को हराने का आह्वान किया था. करणी सेना का दावा है कि यह पहला मौका है जब राजपूत समाज ने भाजपा से अपना पुराना रिश्ता तोड़ा और उसके ख़िलाफ़ में मतदान किया. वैसा राजपूतों का भाजपा से मोह भंग होने का एक और कारण आनंदपाल एनकाउंटर भी है. पिछले साल 24 जून को हुए इस एनकाउंटर के चलते भाजपा और राजपूत समाज के रिश्तों में खटास पैदा हो गई थी. दरअसल, आनंदपाल रावणा राजपूत समाज का था और राजपूत खुद को रावणा समाज के निकट मानते हैं. इससे पहले कि पार्टी और राज्य सरकार इस खटास को दूर करने के लिए कुछ कर पाते संजय लीला भंसाली की फिल्म ने कोड़ में खाज का काम किया.

वहीं, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह की पकड़ कमज़ोर नज़र आने लगी है. नगरीय निकाय चुनावों में भाजपा को मिली हार ने कुछ हद तक जनता में सरकार के प्रति पनप रहे आक्रोश को उजागर किया है. शिवराज भी हार की गंभीरता को समझते हैं, शायद यही वजह है कि अब उनका धैर्य जल्दी टूटने लगा है. धार शहर के सरदारपुर कस्बे में एक चुनावी रैली के दौरान जिस तरह से उन्होंने अपने सुरक्षा गार्ड को धक्का दिया, उससे यह साफ़ हो जाता है कि शिवराज अत्यधिक दबाव में हैं. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि वह अमूमन शांत और बेफ़िक्र दिखने वाले नेता हैं. शिवराज पर आरोप है कि वह महज घोषणाओं में व्यस्त रहते हैं.

सत्याग्रह की एक खबर के अनुसार, प्रदेश कांग्रेस का तो आरोप है कि शिवराज सिंह अब तक करीब 12 हजार घोषणाएं कर चुके हैं. इनमें से तमाम योजनाएं प्रशासनिक-तकनीकी या वित्तीय कारणों से अधूरी ही अटकी पड़ी हैं. इस सिलसिले में प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता नरेंद्र सलूजा ने अपने अधिकृत ट्विटर अकाउंट से इसी 15 जनवरी को एक दिलचस्प तस्वीर भी साझा की थी. यह तस्वीर धार शहर में लगे एक पोस्टर की थी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े संगठन हिंदू जागरण मंच की ओर से लगाए गए पोस्टर में मुख्यमंत्री के लिए साफ़ संदेश था, ‘मुख्यमंत्री धार आ रहे हैं, आपका स्वागत है पर आपसे विनम्र निवेदन है कि कृपया कोई नया वादा न करें. पहले 14 वर्ष पूर्व किए गए वादे पूरा करें. 14 वर्ष का समय कम नहीं होता.’ इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपनों के बीच भी शिवराज को लेकर असंतोष पनप रहा है.

विधानसभा चुनावों के साथ ही अगले साल लोकसभा का चुनाव होना है, उस लिहाज से भाजपा के पास रूठों को मानाने का ज्यादा समय नहीं है. बात चाहे केंद्र की हो या राज्य सरकार की दोनों को लेकर मतदाताओं के मन में शंकाएं पैदा हो रही हैं और यदि इन शंकाओं को जल्द समाप्त नहीं किया गया, तो परिणाम घातक हो सकते हैं.

Union Budget: “जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया”

“जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया – जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया”…मोदी सरकार का आम बजट सुनने के बाद आम आदमी यही तराना गुनगुना रहा है. वैसे तो जीएसटी लागू होने के बाद बजट में सस्ते-महंगे की संभावना कम ही रह गई है. क्योंकि जीएसटी में वैट, एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स समेत एक दर्जन से ज्यादा अप्रत्यक्ष कर शामिल हैं. फिर भी उम्मीद की जा रही थी कि वित्तमंत्री महंगाई की मार झेल रही जनता को कुछ रहत देंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इसके अलावा टैक्स स्लैब में बदलाव की आस भी जेटली साहब की केतली से निकलने वाली भाप में उड़ गई. बजट में जहां, वेतनभोगियों को स्टैंडर्ड डिडक्शन के तहत 40 हज़ार की रियायत का ऐलान किया गया है, वहीं तेल पर एक्साइज ड्यूटी घटाकर पेट्रोल-डीजल के दामों में कमी लाई गई है. ये दोनों ही फैसले सुनने में अच्छे लगते हैं, लेकिन इनकी अच्छाई के असर को कम करने के लिए एक हाथ दे-एक हाथ ले वाले फ़ॉर्मूले को अमल में लाया गया है. वित्तमंत्री ने स्वास्थ्य, शिक्षा में सेस 1 फीसदी बढ़ाकर 3% से 4% कर दिया है. इस बढ़ोतरी का असर केवल स्वास्थ्य और शिक्षा पर ही नहीं बल्कि सभी क्षेत्रों पर पड़ेगा. इससे इनकम टैक्स भी एक फीसदी बढ़ जाएगा. इसके अलावा कस्टम ड्यूटी बढ़ाने से टीवी और मोबाइल जैसी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के साथ-साथ चप्पल-जूते भी महंगे होंगे. गौर करने वाली बात यह है कि जब पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने शिक्षा पर सेस लगाया था, तब यूपीए सरकार की आलोचना करने वालों में भाजपा भी शामिल थी. दूसरी तरफ सरकार ने वेतनभोगियों को मिलने वाली ट्रांसपोर्ट अलाउंस और मेडिकल रीइंबर्समेंट सुविधा को छीन लिया है. मौजूदा वक़्त में 15 हजार रुपए तक के चिकित्सा बिल और 19,200 रुपए तक के ट्रांसपोर्ट अलाउंस पर टैक्स छूट मिलती है. इस हिसाब से देखें तो, स्टैंडर्ड डिडक्शन की रियायत ऊंट के मुंह में जीरे के समान है.

क्यों नहीं मिला लाभ?
बजट में कॉर्पोरेट टैक्स में 5% की कटौती की गई है, लेकिन इनकम टैक्स में नहीं. अब इसे क्या कहा जाए यह समझना मुश्किल है. एक तरफ वित्तमंत्री कह रहे हैं कि इनकम टैक्स भरने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है, नोटबंदी जैसे फैसलों से सरकार को फायदा हो रहा है. तो आखिर इसका लाभ वेतनभोगियों और आम आदमी को नहीं मिलना चाहिए था? वित्तमंत्री ने मोदी सरकार के आखिरी पूर्ण बजट में 70 लाख नई नौकरियों का वादा किया है. मौजूदा वक़्त में नौकरियों को लेकर अच्छा माहौल नहीं है, इसलिए यह घोषणा सराहनीय है, मगर यह भी देखने वाली बात है कि आखिर पिछली घोषणाओं का क्या हुआ. सबसे पहले 2 करोड़ रोजगार सृजन की बात कही गई, फिर यह आंकड़ा एक करोड़ पर आया और अब 70 लाख. क्या सरकार को आभास हो गया है कि जो वादे उसने पहले किए थे, उन्हें पूरा कर पाना अब उसके बस में नहीं?

निवेश होगा प्रभावित
जेटली साहब ने शेयर बाज़ार और म्यूचुअल फंड्स से होने वाली कमाई पर भी सरकारी घेरा कस दिया है. दीर्घकालिक पूंजी लाभ (लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स) पर 10 फीसदी टैक्स की घोषणा की गई है, जबकि शॉर्ट टर्म कैपिटल टैक्स 15 फीसदी ही रहेगा. इस घोषणा के तुरंत बाद शेयर बाज़ार धड़ाम से नीचे आ गया, जो स्वाभाविक भी था. जानकारों का मानना है कि इस फैसले से निवेश में कमी आएगी. जो नए निवेशक शेयर बाज़ार में पैसा लगाने की सोच रहे थे, वे कोई दूसरी राह पकड़ सकते हैं. टैक्स सेविंग के लिए म्यूचुअल फंड में निवेश का चलन पिछले कुछ समय में बढ़ा है, जो अब प्रभावित हो सकता है.

