हर्षा शाह: रेलवे के नाम की जिंदगी

  • रेलमंत्री ने भी काम को सराहा

जून में पुणे और मुंबई के बीच दौड़ने वाली डेक्कन एक्सप्रेस का जन्मदिन मनाया गया. यूं तो हर साल ही इस मौके पर केक काटकर ख़ुशी बयां की जाती है, लेकिन इस बार का जन्मदिन कुछ ख़ास रहा, ख़ास इस लिहाज़ से कि पहली बार किसी रेलमंत्री ने न सिर्फ आयोजन को सराहा बल्कि उस हस्ती के सम्मान में कुछ शब्द भी कहे, जो असल मायनों में इस परंपरा की जननी है. 70 वर्षीय हर्षा शाह पिछले कई सालों से डेक्कन क्वीन का जन्मदिन मानती आ रही हैं, विशेष बात यह है कि इस आयोजन के सभी इंतजाम वो स्वयं करती हैं, मसलन, केक की व्यवस्था करना, अतिथियों को निमंत्रण भेजना. शुरुआत में यह आयोजन महज कुछ यात्रियों की मौजूदगी में केक काटने भर तक ही सीमित था, लेकिन अब पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर जैसी सम्मानित हस्तियां इसका हिस्सा बन रही हैं. वैसे बात केवल जन्मदिन मनाने की ही नहीं है, हर्षा का जीवन पूरी तरह से रेलवे के लिए समर्पित है. चाहे बात यात्रियों की शिकायत की हो, रेलकर्मियों की परेशानी की या फिर रेलवे में सुधार की, वो हर पल मुस्तैद रहती हैं. हर्षा की लोकप्रियता का आलम यह है कि उन्हें न केवल पुणे बल्कि सेंट्रल रेलवे का हर छोटा-बड़ा अधिकारी जानता है. स्थानीय मीडिया में वो ‘रेलवे वाली आंटी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं.

हर्षा का रेलवे से रिश्ता दशकों को पुराना है. बचपन में वो अपने पिता के साथ अक्सर पुणे-मुंबई के बीच अप-डाउन किया करती थीं. उस दौर के अनुभवों ने उनके मन में रेलवे के प्रति प्रेम जागृत किया, जो अब तक कायम है. हर्षा रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष और एकमात्र सदस्य भी हैं, इस ग्रुप की स्थापना उन्होंने ही की थी. यह ग्रुप न सिर्फ यात्रियों की आवाज़ बुलंद करता है, बल्कि रेल कर्मियों की समस्याओं से भी उच्च अधिकारियों को अवगत कराता है. उम्र के इस पड़ाव में भी हर्षा हर रोज़ पुणे रेलवे स्टेशन का एक चक्कर लगाना नहीं भूलतीं फिर चाहे आंधी आए या तूफान. शायद यही वजह है कि रेलकर्मियों में उनके प्रति सम्मान भी है और भय भी. भय इसलिए कि यदि उनका कोई गलत काम हर्षा की नज़र में आ गया, तो फिर बचना मुश्किल है.

अपने खर्चे पर सेवा
वैसे तो रेलवे में सुधार के नाम पर कई प्रवासों ग्रुप अस्तित्व में हैं, लेकिन यह हर्षा की निस्वार्थ सेवा ही है कि रेलमंत्री रहते हुए सुरेश प्रभु ने अपने वीडियो संदेश में उनकी सराहना की. रेलवे प्रवासी ग्रुप को किसी तरह की वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं होती, हर्षा अपने खर्चे से ही इसे चला रही हैं. रेल बजट के दिनों में हर्षा की सक्रियता काफी बढ़ जाती है. पुणे को नई ट्रेन दिलवाने या किसी ट्रेन के फेरे बढ़वाने के लिए हर्षा दिल्ली के चक्कर लगाने से भी गुरेज नहीं करतीं.

आवारा कुत्तों को दिया आसरा
वैसे हर्षा का प्यार केवल रेलवे तक ही सीमित नहीं है, उनके दिल में बेजुबान जानवरों के लिए भी अथाह प्यार है. उन्होंने अपने घर में 6 आवारा कुत्तों को आसरा दिया हुआ है, जिनकी वो अपने बच्चों की तरह देखभाल करती हैं. हर्षा को अगर सड़क पर कोई घायल जानवर दिख जाए तो उसका इलाज कराए बिना वो आगे नहीं बढ़तीं. उन्होंने रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स के डॉग स्क्वायड की बेहतरी के लिए भी काफी काम किया है. वो इस संबंध में अधिकारियों से लगातार बात करती रहती हैं. उनका कहना है कि काम के हिसाब से स्क्वायड में कुत्तों की संख्या कम है, और जब तक यह संतुलन बन नहीं जाता वो प्रयास करती रहेंगी.

 

दम तोड़ रहा था बेजुबान… मिली नई जिंदगी

यूं तो बेजुबानों की मदद के लिए तमाम संस्थाएं मौजूद हैं, लेकिन अक्सर जरूरत के वक्त कोई काम नहीं आता। या तो ऐसी संस्थाएं खुद को अधिकार क्षेत्र की सीमा में बांध लेती हैं, या फिर उनके पास मदद न करने के तमाम बहाने होते हैं। तस्वीर में दिखाई दे रहा कुत्ता कुछ दिनों पहले आज का खबरी के एक सदस्य को बेहद बुरी अवस्था में मिला। उसकी एक आंख लगभग खराब हो चुकी थी और वो खड़े होने की स्थिति में भी नहीं था। पॉमेरियन नस्ल के इस कुत्ते को उसका मालिक यहां छोड़ गया था,   शायद इसकी वजह कुत्ते की बीमारी रही हो। कुत्ता इस कदर सदमें में था कि उसने भूखा होने के बावजूद कुछ नहीं खाया। इस बारे में एनीमल वेलफेयर के लिए काम करने वाली संस्था पीपुल्स फॉर एनीमल्स को जानकारी दी गई, लेकिन उसने खुद सहायता करने के बजाए रेस्क्यू नामक संस्था से संपर्क करने को कहा। पीएफए के पुणे प्रमुख को वॉट्सएप पर कुत्ते की तस्वीर भी भेजी गई, जिसे देखने के बाद शायद उस इंसान का दिल भी पसीज जाता जिसे जानवरों से कोई प्यार नहीं, लेकिन उन्होंने तस्वीर को भी अनदेखा कर दिया।

