मोदीजी अब तो दिखा दीजिए 56 इंच का सीना

कश्मीर में आतंकवादी अस्पताल पर धावा बोलकर अपने साथी को छुड़ा ले गए. इस कवायद में दो पुलिसकर्मी शहीद हो गए. इससे ठीक पहले पाकिस्तान की तरफ से किए गए सीजफायर के उल्लंघन में कैप्टन कुंडू सहित चार जवान शहीद हो गए थे. सैनिकों की शहादत का सिलसिला पिछले कुछ वक़्त में तेज़ी से बढ़ा है, या यूं कहें कि मोदी (Modi) सरकार के कार्यकाल में जवान ज्यादा शहीद हुए हैं. बावजूद इसके सरकार ज़ुबानी कार्रवाई ही कर रही है. ऐसे में यह सवाल उठाना लाज़मी है कि वो 56 इंच का सीना कहां है, जिसका हवाला देकर नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तानी को मुंहतोड़ जवाब देने की बात कही थी. महज एक महीने में ही सैकड़ों सीजफायर उल्लंघन के मामले सामने आ चुके हैं और इसमें 10 सैनिकों सहित कई आम नागरिकों को जान गंवानी पड़ी है. सेना भले ही जवाब में गोलियां दाग रही हो, लेकिन क्या इससे नुकसान की भरपाई की जा सकती है? जिन घरों के चिराग हमेशा के लिए भुझ गए क्या वहां खुशियों के द्वीप जलाए जा सकते हैं? सेना की कार्रवाई महज ज़ख्मों पर फौरी मरहम भर है.

आप पहले किसी को खुद पर हाथ उठाने दें फिर उसके गाल पर उंगलियों के दो-तीन निशान बनाकर अपनी बहादुरी का डंका पीटने लगें तो इसे क्या कहा जाएगा? क्या यह पराक्रम है? इस सवाल का जवाब मोदी सरकार को खुद से पूछना चाहिए. महज यह कहकर कि सेना माकूल जवाब देगी हालात बदलने वाले नहीं हैं. देश को नरेंद्र मोदी और भाजपा से बड़ी अपेक्षाएं हैं. ऐसा इसलिए नहीं कि पिछली सरकार ने कुछ काम नहीं किया, बल्कि इसलिए कि दावे बहुत बड़े-बड़े किए गए थे. गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने कहा था कि पाकिस्तान हमारे सैनिकों के सिर काट रहा है और हमारी सरकार वहां के प्रधानमंत्री को चिकन बिरयानी खिला रही है. इसी तरह जब पाक सेना ने लांसनायक हेमराज समेत दो सैनिकों के सिर काट लिए थे तो लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा था कि पाकिस्तान के खिलाफ जवाबी कार्रवाई हो और एक सिर के बदले 10 सिर लाए जाएं. लेकिन अब तक भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है, तो हर तरफ ख़ामोशी है.

इस साल अब तक हमारे 4 जवान शहीद हो चुके हैं, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 83 था. थोड़ा और पीछे जाएं तो 2016 में हमने अपने 88 जवानों को खोया. 2015 में 41 जवान शहीद हुए और 2014 में 51. अगर मनमोहन सिंह और मोदी सरकार के तीन सालों की तुलना की जाए तो इस सरकार के कार्यकाल में जवान ज्यादा शहीद हुए हैं. अब क्या इसके लिए भी भाजपा नेता पिछली सरकार को कुसूरवार ठहराएंगे? जैसा कि वो हर मामले में करते रहते हैं.

अब समय आ गया है कि जिस आक्रामकता के साथ मोदी चुनावी रैलियों में पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात किया करते थे, वैसे ही कुछ निर्णय लिए जाएं. आक्रामकता से आशय प्रत्यक्ष युद्ध से नहीं बल्कि रणनीतिक एवं कूटनीति मोर्चे पर ठोस कदम उठाने से है. पाकिस्तान से बातचीत की जो कोशिश हो रही हैं केवल उन पर ही पूर्ण विराम नहीं लगाना चाहिए, बल्कि उससे सभी तरह के रिश्तों को अनंतकाल के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया जाना चाहिए. तमाम बुद्धिजीवी पाकिस्तान से वार्ता बहाली पर जोर देते हैं, लेकिन क्या वास्तव में बातचीत की मेज़ पर यह मसला सुलझाया जा सकता है? भारत अब तक बात ही करता आया है, और यदि इससे हल निकलता तो अब तक निकल गया होता. पाकिस्तान जो भाषा समझता है, उसी भाषा में जवाब दिए जाने का समय आ गया है मगर देखने वाली बात यह होगी कि क्या 56 इंच का सीना कोई करामात दिखा पाता है?