क्या पूरी होंगी घोषणाएं?
बजट में किसानों और गरीब वर्ग को लुभाने के काफी प्रावधान किए गए हैं. सरकार की योजना 8 करोड़ महिलाओं को मुफ्त रसोई गैस देने की है. यह निश्चित तौर पर एक बेहतरीन फैसला है, क्योंकि इससे गरीब महिलाओं के जीवन स्तर में तो सुधार आएगा ही साथ ही पर्यावरण को होने वाले नुकसान को भी कम किया जा सकेगा. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकार इस पर होने वाले खर्चे की भरपाई कहां से करेगी? जायज सी बात है इसके लिए जनता पर ही अतिरिक्त बोझा बढ़ाया जाएगा. सब्सिडी जैसी सुविधाओं को लेकर जिस तरह का रुख मोदी सरकार का रहा है, उससे यह साफ़ हो जाता है कि सरकार अपने खजाने को खाली करके जनता को राहत पहुंचाने की सोच नहीं रखती. इसके अलावा सरकार ने 2022 तक हर गरीब को घर देने का लक्ष्य रखा है, महज चार सालों में क्या यह मुमकिन है? इस सवाल का जवाब शायद जेटली साहब के पास भी नहीं. इसी तरह 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने और प्रत्येक गरीब को 5 करोड़ का बीमा कवर देने का ऐलान सराहनीय तो है, लेकिन यह देखने वाली बात होगी कि इसे किस तरह अमल में लाया जाता है.

पेट्रोल सस्ता तो हुआ…पर हकीकत जानते हैं आप?

तेल के दामों में लंबे अंतराल के बाद कमी देखने को मिल रही है. इसकी वजह मोदी सरकार द्वारा एक्साइज़ ड्यूटी 2 रुपए घटाना है. सरकार ने एक तरफ जहां इस फैसले को जनहित में बताया, तो वहीं दूसरी तरफ यह भी जता दिया कि आम आदमी का ख्याल रखने के लिए उसे 26 हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान उठाना होगा. वित्त मंत्रालय ने इस बारे में एक बयान जारी करते हुए कहा, “यह निर्णय इसलिए लिया गया है ताकि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के बढ़ते दामों के असर से आम आदमी के हितों की रक्षा की जा सके.” इसी बयान में सरकारी खजाने पर पड़ने वाले असर को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि सरकार को एक्साइज़ ड्यूटी में कटौती से पूरे साल में 26 हज़ार करोड़ और मौजूदा कारोबारी साल में 13 हज़ार करोड़ रुपए का घाटा होगा.

घाटे पर जोर क्या?
घाटे पर ज्यादा जोर देकर सरकार कहीं न कहीं यह दर्शाना चाहती है कि आम आदमी के हितों के लिए वह किसी भी स्तर तक जाने को तैयार है. हालांकि, हकीकत यह है कि राजस्व की कुर्बानी के इस फैसले तक पहुंचने से पहले सरकार एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ा-बढ़ाकर पहले ही अपना खज़ाना भर चुकी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में कार्यभार संभालने वाली भाजपा (एनडीए) सरकार ने अब तक करीब 11 बार पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाया, जबकि कमी अब जाकर की गई है. यानी सरकार हर बार जनता की जेब से पैसा निकालकर अपनी झोली भरती रही, और जब एक बार जनता को कुछ देना पड़ा तो उसे घाटा याद आ रहा है.

लगातार भरा खज़ाना
2014 में जब भाजपा सत्ता में आई तो पेट्रोल पर एक्साइज़ ड्यूटी 9.48 रुपए थी, जो अब दो रुपए घटाने के बाद 19.48 रुपए प्रति लीटर पहुंच गई है. इसी तरह डीजल पर लगने वाली एक्साइज़ ड्यूटी में जबरदस्त इजाफा हुआ है. यह 3.56 से बढ़कर अब 15.33 रुपए प्रति लीटर हो गई है. इसके बावजूद सरकार यह जाहिर करने में लगी है कि उसे एक्साइज़ ड्यूटी घटाने से कितना नुकसान होगा.