मिला सहारा
रेस्क्यू संस्था से सीधे संपर्क का कोई साधन नहीं, जब तक ऑनलाइन फॉर्म भरकर, घायल जानवर की फोटो अपलोड करके उन्हें नहीं भेजते, जब तक नहीं मिल सकती। फिर भले ही घायल दम क्यों न तोड़ दे। सब तरफ से निराशा हाथ लगने पर पिंपरी चिंचवड़ महानगरपालिका के प्राणी विभाग प्रमुख डॉ गोरे को पूरी स्थिति से अवगत कराया गया। उन्होंने तत्काल पशुसंवर्धन शेती व वन प्रकल्प विकास संस्था से बात की और थोड़ी ही देर में मदद पहुंच गई। कुत्ते को जब अस्पताल पहुंचाया गया तो डॉक्टर भी उसकी हालत देखकर सकते में आ गए।

घर में दिया आसरा
कुत्ते ने कई दिनों से कुछ खाया नहीं था। अगर एक दो दिन वो इसी अवस्था में रहता था, उसकी मौत निश्चित थी। सबसे पहले उसे सलाइन चढ़ाई गईं और फिर आगे का उपचार शुरू किया। लगातार एक हफ्ते देखभाल के बाद कुत्ता अपने पैरों पर खड़ा होने लगा है। उसकी सेहत में तेजी से सुधार आ रहा है। पशुसंवर्धन संस्था के पास कोई शेल्टर नहीं है, इस वजह से संस्था के सुनील और उनकी बहन जयश्री घायल जानवरों को अपने घर में आसरा देते हैं।

मदद की दरकार
पशुसंवर्धन संस्था को उस रेस्क्यू किए गए कुत्ते सहित बाकी जानवरों की देखभाल और इलाज के लिए मदद की दरकार है। आज का खबरी ने कुछ पशु प्रेमियों की मदद से इस दिशा में कदम आगे बढ़ाया है, लेकिन मदद के दायरे को विस्तृत करने की जरूरत है ताकि बेजुबान जानवरों को जिंदगी थोड़ी आसान बन सके।

खाली कुर्सियां बयां कर रहीं नोटबंदी का दर्द

नोटबंदी को 4 हफ्तों से ज्यादा का समय गुजर चुका है, लेकिन हालात अब तक पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं। एटीएम के बाहर लोग अपने पैसे निकालने के लिए लाइन लगाकर खड़े हैं, वहीं बैंककर्मियों का ओवरटाइम भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। हाथ में notebandi1पैसा नहीं है, इसलिए खरीददारी कम हो रही है, जिसका उन छोटे विक्रेताओं पर सबसे ज्यादा पड़ रहा है जिन्हें रोज की कमाई से ही घर चलाना होता है। आलम ये है कि पूरे साल गुलजार रहने वाली चौपाटियां भीड़ को तरस रही हैं और होटलों के धंधे भी मंदे पड़े हैं। नए साल के मौके पर पार्टियों से साल भर की कसर पूरी करने वाले आयोजकों को भी डर सता रहा है कि कहीं 2017 का आगाज उन्हें खाली जेब से न करना पड़े।

नोटबंदी के बाद से सरकार हालात सामान्य होने के दावे कर रही है। प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री तक का यही मानना है कि गाड़ी पटरी पर लौट आई है। जबकि हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत है। आम जनता को न तो बैंक से पैसे मिल रहे हैं और न ही एटीएम से। बैंक ऑफ इंडिया जैसे कई सरकारी और निजी बैंकों के अधिकांश एटीएम स्थायी रूप से बंद पड़े हैं। जिन एटीएम में कैश होता भी है, वो चंद मिनटों में खाली हो जाते हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को उठानी पड़ रही है जो कैशलैस सुविधा के साथ सहज नहीं है। इसमें वो छोटे विक्रेता भी शामिल हैं, जो ठेले आदि पर सामान बेचकर अपना घर चला रहे हैं।

बदल गए हालात
पुणे के पिंपरी चिंचवड़ स्थित जीजामाता उद्यान नोटबंदी से पहले तक हर रोज सैलानियों की भारी भीड़ का गवाह बनता था। इसकी एक वजह यहां मौजूद चौपाटी भी है, जहां लोगों को अपेक्षाकृत कम दाम में खाने की विभिन्न वैराइटी उपलब्ध हो जाती हैं। लेकिन 9 नवंबर से हालात यहां के हालात काफी हद तक बदल गए हैं। जो दुकानें रात 10 बजे तक खुली रहा करती थीं, उनके शटर अब 9 बजे से पहले ही गिर जाते हैं। वीकेंड पर भी पहले वाली भीड़ नजर नहीं आती। दुकानदार बताते हैं कि इतनी विकट स्थिति का notebandiसामना उन्होंने पहले कभी नहीं किया। इस चौपाटी से चंद कदम की दूरी पर ही भाजपा विधायक लक्ष्मण जगताप का आलीशान बंगला है। दुकानदार बंगले की चकाचौंध को देखते हैं और फिर मायूस होकर आगे बढ़ जाते हैं। एक दुकानदार ने कहा, एक महीना होने का आ गया, हमारा धंधा पहले की तरह होने का नाम ही नहीं ले रहा है। हर रोज इसी आस में दुकान खोलते हैं कि शायद अच्छी हो, लेकिन मायूसी ही हाथ लगती है। एक हफ्ते में जितनी बिक्री हो जाया करती थी, वो पिछले 23 दिनों में भी नहीं हो पाई है। समझ नहीं आ रहा कि किराया कैसे निकालें और घर का खर्चा कैसे चलाएं?