Gujarat: विकास पर क्यों खामोश रहे मोदी?

अपने हर भाषण में विकास की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Gujarat चुनाव में विकास से बचते नजर आए. अपनी चुनावी रैलियों में उनका पूरा जोर कांग्रेस खासकर राहुल गांधी की कमजोरियों को रेखांकित करने पर ही केन्द्रित रहा. मोदी में आए इस बदलाव से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि गुजरात में इस बार भाजपा को नुकसान होने जा रहा है. कांग्रेस नेता मणिशंकर के “नीच” वाले बयान के बाद जिस तरह से मोदी ने अपने लिए इस्तेमाल हुए शब्दों की दुहाई दी और जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस के तार पाकिस्तान से जोड़े, उससे इन कयासों को बल मिलता है. जीएसटी आदि कई ऐसे मुद्दे रहे जिन्होंने गुजरात में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया और हार्दिक पटेल ने इस हवा की गति बढ़ाने का काम किया. बावजूद इसके भाजपा का पलड़ा कुछ हद तक भारी समझा जा रहा था, लेकिन पार्टी नेता और खासकर नरेंद्र मोदी के हावभाव देखकर अब यह लगने लगा है कि कांग्रेस की वर्षों की मुराद पूरी हो सकती है.

नयापन नदारद
गुजरात में मोदी के भाषण कांग्रेस की बुराई और राष्ट्रवाद, सेना, चीन, पाकिस्तान, भ्रष्टाचार और गुजराती अस्मिता के इर्द-गिर्द रहे. उन्होंने गुजरात में विकास की बात छेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और न ही बेरोजगारी, निवेश में कमी, लघु एवं मध्यम उपक्रमों की बर्बादी, स्थिर निर्यात एवं मूल्यवृद्धि जैसे मुद्दों पर बात की. कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा बार-बार विकास पर बात करने की चुनौती को भी मोदी ने नहीं स्वीकारा. मोदी के भाषण इस बार पारंपरिक राजनीति तक ही सिमटकर रह गए, उनमें कुछ नयापन नजर नहीं आया. उन्होंने खुद को गुजरात के बेटे के रूप में प्रोजेक्ट कर भावनात्मक आधार पर वोट मांगे. राजनीति का यह अंदाज़ 2014 के नरेंद्र मोदी के अंदाज़ से बिल्कुल अलग है. जो कहीं न कहीं यही इशारा करता है कि गुजरात के लिए भाजपा के पास कोई विकास मॉडल नहीं है.

बदली रणनीति
मोदी यह समझ गए हैं कि इस बार समीकरण अलग हैं. अच्छे दिनों के जो सपने उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान दिखाए थे, वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं. इसलिए विकास की बातों से बात बनने वाली नहीं है. शुरुआती मौकों पर जब स्वयं मोदी और अमित शाह की सभाओं से भीड़ कम होती चली गई और रैलियों में भाजपा के खिलाफ हुटिंग हुई, तभी पार्टी ने अपनी रणनीति को जाति-धर्म से जोड़ दिया. कभी अयोध्या के राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, तो कभी राहुल गांधी के धर्म का. हालांकि सभाओं में पहले जैसी भीड़ फिर भी न खिंच सकी. हालांकि जनता का फैसला आना अभी बाकी है, इसके बात ही तय होगा कि उसे भाजपा पसंद है या कांग्रेस.

बदलते गए नारे
अगर 2007 से अब तक की बात करें, जो 2017 के चुनाव में भाजपा किसी खास स्लोगन के साथ मैदान में नहीं आई है.