व्हाट्स एप पर अफसरों की खबर ले रहे लोहानी

  • गैंगमैन के मुद्दे पर हर रोज़ मांगा जा रहा अपडेट

रेलवे बोर्ड की कमान संभालने वाले अश्विन लोहानी उन अफसरों में शुमार हैं, जिन्हें आदेश की तामील कराना बखूबी आता है. पदभार ग्रहण करने के साथ ही लोहानी ने अधिकारियों के घरों में चाकरी कर रहे रेलकर्मियों को उनकी सही जगह भेजने के निर्देश दिए थे. तब से अब तक इस मामले में कितनी प्रगति हुई है, लोहानी इस पर स्वयं नज़र रखे हुए हैं. इतना ही नहीं उन्होंने सभी महाप्रबंधकों और मंडल रेल प्रबंधकों का एक व्हाट्स एप ग्रुप भी तैयार किया गया है. जिस पर इस बारे में रोजाना अपडेट लिया जाता है. लोहानी ने रेल अधिकारियों को स्पष्ट कर दिया है कि वीआईपी संस्कृति बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

सूत्रों के मुताबिक, लोहानी ने व्हाट्स एप ग्रुप ख़ासतौर पर इसलिए तैयार किया है, ताकि अफसरों के घरों से कर्मचारियों को निकालने के काम में तेज़ी लाई जा सके. सभी महाप्रबंधकों और मंडल रेल प्रबंधकों से रोजाना इस बारे में जानकारी देने को कहा गया कि किस विभाग से कितने कर्मचारियों को उनकी यूनिट वापस भेजा गया.

समय के पाबंद हुए अधिकारी
अश्विन लोहानी के चेयरमैन बनते कि समय पर कार्यालय पहुंचने वाले अधिकारियों की संख्या बढ़ गई है. इसके साथ ही लंच के बहाने घंटों दफ्तर से बाहर रहने वाले रेलकर्मी भी समय के पाबंद हो गए हैं. पुणे मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, आसपास रहने वाले अधिकांश अफसर लंच करने घर जाते हैं. पहले वो घंटों बाद वापस लौटते थे, लेकिन अब लंच टाइम समाप्त होते ही वापस आ जाते हैं.

इनकी हिंदी देखकर आप भी शरमा जाएंगे

अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी जैसे हिंदी प्रेमियों की पार्टी भाजपा में ऐसे नेताओं की भी कमी नहीं है, जो अपने हिंदी के ज्ञान से अर्थ का अनर्थ कर रहे हैं. अब पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी को ही देख लीजिए. एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने जिन शब्दों में स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत का प्रचार किया, उसे देखकर हिंदी को भी शर्म आ जाएगी. ये तस्वीर आजकल सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है.

सांसद और वकील मीनाक्षी लेखी ने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से बॉटनी से बीएससी, दिल्ली विश्वविद्यालय से एल.एल.बी किया है. ये तस्वीर तब की है जब मंगलवार 27 जून को लेखी इंद्रप्रस्थ गैस लिमिटेड की तरफ से दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंची. इस कार्यक्रम में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेद्र प्रधान, केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन, दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी, सांसद उदित राज आदि भी मौजूद थे.

Source: Social Media

ट्रेनिंग के बजाए करवाते थे अफसरों की चाकरी, रेलकर्मी की मौत!

पुणे: दास प्रथा भले ही गुज़रे जमाने की बात हो गई हो, लेकिन रेलवे में यह अब भी मौजूद है. यहां कर्मचारियों को वो सब करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसका उनके ड्यूटी मैन्युअल से कोई नाता नहीं. अगर कोई कर्मचारी इसके खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे तरह-तरह से प्रताड़ित किया जाता है. हाल ही में इस प्रथा के चलते ब्रिजेश कुमार नामक रेलकर्मी की मौत हो गई. आरोपों के मुताबिक ट्रेनिग पर आए ब्रिजेश से मंडल रेल अधिकारी (डीआरएम) के बंगले की चाकरी करवाई जा रही थी.