क्या वो परेशान हैं?
दुकान बंद करके जा रहे एक अन्य विक्रेता ने कहा, नेता कहते हैं कि नोट बंद होने से केवल वही लोग परेशान हैं, जिन्होंने गलत तरीके से पैसा कमाया है। क्या मुझे देखकर आपको ऐसा लगता है? पहले इतना काम रहता था कि मेरी पत्नी और बेटा भी दुकान पर आते थे, लेकिन अब एक व्यक्ति के लिए भी काम नहीं है। लोगों के पास पैसा ही नहीं है तो खर्च कैसे करेंगे। अगर ऐसा ही कुछ दिन और चला तो पता नहीं क्या होगा।

क्या नेताओं को फर्क पड़ा?
उद्यान बाहर छोटे बच्चों को घुमाने के लिए खिलौना कार की भी व्यवस्था की। आसपास के रहने वाले लोगों ने कुछ ऐसी कारें खरीदी हैं, जो शाम के वक्त उन्हें उद्यान लेकर पहुंच जाते हैं। पांच मिनट तक बच्चे को घुमाने के पांच रुपए शुल्क लेने वाले यह लोग भी नोटबंदी के चलते संकट में हैं। एक महिला ने कहा, पहले कुछ घंटों में ही 500 600 तक कमाई हो जाती थी, लेकिन अब 100 रुपए भी जुटाना मुश्किल हो गए हैं। लोग पार्क में अपने बच्चों को लेकर आते तो हैं, लेकिन कार में नहीं घुमवाते। हम अपनी मुश्किल जाकर किस से कहें। न नेताओं को कोई फर्क पड़ा है और न अमीरों को।

13 दिनों से नहीं मिली छुट्टी!

एटीएम के बाहर कतार में खड़े लोगों की निगाहें एटीएम में कैश भरने वालों पर टिकी थीं। 100-100 के नोटों की गड्डियों को एक एक करके ट्रे में भरा जा रहा था। आम दिनों में नोट भरने की इस प्रक्रिया को लोगों की निगाहों से बचकर अंजाम दिया जाता है। लेकिन अब इसे वक्त की नजाकत कहें या मजबूरी की सबकुछ खुलेआम हो रहा है। नोटबंदी के फैसले के बाद से अब तक कैश atmफिलिंग के काम में लगी कंपनियों के अधिकतर कर्मियों को एक छुट्टी भी नसीब नहीं हुई है। आलम ये है कि देर रात तक काम करने के बाद उन्हें अलसुबह फिर काम पर निकलना पड़ता है। उनके पास न तो ठीक से सोने का समय है और न ही अपने परिवार की खैर खबर लेने का वक्त।

बैठे-बैठे सो जाते हैं
पुणे में एसबीआई के एटीएम में कैश फिलिंग काम करने वाली कंपनी एसएसवी के एक कर्मचारी ने कहा, 9 नवंबर से हमें कोई छुट्टी नहीं मिली है। पहले पूरे दिन में जहां 3 से 4 फेरे होते थे, वहीं अब इनकी संख्या 10 से ज्यादा हो गई है। पिछले 13 दिनों में एक दिन भी ऐसा नहीं गया, जब ठीक से सोने का वक्त मिला हो। घर के जरूरी काम भी अटके पड़े हैं। थकान इतनी ज्यादा है कि गाड़ी में बैठे बैठे ही नींद आ जाती है। बाकी लोगों की तरह हम भी यही उम्मीद कर रहे हैं कि स्थिति जल्दी से सामान्य हो, ताकि हमें भी अपने घर परिवार के लिए वक्त मिल सके।

वो भी नसीब नहीं
atmएक अन्य कर्मी ने कहा, नोटबंदी के बाद से हमारा काम दोगुना हो गया है। हमें दिन में कई बार एटीएम में कैश भरना होता है। एक एटीएम से दूसरे एटीएम तक पहुंचने में जो समय लगता है, बस वही हमारा आराम का समय है। हालांकि ड्राइवर को तो वो भी नसीब नहीं होता। लगातार काम के चलते सब इतने थक गए हैं कि कई बार कैश फिलिंग के वक्त सुरक्षा गाइडलाइन को भी नजरअंदाज करना पड़ता है।

बहुत परेशानी
बैंक ऑफ महाराष्ट्र के एटीएम में कैश फिलिंग करने वाले एक कर्मचारी के मुताबिक, हालात ऐसे हैं कि इमरजेंसी में भी हम छुट्टी नहीं ले सकते। मेरे कुछ साथी हैं, जिनके बच्चे छोटे हैं और उनकी देखरेख के लिए घर में कोई नहीं। वो सबसे ज्यादा परेशानी में हैं। कम से कम जरूरतमंद कर्मियों को भी छुट्टी मिलनी चाहिए। नोटबंदी का फैसला अच्छा है या बुरा, इतनी समझ तो मुझमें नहीं है, मैं तो बस इतना जानता हूं कि हमारा काम बहुत बढ़ गया है।