  • 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी का मुख्य नारा था आतंकवाद विरुद्ध राष्ट्रवाद. ये चुनाव गुजरात दंगों के कुछ महीने बाद ही हुए थे. सांप्रदायिक हिंसा के साये में एक भव्य गौरव यात्रा का आयोजन किया गया था, जिसमें गुजरात की गरिमा और सम्मान को चुनाव का केंद्र बिंदु बनाया गया था.
  • 2007 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ‘जीतेगा गुजरात’ नाम से स्लोगन जारी किया था. इस चुनाव में विकास के प्रति झुकाव देखा गया. कांग्रेस के लिए सोनिया गांधी का मौत के सौदागर वाला बयान नुकसानदायक साबित हुआ था.
  • 2012 में भाजपा ने एकमत गुजरात का नारा केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार की तरफ से गुजरात की गई अनदेखी के खिलाफ एकजुट होने के लिए बनाया गया।
म्यांमार पर मोदी की ख़ामोशी जायज

नीरज नैयर
आजकल रोहिंग्या मुसलमानों (Rohingya Muslim) का मुद्दा सुर्ख़ियों में है. यूं तो इसका प्रत्यक्ष तौर पर भारत से कोई नाता नहीं है, लेकिन सीमा पार से आ रहे शरणार्थियों ने इसे नई दिल्ली के लिए भी अहम् मुद्दा बना दिया है. दरअसल म्यांमार में अल्पसंख्यक माने जाने वाले रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ हिंसा का माहौल है, जिसके चलते वो दूसरे मुल्कों का रुख करने को विवश हैं. इस विवशता ने भारत सहित कई अन्य देशों के सामने शरणार्थियों की समस्या को जन्म दिया है और आने वाले दिनों में इस समस्या के गंभीर होने की आशंका है. क्योंकि इस तरह की घटनाएं चेन रिएक्शन जैसी होती हैं. रोहिंग्या मुसलमान अकेले म्यांमार (Myanmar) में ही नहीं हैं, श्रीलंका में भी वो अल्पसंख्यक जीवन व्यतीत कर रहे हैं. इसके अलावा चीन में भी जब-तब उइगुर मुस्लिमों के शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद होती रहती है. कुछ साल पहले वहां के हालात म्यांमार जैसे हो गए थे. माना जाता है कि रोहिंग्या मुसलमान 1400 ई. के आस-पास बर्मा (म्यांमार) में आकार बसे. उन पर अत्याचार का सिलसिला उस दौर से ही जारी है, जिसकी वजह से इस समुदाय का एक बड़ा तबका बांग्लादेश में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा है. रोहिंग्या मुस्लिमों को म्यांमार की नागरिकता भी प्राप्त नहीं है. संयुक्त राष्ट्र सहित कई देश म्यांमार के हालात पर चिंता जाहिर कर चुके हैं और इसके लिए सीधे तौर पर आंग सान सू ची की सरकार को दोषी ठहराया जा रहा है. इसके अलावा इन मुस्लिमों को पनाह देने की मांग भी लगातार उठ रही है.

बेमतलब के तर्क
भारत के अंदर भी बड़े पैमाने पर यह माना जा रहा है कि संकट की इस घड़ी में हमें रोहिंग्या का साथ देना चाहिए, हालांकि मोदी सरकार इसके लिए तैयार नज़र नहीं आती. प्रधानमंत्री मोदी जब बीते दिनों म्यांमार की यात्रा पर गए, तो संपूर्ण विश्व टकटकी लगाए देख रहा था कि वे रोहिंग्या समस्या पर वहां के शासकों से क्या बात करते हैं. इसलिए जब मोदी ने इस मुद्दे को अपने एजेंडे से बिल्कुल अलग रखा, तो उन पर सवाल खड़े किए जाने लगे. सिद्धार्थ वरदराजन जैसे वरिष्ठ पत्रकारों ने तो रोहिंग्या की मदद के लिए आगे न आने को मोदी और भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे से जोड़ डाला. ये बेहद दुःख की बात है कि बुद्धिजीवी कहा जाने वाला तबका भी आम लोगों की तरह हर मुद्दे को एक ही नज़रिए से देखने की मानसिकता से ग्रस्त है. इसमें कोई दोराय नहीं कि पिछले कुछ वक़्त में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के मामले बढ़े हैं, और इसके लिए हिंदूवादी एजेंडे को कुसूरवार माना जा रहा है. लेकिन रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या को क्या इसी चश्मे से देखना नासमझी नहीं?