मूलरूप से बिहार निवासी ब्रिजेश ट्रैक मैन की ट्रेनिंग के लिए पुणे आया था. लेकिन ट्रेनिंग के अलावा उससे दूसरे काम ज्यादा करवाए जाते थे, मृतक ने अपने परिजनों से कई बार इसका जिक्र भी किया था. ब्रिजेश की प्रताड़ना का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि वो नौकरी छोड़ने का मन भी बना चुका था, मगर पारिवारिक मज़बूरियों के चलते ऐसा नहीं कर सका.

खाना भी नहीं खाने दिया
जानकारी के मुताबिक 29 मार्च को ब्रिजेश सहित कुछ कर्मचारियों को संगम पार्क स्थित डीआरएम आवास लाया गया. यहां उनसे मोटी-मोटी लकड़ियों को दीवार के दूसरी तरफ फेंकने आदि काम करवाए जा रहे थे, तभी ब्रिजेश की तबीयत ख़राब हो गई. साथी कर्मचारी उसे रेलवे अस्पताल लेकर गए, जहां से दवाइयां देकर उसे वापस काम पर भेज दिया गया. हालांकि ब्रिजेश की तबीयत सुधरने के बजाए बिगड़ती गई और उसने 13 अप्रैल को हड़पसर स्थित नोबल अस्पताल में दम तोड़ दिया.   ब्रिजेश के एक सहकर्मी ने बताया कि उन्हें ट्रेनिंग के तुरंत बाद काम पर लगा दिया गया था, ब्रिजेश को तो खाना खाने का समय भी नहीं मिला था. पीड़ित पक्ष का कहना है कि डॉक्टरों ने मौत की वजह भूखे पेट अत्यधिक भारी काम करना बताई थी, हालांकि नोबल अस्पताल के अनुसार, मौत एक्यूट पैन्क्रियाटाइटिस और कई मल्टी ऑर्गन फेलियर से हुई. बहरहाल मौत की वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इतना साफ़ है कि ब्रिजेश और अन्य कर्मचारियों को नियम विरुद्ध काम करवाकर प्रताड़ित किया जा रहा था.

‘काम तो करना ही होगा’
ट्रेनिंग पर आने वालों को सीमेंट के बोरे ढोने से लेकर हर तरह से छोटे-बड़े काम करवाए जाते हैं, अधिकांश कर्मचारी ख़ामोशी से इसके लिए तैयार भी हो जाते हैं, क्योंकि वे अपनी नौकरी से हाथ धोना नहीं चाहते. ब्रिजेश के साथ ट्रेनिंग ले रहे एक कर्मचारी के मुताबिक, “वरिष्ठ अधिकारियों के स्पष्ट निर्देश हैं कि जो कहा जाएगा करना होगा. हमसे नौकरों की तरह काम करवाया जाता है. अधिकारी अपनी ज़रूरतों के हिसाब से हमारा इस्तेमाल करते हैं.”

रेलवे का इंकार
पुणे मंडल के जनसंपर्क अधिकारी मनोज झवर ने आरोपों से इंकार करते हुए कहा, “किसी भी कर्मचारी से इस तरह काम नहीं कराया जा सकता. जहां तक बात ब्रिजेश कुमार की है, तो उसे डीआरएम निवास लाया ही नहीं गया.”

पर पुख्ता हैं सबूत
रेलवे भले ही पूरे मामले से पल्ला झाड़ रहा हो, लेकिन कई कर्मचारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि ब्रिजेश और अन्य कर्मियों को घटना वाले दिन डीआरएम आवास पर काम करवाने लाया गया था. आज का खबरी के पास इस बातचीत की रिकॉर्डिंग भी मौजूद है. कर्मचारियों का यहां तक कहना है कि इंकार करने पर उन्हें न सिर्फ धमकी दी गई बल्कि यह भी कहा गया कि ये तो महज़ शुरुआत है.