मनमानी का हथियार
पीएनबी के एटीएम में कैश भरने वाली कंपनी के एक कर्मचारी ने कहा, हालत देखकर आपको हमारी थकान का अंदाजा हो गया होगा। देश के लिए हम 13 क्या 30 दिन भी लगातार काम करने के लिए तैयार हैं, लेकिन क्या हमारी परेशानियों पर गौर नहीं किया जाना चाहिए। कई ऐसे कर्मचारी हैं, जिन्हें पारिवारिक दायित्व निभाने के लिए छुट्टी चाहिए उन्हें भी देश का हवाला देकर चुप कराया जा रहा है। मोदीजी ने तो अच्छा ही निर्णय लिया है, बस कुछ लोग उसे मनमानी का हथियार बना रहे हैं।

निजी यात्रा पर लुटाई रेलवे की कमाई!

-शिर्डी, भीमाशंकर दर्शन के लिए स्पेशल कोच लेकर पहुंचे रेलवे बोर्ड चेयरमैन 
-सरकारी खर्चों में कटौती की पीएम की पहल का उड़ाया मजाक
-दौरे को आधिकारिक नाम देने की कोशिश में जुटा रेलवे.
एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकारी खर्चे में कटौती की बात कर रहे हैं, ताकि देश के विकास पर ज्यादा ध्यान दिया जा सके। वहीं रेल अधिकारी उनकी कोशिशों पर पलीता लगाने में जुटे हैं। हाल ही में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन (सीआरबी) एके मित्तल railनिजी यात्रा पर पुणे आए थे, लेकिन सरकारी सुख सुविधाओं का दोहन करने के लिए उसे आधिकारिक दौरे का रूप दिया गया। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, सीआरबी की यह यात्रा पूरी तरह से निजी थी। वे पहले शिर्डी गए फिर अष्टविनायक के दर्शन के लिए पुणे आए। उन्होंने न तो कोई निरीक्षण किया और न ही कोई बैठक ली। जबकि इस कवायद में रेलवे के लाखों रुपए जरूर खर्च हो गए। वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है, रेल अधिकारी अक्सर अपनी निजी यात्राओं को आधिकारिक रूप देकर इसी तरह घाटे में चल रहे रेलवे की कमर तोड़ते रहते हैं।
ऐसा था कार्यक्रम 
सीआरबी आठ अक्टूबर को अपनी स्पेशल कोच ;सैलूनद्ध में सवार होकर दिल्ली से कोपरगांव के लिए निकले। उनकी कोच को 12628 एक्सप्रेस में अटैच किया गया था। कोपरगांव से वह सीधे शिर्डी दर्शन के लिए चले गए। 10 अक्टूबर को 12150 एक्सप्रेस से अपने सैलून में कोपरगांव से पुणे के लिए रवाना हुए। पुणे पहुंचने के बाद सीआरबी अपने काफिले के साथ सबसे पहले भीमाशंकर के दर्शन के लिए गए। दूसरे दिन उन्हें अष्टविनाक के दर्शन के लिए जाना था। लेकिन पारिवारिक कारणों के चलते उन्हें बीच में ही दिल्ली वापस लौटना पड़ा। इस छह दिनों के टूर को आधिकारिक बनाने के लिए आखिरी दिन पुणे में रेल अधिकारियों की बैठक बुलाई गई थी। तय कार्यक्रम के मुताबिक सीआरबी को 13 अक्टूबर को 12779 एक्सप्रेस से निजामुद्दीन लौटना था।
पानी की तरह बहाया पैसा
सीआरबी की निजी यात्रा पर रेलवे ने पानी की तरह पैसा बहाया। सूत्रों के मुताबिक, उन्हें भीमाशंकर ले जाने के लिए 10 गाडि़यों का काफिला मौजूद था। जिसमें कुछ किराए पर मंगाई गई थीं। जाहिर है इसका भुगतान रेलवे ने अपनी जेब से किया होगा। बात केवल किराए तक ही सीमित नहीं है, सीआरबी को खुश करने के लिए सभी स्टेशनों को चमकाया गया। जीएम स्तर के अधिकारी काम छोड़कर सीआरबी की आवभगत में लगे रहे। इतने सारे अधिकारियों के जमावड़े पर रेलवे का कितना खर्चा हुआ होगा इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चेयरमैन सैलून से आए, जिसका एक बार आने जाने का खर्चा ही लाखों में आता है।
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काम चलाऊ काम
पुणे रेल मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा, सीआरबी के आने के 10 दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो गई थीं। उनकी गुड लिस्ट में शामिल होने के लिए विभाग प्रमुखों ने फंड डायवर्ड करके वो काम भी करवाए, जिनकी कोई जरूरत नहीं थी। अधिकारी के मुताबिक, ऐसे मौकों पर किए जाने वाले काम की कोई गुणवत्ता नहीं होती। प्रशासन बस यही चाहता है कि वरिष्ठ अधिकारियों के रुकने तक सबकुछ सही दिखे। आमतौर पर प्रशासनिक दौरे की जानकारी पहले से ही दे दी जाती है, लेकिन सीआरबी पुणे में क्या करने वाले हैं यह किसी को नहीं बताया गया था। केवल आखिरी दिन के शेड्यूल में बैठक का जिक्र था। अगर सीआरबी निजी यात्रा पर नहीं आए थे, तो फिर बाकी दिन उन्होंने क्या किया? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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प्रधानमंत्री से बड़े हैं सीआरबी?
कई रेल अधिकारी सवाल उठाते हैं कि जब प्रधानमंत्री मेट्रो में सफर करके यात्रियों का हालचाल जान सकते हैं, तो क्या सीआरबी उनसे भी बड़े हैं? स्पेशल कोच में बैठने के बजाए यदि चेयरमैन पैसेंजर गाड़ी में सवार होकर यात्रियों से रूबरू होते तो समस्याओं को ज्यादा करीब से समझ पाते। साथ ही यात्रियों में भी रेलवे के प्रति विश्वास पुख्ता होता। उनके मुताबिक, यदि सीआरबी ही अपनी सुख सुविधाओं पर रेलवे का पैसा बर्बाद करेंगे, तो फिर बाकी रेलकर्मियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?
मुझे कुछ नहीं पता
इस संबंध में पुणे रेल मंडल के जनसंपर्क अधिकारी ने कहा, मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, मैं उस समय छुट्टी पर था। लेकिन सीआरबी आधिकारिक दौर पर ही पुणे आए थे।
पीएम ने जताया था विश्वास
मित्तल पर प्रधानमंत्री ने विश्वास जातते हुए उन्हें दोबारा रेलवे बोर्ड चेयरमैन नियुक्त किया था। सीआरबी के पद से रिटायर्ड होने के बाद उन्हें दोबारा वही जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर रेल अधिकारियों मे ंनाराजगी थी, क्योंकि इस वजह से कई अधिकारियों के प्रमोशन रुक गए। वही मित्तल आज पीएम की कोशिशों को पलीता लगाने में जुटे हैं। ऐसे वक्त में जब रेलवे को घाटे से उबारने की कोशिशें जारी हैं, मित्तल को खर्चों में कटौती का उदाहरण पेश करना चाहिए था। लेकिन वो अपनी निजी यात्रा पर भी रेलवे की कमाई लुटा रहे हैं।
शिकायत करें भी किससे?
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष हर्षा शाह ने कहा, मुझे इस बारे में जानकारी मिली थी कि सीआरबी ने निजी यात्रा के harsha shahलिए भी सैलून का इस्तेमाल किया। अधिकांश अधिकारी इसी तरह से रेलवे की कमाई को पानी में बहाते हैं। इस संबंध में शिकायत करें भी तो किससे? पूरा का पूरा महकमा एक ही दिशा में चल रहा है। पीएम और रेलमंत्री जो प्रयास कर रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास अधिकारियों को करना चाहिए, लेकिन उन्हें सिर्फ अपनी सुख सुविधाओं का ख्याल है। सीआरबी यदि सैलून के बजाए पैसेंजर ट्रेन में सवार होकर आते तो बाकी अधिकारियों को भी एक सबक मिलता।
यहां भी वही हाल
कुछ दिनों पहले मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में भी मुख्य यात्री परिवहन प्रबंधक जबलपुर से अपने बेटे को परीक्षा दिलवाने के लिए सैलून लेकर आए थे। वहां, भी निजी यात्रा को सरकारी बनाने की कोशिश की गई। जानकारी के मुताबिक, प्रबंधक राजेश पाठक के बेटे की आईईएस इंजीनियरिंग कॉलेज में परीक्षा थी, इसके लिए वो स्पेशल सैलून में सवार होकर हबीबगंज स्टेशन पहुंचे। पाठक ने भोपाल रेलवे स्टेशन का निरीक्षण तक नहीं किया, जो उनके प्रोग्राम में शामिल था। वो पूरे दिन सैलून में ही आराम फरमाते रहे।
‘अब हर दावे पर होगा शक’