हैं कुछ मजबूरियां
भारत सरकार यदि रोहिंग्या मुस्लिमों से दूरी बनाए हुए है, तो उसके कई वाजिब कारण हैं. यह मसला अगर देश की सीमा के भीतर का होता तो इस दूरी को जायज ठहराया जा सकता था, लेकिन यहां सरकार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने कूटनीतिक और आर्थिक हितों को भी ध्यान में रखना है. म्यांमार में प्राकृतिक ऊर्जा का भंडार है, जो भारत की उर्जा ज़रूरतों को बड़े पैमाने पर पूरा कर सकता है. इसके अलावा उत्तरपूर्वी राज्यों में सक्रिय उन आतंकियों के खिलाफ भी भारत को म्यांमार के साथ की ज़रूरत रहती है, जो छुप-छुप पर देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देते हैं. भारत की सबसे बड़ी समस्या चीन और म्यांमार के बीच बढ़ती नजदीकी भी है. चीन म्यांमार के सबसे बड़े समर्थक के रूप में उभरकर सामने आ रहा है. नोबल पुरस्कार विजेता मलाला ने जब रोहिंग्या मुस्लिमों पर अत्याचार के लिए बर्मा सरकार को कोसा, तो उनका विरोध करने वालों में चीन पहले नंबर पर था. 2006 में जब म्यांमार पर प्रतिबंध लगाने के लिए सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पेश किया गया था, तो चीन और रूस ने ही उसे वीटो किया था. 1993 में जब भारत ने आंग सान सू ची को नेहरू सम्मान से नवाज़ा था, तो बर्मा सरकार ने हमारे बागियों से शिकंजा ढीला कर लिया. इसी तरह 2001 में भारत के इस आरोप के जवाब में कि अल कायदा से जुड़े परमाणु वैज्ञानिक म्यांमार में छुपे हैं, वहां की सरकार ने तकरीबन 200 आतंकियों को मुक्त कर दिया था.

पहले विचार करें
म्यांमार के साथ भारत की सीमा 1300 किमी लंबी है. हमारा समस्याग्रस्त पूर्वोत्तर क्षेत्र म्यांमार से लगा हुआ है, ऐसे में यदि हमारा कोई कदम वहां की हुकूमत को नाराज़ करता है, तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं. वैसे गौर करने वाली बात यह भी है कि मानवाधिकारों की मूरत कही जाने वालीं आंग सान सू ची सत्ता में होने के बावजूद खामोश हैं. जो अत्याचार संपूर्ण विश्व को नज़र आ रहा है, वो उन्हें क्यों नहीं? राष्ट्रपति की कुर्सी पर भले ही वे विराजमान न हों, लेकिन सब जानते हैं कि सत्ता की बागडोर उन्हीं के हाथ है. ठीक वैसे ही जैसे कभी मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए सोनिया गांधी सत्ता संभाल रहीं थीं. ऐसे में भारत रोहिंग्या मुसलमानों को पनाह देकर या उनके समर्थन में आवाज़ उठाकर बेवजह म्यांमार से दुश्मनी मोल क्यों ले? इस मुद्दे पर नई दिल्ली की ख़ामोशी पूरी तरह जायज है, क्योंकि राष्ट्रीय हितों की कुर्बानी देकर वैचारिक लकीर का फ़कीर बनने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है.

‘सिंगल’ जीत रहे सिसायत का खेल

सियासत में आजकल सिंगल ही मिंगल कर रहे हैं. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विवादित भाषणों पर चर्चा छोड़कर यदि भाजपा के दिलचस्प पहलू पर नज़र डाली जाए, तो यह पता चलता है कि पार्टी में वही नेता ऊंचाइयों को छू रहा है जो अकेला है. अटल बिहारी वाजपेयी के बाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण नरेंद्र मोदी हैं, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी से होते हुए आज प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए हैं. भले ही उनकी शादी हुई थी, लेकिन राजनीति में पूरी तरह सक्रिय होने के बाद वे अकेले ही रह रहे हैं. इसी तरह आदित्यनाथ भी सिंगल हैं और मनोहर लाल खट्टर, सर्बानंद सोनेवाल भी.