सब जानते हैं अफसर
पुणे रेल मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि रेलवे में बड़े पैमाने पर कर्मचारियों का शोषण हो रहा है. खासकर निचले स्तर के कर्मचारियों को अफसरों के घरों में नौकर की तरह काम करवाया जाता है. कागजों पर कुछ दर्शाया जाता है और हकीकत कुछ और होती है. दिल्ली-मुंबई में बैठे वरिष्ठ अधिकारी भी इस दास प्रथा से वाकिफ हैं, लेकिन कुछ नहीं करते क्योंकि वे खुद भी किसी न किसी रूप में इसका हिस्सा हैं.

कैसे चलेगा घर?
ब्रिजेश घर में एकलौता कमाने वाला था, उसकी मौत के बाद परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट आ गया है. ब्रिजेश के दो छोटे भाई हैं. बेटे की मौत के बाद से मां सदमे में है और भाइयों का रो-रोकर बुरा हाल है. वैसे तो नियमानुसार ब्रिजेश के भाई को नौकरी मिलनी चाहिए, लेकिन वो  प्रशिक्षण अवधि में था, इसलिए इस पर संशय बना हुआ है. हालांकि इस संबंध में मनोज झवर ने कहा, ब्रिजेश की मौत ऑन ड्यूटी नहीं हुई है, फिर भी रेलवे उसके परिवार की सहायता के लिए हर संभव प्रयास करेगा.

कैसे सुरक्षित होगा सफ़र?
एक तरफ रेलमंत्री सफ़र को सुरक्षित बनाने पर जोर दे रहे हैं और दूसरी तरफ उन कर्मचारियों से वरिष्ठ अधिकारियों के घर की चाकरी करवाई जा रही है, जिन पर सफ़र को सुरक्षित बनाने की ज़िम्मेदारी है. ब्रिजेश ट्रैक मैन की ट्रेनिंग के लिए पुणे आया था. ट्रैक मैन सुरक्षित रेल सफ़र की महत्वपूर्ण कड़ी है, क्योंकि ट्रैक की देखरेख का ज़िम्मा उसी पर होता है. ऐसे में सवाल उठाना लाज़मी है कि क्या रेलवे वास्तव में सुरक्षित सफ़र के प्रति गंभीर है? यदि सरकार रेलवे में बदलाव चाहती है, तो उसे सबसे पहले इस दास प्रथा को ख़त्म करना होगा.

होनी चाहिए जांच
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष हर्षा शाह ने इस संबंध में कहा, अगर आरोप सही हैं, तो यह बेहद गंभीर मामला है. सेंट्रल रेलवे को इसकी निष्पक्ष जांच करवानी चाहिए. डीआरएम हो या कोई अन्य अधिकारी किसी को भी इस तरह कर्मचारियों से काम करवाने का अधिकार नहीं है.

सबके मन में बस गए हैं मोदी

  • बहुत कुछ कहती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत.

By Neeraj Nayyar

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा, पार्टी ने यहां 300 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है, जो कुछ वक़्त पहले तक शायद उसके लिए सपना ही थी. भाजपा की इस कामयाबी ने जहां यह साबित कर दिया है कि देश में नोटबंदी को लेकर मोदी के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, वहीं यूपी की जनता पर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने आरोपों की धार को भी कुंद किया है. 300 का आंकड़ा पार करना बताता है कि भाजपा को सभी वर्गों के वोट मिले, फिर चाहे वो हिंदू हों, मुस्लिम या दलित. इस चुनाव से पहले की बात करें तो यूपी की राजनीति हिंदू, मुस्लिम और दलित वोटों के बीच बंटी हुई थी, ये मानकर चला जाता था कि दलित बसपा का वोट बैंक हैं और मुस्लिम या अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस एवं सपा का. और देखा जाए तो इसमें कुछ गलत भी modiनहीं था, पिछले दो चुनावों को छोड़कर यदि हम देखें तो प्रदेश की जनता मिश्रित जनादेश ही देती आ रही थी. ऐसे में यह  कल्पना किसी ने नहीं की थी कि भाजपा बहुमत के आंकड़े को भी बौना कर देगी. ये जीत काफी हद तक 2014 के लोकसभा चुनावों का परिदृश्य प्रकट कर रही है, उस वक़्त भी भाजपा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.