  • कांस्टेबल दंपति के झूठ से पुणे पुलिस शर्मिंदा

एवरेस्ट फतेह का झूठा दावा करने वाले युगल के चलते पुणे पुलिस को शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। पुलिस कांस्टेबल दिनेश और तारकेश्वरी राठौड़ के दावे को नेपाल सरकार ने खारिज कर दिया है। साथ ही उन पर 10 साल का प्रतिबंध लगाया है। इस संबंध में पुणे पुलिस को पत्र भेजकर सूचना दी गई है। पुलिस कमिश्नर रश्मि शुक्ला खुद मानती हैं कि इस घटना से पुलिस की छवि खराब हुई है। दिनेश और तारकेश्वरी राठौड़ का झूठ सामने आने के बाद से ही दोनों फरार है। दोनों शिवाजीनगर पुलिस मुख्यालय में पदस्थ थे। मुख्यालय के पुलिसकर्मी इस बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहते, लेकिन वे इतना जरूर कहते हैं कि दिनेश और तारकेश्वरी ने पुलिस की छवि खराब की है।

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एक डीसीपी रैंक के अधिकारी ने कहा, महज लोकप्रियता हासिल करने के लिए इतना बड़ झूठ बोलने वालों को पुलिस में रहने का अधिकार नहीं है। पुलिसकर्मी होने के नाते उनका अपराध और भी बड़ा हो जाता है। भविष्य में जब कोई पुलिसकर्मी कोई रिकॉर्ड बनाएगा तो पहली बार में उसे भी शक की निगाहों से देखा जाएगा। राठौड़ दंपति के कृत्य की जितनी निंदा की जाए कम है।

दुख और गुस्सा
दिनेश को करीब से जानने वाले एक कांस्टेबल ने कहा, हम कभी सोच भी नहीं सकते थे कि वो इतना बड़ा झूठ बोल सकता है। पूरा डिपार्टमेंट उसके झूठ को सच मान रहा था, हम सभी बेहद खुश थे। दिनेश झूठ बोलने वाला व्यक्ति नहीं था। वो अपने काम से काम रखता था। हमें इस घटना पर दुख भी है और गुस्सा भी। दोनों ने फरार होकर बहुत बड़ी गलती की है। उन्हें इसकी सजा जरूर मिलेगी।