सबसे बड़ा नाम
सोनेवाल इस समय असम के मुख्यमंत्री हैं और खट्टर हरियाणा के, इस हिसाब से देखें तो तीन राज्यों की कमान भाजपा के सिंगल नेताओं के हाथ है और देश ही मोदी के हाथ. वैसे अन्य पार्टियों के भी कई नेता हैं, तो अकेले रहकर सियासत के घोड़े को सरपट दौड़ा singleरहे हैं. इनमें ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी शामिल हैं. अगर जयललिता जीवित होतीं, तो उन्हें भी इस लिस्ट में जगह मिलती.

माया से उमा तक
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती भी अब तक कुंवारी हैं. मौजूदा संकट को छोड़ दें तो वे लम्बे समय से राजनीति में अपना लोहा मनवाती रहीं हैं. केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भी अब तक शादी नहीं की है. एक ज़माने में उमा भाजपा की फायर ब्रैंड नेता थीं और उनका कद पार्टी में बहुत बड़ा था. हालांकि विवादों के चलते भाजपा छोड़कर नई पार्टी बनाने के फैसले के चलते उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ा.

और राहुल भी कुंवारे
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी अब तक कुंवारे हैं, उनकी शादी की बातें ज़रूर चलीं मगर मामला उनसे आगे नहीं बढ़ा. राहुल इसलिए शादी नहीं करना चाहते क्योंकि वो अभी राजनीति में अपना भविष्य संवारना चाहते हैं. हालांकि उत्तर प्रदेश में पार्टी की हार के बाद उनके सिंगल होने को लेकर भो सोशल मीडिया पर काफी जोक बन रहे हैं.

विराट के इस अंदाज ने छुआ PM का दिल

विराट कोहली की सफाई की आदत ने PM नरेंद्र मोदी का दिल छू लिया है। इंदौर में प्रैक्टिस सेशन के दौरान कोहली ने मैदान पर बिखरा कूड़ा खुद साफ किया। मीडिया में यह खबर आते ही मोदी ने ट्वीट कर उनकी तारीफ की। मोदी ने लिखा, डियर कोहली, एक PMन्यूज चैनल पर मैंने आपको क्लीन इंडिया कैम्पेन से जुड़ा देखा, आपकी यह छोटी सी कोशिश सभी को प्रेरित करेगी। विराट ने इसका जवाब देते हुए लिखा, धन्यवाद सर! हम सभी इस देश को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं। आपसे मिली तारीफ से गर्व महसूस कर रहा हूं।

हम ही करेंगे
जब विराट मैदन से पानी की खाली बोतलें उठाकर ड्रम में डाल रहे थे, तो उन्हें देखकर स्टेडियम का स्टाफ भागकर उनके पास पहुंचा। लेकिन विराट ने उनसे ये कहते हुए कूड़ा उठाने को मना कर दिया कि जब गंदगी हमने फैलाई है तो हमें ही साफ करना होगा। मालूम हो कि टीम इंडिया ने गांधी जयंती पर इडेन गार्डन में सफाई की थी।

फिर कुछ ज्यादा बोल गए राहुल

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री को निशाना बनाने की चक्कर में फिर कुछ ऐसा बोल गए हैं, जिस पर बवाल होना लाजमी है। किसान यात्रा के अंतिम पड़ाव में दिल्ली पहुंचे राहुल ने नरेंद्र मोदी पर शहीदों के खून की दलाली खाने का आरोप लगाया। गौर करने वाली बात यह है कि राहुल ने भी सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पीएम मोदी की तारीफ की थी। किसानो को सम्बोधित करते हुए rahul-gandhiराहुल ने कहा, हमारे जवानों ने जम्मू कश्मीर में अपना खून दिया, जिन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक किया, आप उनके खून के पीछे छिपे हुए हैं। आप उनकी दलाली कर रहे हैं, जवानों ने अपना काम किया है, आप अपना काम कीजिए।