सबसे बड़ा टेस्ट

भले ही पंजाब, मणिपुर या गोवा में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वो राजनीति के सबसे बड़े टेस्ट को पास करने में सफल रही है. भाजपा रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि उत्तर प्रदेश में उनकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है. इसलिए नरेंद्र मोदी ने बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा समय यूपी में ही बिताया. वैसे भी उत्तर प्रदेश में हर पांच साल में बदलाव की परंपरा है, इस लिहाज से भी सपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल था और मायावती के कार्यकाल में मूर्तियां बनवाने के अलावा ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं था, जिसे जनता याद रखे. सपा, बसपा और कांग्रेस केवल नोटबंदी की आंच में कमल को झुलसता देखने की उम्मीद पाले हुए थे. खासकर उत्तर प्रदेश में इस फैक्टर के काम करने की संभावना राजनीतिक पंडितों ने भी व्यक्त की थी, क्योंकि नोटबंदी के दौरान जान गंवाने वालों में यूपी की हिस्सेदारी ज्यादा भी. इसके अलावा एक निश्चित अवधि के बाद जब लोगों का धैर्य टूटने लगा तो उसके नकारात्मक प्रभाव भाजपा पर पड़ने के आशंका बलवती होने लगी. लेकिन नरेंद मोदी की यहां तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हाथ से फिसलती पारी को जीत की इबारत में तब्दील कर दिया. मोदी ने लोगों को समझाया कि नोटबंदी देशहित में क्यों ज़रूरी है और देशहित में परेशानियों की कोई जगह नहीं. यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर नोटबंदी के तुरंत बाद चुनाव होते तो शायद परिणाम कुछ जुदा देखने को मिलते.

मोदी को श्रेय

इस जीत का पूरा श्रेय मोदी (MODI) को दिया जाना चाहिए है, भले ही चुनाव सामूहिक प्रयासों से जीते जाते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने 2014 से लेकर अब तक जनता के बीच अपने जादू को बरकरार रखा है, वो कोई दूसरा नहीं कर सकता. मोदी तब भी जनता के मन में थे और अब भी. दूसरी तरफ यदि बात सत्ताधारी पार्टी की करें तो सपा के सारे समीकरण गलत साबित हुए. दरअसल अखिलेश के कार्यकाल में सपा ने खुद को एक वर्ग तक सीमित कर लिया था. अब इसे उनकी नासमझी कहें या अतिआत्मविश्वास कि वो यह मान बैठे थे कि समाज का बाकी वर्ग उनके कामों को तवज्जो देगा, वो काम जो कभी हुए ही नहीं.

UPबदली सोच

मायावती लेकर अखिलेश के कार्यकाल तक यूपी का कितना विकास हुआ, जनता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. यदि वास्तव में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बना होता तो नरेंद्र मोदी का जादू भी अखिलेश की साइकिल पंक्चर नहीं कर पता. बसपा को भी अब नए सिरे से अपनी राजनीति पर विचार करना होगा, एक बात तो तय हो गई है कि दलित भी अब इन जुमलों में विश्वास नहीं करता कि भाजपाकाल में उसका शोषण होगा, वरना बसपा महज 18 सीटों पर सिमटकर नहीं रह जाती. कांग्रेस के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि पंजाब, मणिपुर और गोवा उसकी झोली में आ गिरे.

सबके मन में बस गए हैं मोदी

  • बहुत कुछ कहती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत.