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जाएगी नौकरी!
कमिश्नर शुक्ला ने कहा, दोनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। विभागीय जांच के बाद से ही दोनों फरार हैं। माना जा रहा है कि उच्च अधिकारियों ने कांस्टेबल दंपति की बर्खास्तगी की सिफारिश की है। क्योंकि इस मामले ने पुलिस को शर्मसार किया है, इसलिए अधिकारी चाहते हैं कि दंड इतना सख्त हो कि फिर कोई पुलिसकर्मी झूठ बोलने का साहस न दिखा पाए। अगर दोनों की नौकरी बच भी जाती है तो उनका डिमोशन और वार्षिक वेतन वृद्धि रुकना तय है।

क्या है मामला
दिनेश और तार्केशवरी ने 5 जून को एक संवाददाता सम्मेलन में घोषणा की थी कि उन्होंने 23 मई को एवरेस्ट फतेह किया था। पुणे पुलिस ने इसके लिए दोनों का सम्मान भी किया था। कांस्टेबल दंपति के इस दावे पर पर्वतरोहियों ने एक दल के आपत्ति जताई थी। जिसके बाद जांच शुरू हुई और नेपाल सरकार से संपर्क किया गया। अब नेपाल सरकार ने भी दिनेश के दावे को नकार दिया है।

अचानक चलने लगी पॉर्न क्लिप, लगा जाम

कर्वे रोड पर कुछ ऐसा हुआ, जिसके चलते महिलाओं को शर्मसार होना पड़ा और मर्दों की आंखें खुली की खुली रह गईं। दरअसल, pornयहां लगे एक बिलबोर्ड पर अचानक पॉर्न क्लिप चलने लगी। आसपास से गुजरने वाले जिस व्यक्ति की नजर बिलबोर्ड पर गई, वो कुछ देर के लिए वहीं जम गया। यहां तक ट्रैफिक भी जाम हो गया। शुक्रवार को रिमझिम बरसात के बीच कर्वे रोड पर ट्रैफिक धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था। तभी सड़क किनारे पर दुकान के बाहर लगे बिलबोर्ड पर पॉर्न फिल्म चलने लगी। कुछ ही देर में ट्रैफिक रुक गया और जाम जैसी स्थिति बन गई। दुकानदार को जैसे ही इस बात की जानकारी मिली उसने तुरंत बिलबोर्ड बंद करवाया। आसपास से गुजरने वाली महिलाओं और युवतियों को पॉर्न क्लिप के चलते शर्मंदगी उठानी पड़ी।

मुनाफे के लिए दांव पर यात्रियों की जान!

  • वर्मा ट्रैवल्स के खिलाफ उपभोक्ता फोरम जाने की तैयारी 
  • दोगुना किराया वसूलने के बाद भी नहीं दी सुविधाएं 
  • खराब बस से कराया यात्रियों को सफर

मुनाफा कमाने के चक्कर में निजी बस ऑपरेटर यात्रियों की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रहे हैं। सड़कों पर ऐसी बसें दौड़ाई जा रही हैं, जो कभी भी हादसे का सबब बन सकती हैं। खासकर त्यौहारी सीजन में अनफिट बसों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इतना ही नहीं परिवहन विभाग की स्पष्ट नीति नहीं होने के चलते निजी ऑपरेटर मनमाना किराया भी वसूलते हैं। 15 अगस्त को देखते vermaहुए पुणे से भोपाल जाने वाली अधिकतर बसों का किराया 2200 से 3000 के बीच था। जबकि सामान्य तौर पर यह 1500 से 2000 के बीच रहता है। दोगुना किराया चुकाने के बावजूद सतनाम वर्मा ट्रैवल्स से यात्रा करने वालों को न केवल मुश्किलों का सामना करना पड़, बल्कि पूरे रास्ते उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता भी सताती रही। दरअसल, 13 अगस्त को भोपाल के लिए निकली बस (एमपी 04 3571) बीच में ही खराब हो गई थी। बस से अचानक धुआं निकलने लगा। बावजूद इसके वैकल्पिक व्यवस्था कराने के बजाए यात्रियों को उसी बस में ले जाया गया। बस का एसी नहीं चलने से यात्री पूरे रास्ते करवटें बदलते रहे। उन्हें सांस लेने में भी परेशानी हो रही थी। इसके अलावा बस से आ रहीं अजीबों गरीब आवाजों के चलते यात्रियों को इस बात का भी डर सताता रहा कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए।

जान की कीमत 200 रुपए
बस के भोपाल पहुंचने का समय सुबह साढ़े नौ है, लेकिन वह 14 अगस्त को दोपहर 12 बजे के आसपास भोपाल पहुंची। इसी से बस की दुरुस्तगी का अंदाजा लगाया जा सकता है। यात्रियों के मुताबिक खराबी के चलते ड्राइवर काफी धीरे धीरे बस चला रहा था। जब कुछ यात्रियों ने वर्मा ट्रैवल्स से इस संबंध में शिकायत की तो क्षतिपूर्ती के तौर पर महज 200 रुपए वापसी की पेशकश की गई।