शहीदों का अपमान
इससे पहले, राहुल ने पीएम पर हमला बोलते हुए कहा कि मोदी जी ने सबसे वादा किया था कि बैंक अकाउंट में 15 लाख रुपए आएंगे, लेकिन उनका यह वादा झूठा निकला। यह देश मोदीजी से इंसाफ चाहता है, कहां हैं 15 लाख रुपए, कहां हैं उनके वादे? उन्होंने आगे कहा, आपने दो चीज जरूर की हैं, एक हिंदुस्तानी को दूसरे से लड़ाना और बांटना। वहीं, भाजपा ने राहुल के बयान को शहीदों का अपमान करार दिया है।

पूरी रात जागते रहे पीएम, पानी तक नहीं पिया

भारतीय सेना उधर पाकिस्तान में घुसकर आतंकियों का सफाया कर रही थी, इधर दिल्ली में प्रधानमंत्री की बेचैनी बढ़ रही थी। पीएम खुद पूरे अभियान पर नजर रखे हुए थे। जब तक सेना सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देकर वापस नहीं लौट आई तब तक पीएम न सोए, न ही उन्होंने एक बूंद पानी पिया। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरी रात टहलते हुए गुजारी। पीएम के साथ साथ सेनाध्यक्ष दलबीर सिंह, अजीत डोभाल को भी सेना के हर मूवमेंट की जानकारी थी। डीजीएमओ द्वारा पीएम modiको पल पल का अपडेट दिया जा रहा था। जब यह साफ हो गया कि सेना का अभियान सफल रहा, तब कहीं जाकर मोदी ने राहत की सांस ली।

एक हफ्ते से बन रही थी रणनीति
सेना कब, कहां और किस समय धावा बोलेगी यह पहले से ही तय था। एक हफ्ते से इस अभियान की रणनीति तैयार की जा रही थी। सूत्रों के मुताबिक, जब सेना को पीओके में आतंकियों की जमावड़े की पुख्ता जानकारी मिली तो सेनाध्यक्ष और रक्षामंत्री ने सबसे पहले पीएम को इससे अवगत कराया। पीएम ने कुछ चुनिंदा अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर कई राउंड बैठकें कीं। सारी संभावानाओं को तलाशा गया और नफे नुकसान के आकलन के बाद पीएम ने सेना को अभियान को अमल में लाने की मंजूरी दी।

आहत थे पीएम
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, उरी हमले के बाद से प्रधानमंत्री बेहद आहत थे और पाकिस्तान को इसका जवाब देना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए संबंधित अधिकारियों से सुझाव भी मांगे थे। कूटनीतिक स्तर पर पाक को घेरने की कोशिशों से मिली सफलता से पीएम खुश तो थे, लेकिन उन्हें कहीं न कहीं लग रहा था कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पड़ोसी को सख्त संदेश देने की जरूरत है। इसलिए जब पीओके में आतंकियों की मौजूदगी की खबर मिली तो पीएम ने संभावनाएं तलाशने के बाद सेना को सर्जिकल स्ट्राइक की अनुमति दे दी।

कॉमेडियन कपिल शर्मा ने बीएमसी अधिकारियों पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसा है। कपिल ने पीएम को ट्वीट करके पूछा है कि क्या यही उनके अच्छे दिन हैं। अपने पहले ट्वीट में कपिल ने कहा है, मैं करोड़ों रुपए kapilटैक्स भर रहा हूं। लेकिन इसके बाद भी मुझे मुंबई में अपना ऑफिस बनवाने के लिए घूस देनी पड़ेगी। पीएम को टैग करते हुए अपने दूसरे ट्वीट में कपिल ने कहा, क्या ये हैं आपके अच्छे दिन? कपिल के ट्वीट के बाद हरकत में आते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। कपिल की मानें तो बीएमसी अधिकारियों ने उनसे 5 लाख रुपए रिश्वत की मांग की। हालांकि उन्हांेने अब तक इसकी शिकायत दर्ज नहीं करवाई है।