By Neeraj Nayyar

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा, पार्टी ने यहां 300 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है, जो कुछ वक़्त पहले तक शायद उसके लिए सपना ही थी. भाजपा की इस कामयाबी ने जहां यह साबित कर दिया है कि देश में नोटबंदी को लेकर मोदी के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, वहीं यूपी की जनता पर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने आरोपों की धार को भी कुंद किया है. 300 का आंकड़ा पार करना बताता है कि भाजपा को सभी वर्गों के वोट मिले, फिर चाहे वो हिंदू हों, मुस्लिम या दलित. इस चुनाव से पहले की बात करें तो यूपी की राजनीति हिंदू, मुस्लिम और दलित वोटों के बीच बंटी हुई थी, ये मानकर चला जाता था कि दलित बसपा का वोट बैंक हैं और मुस्लिम या अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस एवं सपा का. और देखा जाए तो इसमें कुछ गलत भी modiनहीं था, पिछले दो चुनावों को छोड़कर यदि हम देखें तो प्रदेश की जनता मिश्रित जनादेश ही देती आ रही थी. ऐसे में यह  कल्पना किसी ने नहीं की थी कि भाजपा बहुमत के आंकड़े को भी बौना कर देगी. ये जीत काफी हद तक 2014 के लोकसभा चुनावों का परिदृश्य प्रकट कर रही है, उस वक़्त भी भाजपा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.

सबसे बड़ा टेस्ट

भले ही पंजाब, मणिपुर या गोवा में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वो राजनीति के सबसे बड़े टेस्ट को पास करने में सफल रही है. भाजपा रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि उत्तर प्रदेश में उनकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है. इसलिए नरेंद्र मोदी ने बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा समय यूपी में ही बिताया. वैसे भी उत्तर प्रदेश में हर पांच साल में बदलाव की परंपरा है, इस लिहाज से भी सपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल था और मायावती के कार्यकाल में मूर्तियां बनवाने के अलावा ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं था, जिसे जनता याद रखे. सपा, बसपा और कांग्रेस केवल नोटबंदी की आंच में कमल को झुलसता देखने की उम्मीद पाले हुए थे. खासकर उत्तर प्रदेश में इस फैक्टर के काम करने की संभावना राजनीतिक पंडितों ने भी व्यक्त की थी, क्योंकि नोटबंदी के दौरान जान गंवाने वालों में यूपी की हिस्सेदारी ज्यादा भी. इसके अलावा एक निश्चित अवधि के बाद जब लोगों का धैर्य टूटने लगा तो उसके नकारात्मक प्रभाव भाजपा पर पड़ने के आशंका बलवती होने लगी. लेकिन नरेंद मोदी की यहां तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हाथ से फिसलती पारी को जीत की इबारत में तब्दील कर दिया. मोदी ने लोगों को समझाया कि नोटबंदी देशहित में क्यों ज़रूरी है और देशहित में परेशानियों की कोई जगह नहीं. यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर नोटबंदी के तुरंत बाद चुनाव होते तो शायद परिणाम कुछ जुदा देखने को मिलते.

मोदी को श्रेय

इस जीत का पूरा श्रेय मोदी (MODI) को दिया जाना चाहिए है, भले ही चुनाव सामूहिक प्रयासों से जीते जाते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने 2014 से लेकर अब तक जनता के बीच अपने जादू को बरकरार रखा है, वो कोई दूसरा नहीं कर सकता. मोदी तब भी जनता के मन में थे और अब भी. दूसरी तरफ यदि बात सत्ताधारी पार्टी की करें तो सपा के सारे समीकरण गलत साबित हुए. दरअसल अखिलेश के कार्यकाल में सपा ने खुद को एक वर्ग तक सीमित कर लिया था. अब इसे उनकी नासमझी कहें या अतिआत्मविश्वास कि वो यह मान बैठे थे कि समाज का बाकी वर्ग उनके कामों को तवज्जो देगा, वो काम जो कभी हुए ही नहीं.

UPबदली सोच

मायावती लेकर अखिलेश के कार्यकाल तक यूपी का कितना विकास हुआ, जनता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. यदि वास्तव में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बना होता तो नरेंद्र मोदी का जादू भी अखिलेश की साइकिल पंक्चर नहीं कर पता. बसपा को भी अब नए सिरे से अपनी राजनीति पर विचार करना होगा, एक बात तो तय हो गई है कि दलित भी अब इन जुमलों में विश्वास नहीं करता कि भाजपाकाल में उसका शोषण होगा, वरना बसपा महज 18 सीटों पर सिमटकर नहीं रह जाती. कांग्रेस के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि पंजाब, मणिपुर और गोवा उसकी झोली में आ गिरे.