बहुत बुरे थे हाल
पुणे से भोपाल जानी वालीं स्वाति सुधा ने बताया कि बस को अंदर से देखकर ऐसा लग रहा था जैसे अभी वर्कशॉप से निकलकर आई हो। बिस्तर पर मिट्टी बिखरी हुई थी, सीट नंबर तक नहीं लगे थे। मोबाइल चार्जर भी काम नहीं कर रहा था। बस चलने के कुछ देर बाद ही अचानक पीछे से धुआं निकलने लगा। यात्रियों ने जब शोर मचाया तो ड्राइवर ने बस रोककर तुरंत सबको नीचे उतारा। बकौल स्वाति, हमें लग रहा था कि वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी, लेकिन थोड़ी देर रुकने के बाद हमें उसी बस में सवार होने को कहा गया। ड्राइवर को शायद अंदेशा था कि धुआं निकलने जैसी घटना फिर हो सकती है, इसलिए पूरी रात बस की लाइट जलाकर रखी गईं ताकि धुआं दिखाई दे सके।

कंज्यूमर फोरम जाएंगी
स्वाति के मुताबिक, धुआं निकलने के बाद बस का एसी बंद हो गया था। जिसकी वजह से घुटन महसूस हो रही थी। चूंकि बस वातानुकूलित थी, इसलिए खिड़की खोलने की गुंजाइश भी नहीं थी। पूरे रास्ते हमें घुटन महसूस होती रही। स्वाति का सवाल है कि जब बस ऑपरेटर दोगुना किराया वसूलते हैं, तो क्या उन्हें सुविधाएं मुहैया नहीं करानी चाहिए। स्वाति इस मुद्दे को कंज्यूमर फोरम में उठाने का मन बना चुकी हैं।

फिट नहीं थी बस
वर्मा ट्रैवल्स के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बस रिपेयरिंग के लिए गई हुई थी, यात्रियों की भीड़ को देखते हुए उसे बीच में ही वापस बुलाया गया। कुछ यात्रियों के मुताबिक, ड्राइवर ने बस खराब होने की सूचना देकर वैकल्पिक व्यवस्था करने को कहा था, लेकिन कंपनी ने साफ इंकार कर दिया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि निजी ऑपरेटर किस तरह अपनी जेब भरने के लिए यात्रियों की जिंदगी को दांव पर लगा रहे हैं।

वाताकुनूलित हॉल में पर्यावरण पर चिंता

पर्यावरण को लेकर बीते दिनों एक संगोष्ठी में शामिल होने का मौका मिला। पुणे को जागरूक लोगों का शहर माना जाता है, इस लिहाज से यहां ऐसे आयोजन होते रहते हैं। इस संगोष्ठी में जानकारों ने अपने-अपने अनुभवों को साझा करते हुए पर्यावरण संरक्षण के लिए भौतिक सुख-सुविधाओं में कटौती का आव्हान किया। इस आव्हान पर तालियों की गडग़ड़ाहट पहले के मुकाबले कुछ कम रही, शायद संगोष्ठी में मौजूद लोगों ये बात पसंद नहीं आई। वैसे भी आमतौर पर इस तरह की बातें लोगों को कम ही पसंद आती हैं। सबसे ज्यादा ताज्जुब की बात मुझे कुछ लगी तो वो ये कि पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ी-बड़ी बातें करने वालों ने अपनी सुख-सुविधाओं के ग्राफ में कोई कटौती नहीं की। वो वातानुकूलित गाड़ी से आए, वातानुकूलित हॉल में विचार प्रकट किए और फिर उसी गाड़ी से धुंआ उड़ाते हुए चलते बने। पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वालीं गैसों का उत्सर्जन फ्रिज या एसी से होता है।

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विज्ञान की पढ़ाई करने वाला एक सामान्य विद्यार्थी भी इस हकीकत से परिचित है, लेकिन खुद को विशेषज्ञ कहलाने वाले इससे अंजान दिखे। ये कहना शायद ज्यादा बेहतर होगा कि जानबूझकर भी वो अंजान बने रहे। मौसम में बदलाव का चक्र बेहद तेजी से घूम रहा है। अब तक जितने राज्य घूमते-घुमाते मैं महाराष्ट्र पहुंचा हूं, उसमें सबसे ज्यादा बदलाव मैंने मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में महसूस किया। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से मेरा पुराना नाता है। नौकरी से पहले भी अक्सर यहां आना-जाना लगा रहता था। कुछ साल पहले तक हालात यहां ऐसे थे कि महज पंखे के सहारे मई-जून की गर्मियां निकल जाया करती थीं, लेकिन अब बगैर एसी बात नहीं बनती। जो लोग पहले कूलर इस्तेमाल करते थे, अब एसी का करने लगे हैं और पंखों का इस्तेमाल करने वालों ने कूलर अपना लिए हैं। यानी ऊर्जा के दोहन की प्रक्रिया तेज हो गई है।

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भोपाल की फिजा में धूप के बीच भी ठंड का अहसास होता था पर अब ये अहसास दूर- दूर तक महसूस नहीं होता। आलम ये है कि दिन निकलते ही सूरज आग बरसाने लगता है, यहां का पारा भी उत्तर प्रदेश के शहरों की बराबरी करने लगा है। पिछली गर्मियों में भोपाल का तामपान कई दफा 45 पार गया। जबकि पहले पारे की ये चाल नजर नहीं आती थी। महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी कहने जाने वाले पुणे में भी ऐसा ही हाल है। यहां की सर्दियां भी गर्मियों का अहसास कराने लगी हैं। हालांकि उत्तर भारत के राज्यों की तरह यहां ठंड नहीं पड़ती, लेकिन पिछले कुछ वक्त से पारा ऊपर ही तरफ चढऩे लगा है। वैसे ये बात केवल दो राज्यों या शहरों तक ही सीमित नहीं है, तकरीबन हर इलाका इस बदलाव का गवाह है। कहीं अत्याधिक गर्मी पड़ रही है तो कहीं अत्याधिक ठंड। मौसम विज्ञानिकों की हालिया रिपोर्ट में भी इस बात का उल्लेख किया गया है कि धरती का तापमान बहुत तेजी से बढ़ रहा है।