पीएम को क्यों घेरा?
कपिल के ट्वीट को लेकर सोशल मीडिया पर मिलीजुली प्रतिक्रियाएं हैं। कोई इसे पब्लिसिटी स्टंट बता रहा है तो किसी ने करप्शन के खिलाफ आवाज उठाने के लिए उनकी तारीफ की है। हालांकि भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने इस मामले में प्रधानमंत्री को लाने के लिए कपिल पर निशाना साधा है। तिवारी ने कहा, कपिल को लिखित शिकायत करनी चाहिए। उन्होंने 15 करोड़ रुपए टैक्स भरा है, इसका मतलब उनकी कमाई लगभग 50 से 60 करोड़ रही होगी और इसका मतलब यही है कि उनके अच्छे दिन आ गए हैं। तिवारी ने आगे कहा कि देश में कई तरह की समस्याएं हैं और उन्हें केवल अपनी ही समस्या सूझ रही है।

tweet

ये वजह तो नहीं
कपिल पिछले काफी समय से नरेंद्र मोदी को अपने शो में बुलाने की कोशिशें कर रहे हैं। सार्वजनिक तौर पर कई पर वो अपनी अच्छा जाहिर भी कर चुके हैं, लेकिन पीएम की ओर से अब तक उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है। इसलिए माना जा रहा है कि रिश्वत के मामले में सीधे प्रधानमंत्री को खींचना कपिल की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। कपिल जानते हैं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मोदी काफी सख्त रुख रखते हैं, ऐसे में यदि वे उनके ट्वीट को गंभीरता से लेते हैं तो शायद आने वाले समय में मोदी के कपिल के शो में आने की संभावना बढ़ जाए।


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आरबीआई गर्वनर रघुराम राजन को निशाना बनाने वाले भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी को ही निशाने पर लेते हुए उनकी टिप्पणियों को अनुचित करार दिया। मोदी ने स्वामी को नसीहत देते हुए कहा कि पब्लिसिटी के शौक से देश का subramanian-swamy-modiभला नहीं होता। टीवी चैनल टाइम्स नाओ को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री ने कहा कि रघुराम राजन किसी से कम देशभक्त नहीं हैं। स्वामी के बारे में उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को व्यवस्था से ऊपर समझता है तो ये गलत है। गौरतलब है कि स्वामी ने राजन के साथ साथ वित्त मंत्रालय के सेक्रेटरी शक्तिकांत दास की भी आलोचना की थी। इतना ही नहीं स्वामी ने वित्तमंत्री को भी निशाना बनाया था।

जिम्मेदार बनें
जब मोदी से पूछा गया कि आपके सांसद ने रघुराम राजन के बारे में जो कहा था क्या वो उचित है, तो पीएम ने कहा ऐसे प्रचार की लालसा से देश का कोई भला नहीं होता। लोगों को जिम्मेदारी से अपना काम करना चाहिए। मालूम हो कि स्वामी ने राजन के बारे में कहा था कि वो मानसिक तौर पर पूरी तरह भारतीय नहीं है। मोदी की इस तल्ख रुख के बाद अब देखने वाली बात ये होगी कि क्या स्वामी खामोश बैठते हैं?

ये महंगाई कब थमेगी मोदी जी?

एक तरफ जहां नरेंद्र मोदी सरकार अपने दो साल पूरे होने का जश्न मना रही है, वहीं आम जनता सरकार से सवाल कर रही है कि ये inflationnमहंगाई कब थमेगी? पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि के बाद अब गैस सिलेंडर भी महंगा हो गया है। बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर के लिए अब आपको 21 रुपए ज्यादा देने पड़ेंगे। इसके अलावा हवाई यात्रा भी महंगी हो गई है। विमान ईंधन के मूल्य में 9 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी का असर टिकटों की कीमत पर पड़ना लाजमी है। आपको बता दें कि मंगलवार को पेट्रोल 2 58 और डीजल 2 26 रुपए प्रति लीटर महंगा किया गया था। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पेट्रोल के दाम और बढ़ाए जा सकते हैं।
नाकाम रही सरकार
सब्जियों और दाल की कीमत में बढ़ोत्तरी का सिलसिला थम नहीं रहा है। सरकार के लाख दावों के बावजूद महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। हालांकि ये बात अलग है कि आंकड़ों में महंगाई घटी है। यूपीए सरकार के कार्यकाल में महंगाई को लेकर तंज कसने वाली भाजपा अब तक इस मामले में नाकाम ही रखी है।