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तामपान बढऩे का मतलब है सूखे जैसी समस्याओं में इजाफा होना। उम्मीदों के अनुरूप बादलों के बरसने का प्रतिशत लगातार कम होता जा रहा है। बारिश को लेकर जिस तरह का पूर्वानुमान लगाया जाता है वो उसके एकदम उलट ही होता है। पिछले मानसून के सामान्य रहने की बात कही गई थी। 98 प्रतिशत का मतलब होता है सामान्य, 104 से 110 से ऊपर सामान्य से ज्यादा और 90 से कम का मतलब सूखा। कुछ राज्यों में यही स्थिति रही, लेकिन कहीं-कहीं आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम मिले। कम बारिश की वजह से पानी के प्राकृतिक स्त्रोतों पर दबाव रहता है और चढ़ता पारा इस दबाव को और बढ़ाने का काम करेगा। इस हिसाब से देखें तो आने वाले वक्त में हालात और भी मुश्किल होने वाले हैं। पर्यावरण संरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर महज बड़ी-बड़ी बातें करने या अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर टालने से हालात सुधरने वाले नहीं हैं। ये बात सही है कि व्यापाक स्तर पर कदम उठाने के लिए नीति-निर्धारण करना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हम आम नागरिक के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों से मुहं मोड़ लें। जब पर्यावरण से होने वाले फायदों में हम शरीक होना नहीं भूलते तो नुकसान की स्थिति में खुद को पाकसाफ कैसे बता सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के उपजने वाले खतरे मानव जनित ही तो हैं, आए दिन इसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है, फिर चाहे वह अमेरिका में तबाही मचाने वाला कैटरीना हो या जापान में तबाही मचाने वाली सुनामी।

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ये बात तो कई बार कही जाती रही है कि ग्लोबल वार्मिंग की मार भारत को काफी हद तक झेलनी पड़ेगी, बावजूद इसके हमारी उदासीनता का अंधेरा छटने का नाम नहीं ले रहा है। न तो सरकारी स्तर पर प्रयास हो रहे हैं और न आम नागरिक इसके प्रति गंभीर हैं। कुुछ वक्त पहले पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि देश में पर्यावरणीय तंत्र पूरी तरह गड़बड़ा गया है। रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में करीब 45 प्रतिशत भूमि निम्न कोटि की है, सभी शहरों में वायु प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है जबकि दुर्लभ पौधे और वनस्पति तेजी से लुप्त होते जा रहे हैं। वायु प्रदूषण के बारे में कहा गया कि 11 करोड़ की आबादी वाले 50 से अधिक शहरों में 2004 में वायु प्रदूषण के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे असर के मद में 15,000 करोड़ रुपए खर्च हुए। इसमें लगातार हो रहे इजाफे के लिए वाहनों और फैक्ट्रियों को जिम्मेदार ठहराया गया। रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि भारत बहुविविधता वाली प्रजातियों की संख्या के मामले में दुनिया के 17 देशों में शामिल है जबकि उसके दस प्रतिशत पौधे और वनस्पतियां खतरे वाली सूची में हैं, यानी विलुप्ती के कगार पर। हमारे देश में विकास के नाम पर पेड़ों को धड़ाधड़ काटने का काम जारी है। आबादी के बढ़ते बोझ के चलते वनक्षेत्र भी सिमटता जा रहा है, एक अनुमान के मुताबिक भारत का मौजूदा वन क्षेत्र 21 प्रतिशत है, और यह उम्मीद करना बेमानी ही होगा कि इसमें कभी इजाफा होगा।

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पेड़ों की क्या उपयोगिता है, इसका आभास शायद बच्चों को भी होगा। पेड़ न सिर्फ तापमान नियंत्रित रखते हैं बल्कि वातावरण को स्वच्छ बनाने में भी अहम किरदार निभाते हैं। पेड़ों द्वारा अधिक मात्रा में कार्बन डाई आक्साइड के अवशोषण और नमी बढ़ाने से वातावरण में शीतलता आती है। इतने सब के बाद भी पेड़ों को काटकर सडक़ों का चौड़ीकरण किया जा रहा है, ये बात सही है कि बढ़ते ट्रैफिक की वजह से सडक़ें चौड़ी करना वक्त की जरूरत है लेकिनइसके लिए पेड़ों की कुर्बानी देना कितना घातक हो सकता है, यह सोचने की आवश्यकता है। कुछ साल पहले और आज की स्थिति में जमीन आसमान का अंतर है, सडक़ों पर वाहनों का काफिला बढ़ता जा रहा है, हजारों-लाखों वाहन प्रतिदिन जहरीला धुआं उगलकर पर्यावरण को इतना नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिसकी भरपाई सालों में भी नहीं हो सकती।

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अमेरिका में तो ऑटोमोबाइल उद्योग की वजह से हर साल 30 करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड गैस हवा में मिलती है। जलवायु परिवर्तन पर होने वाली अंतरराष्टीय बैठकों में भी इस मुद्दे पर कोई ठोस पहल नहीं होती। भारत जैसे विकासशील देश अमेरिका जैसे विकसित देशों पर उंगली उठाते रहते हैं तो अमेरिका भारत-चीन पर। मौजूदा वक्त उंगलियां उठाने का नहीं बल्कि अपनी जिम्मेदारी समझकर उसे निभाने का है। फिर चाहे वो आम नागरिक हो या राष्ट। वातानुकूलित वातावरण में बैठकर दूसरों को सुख-सुविधाओं में कटौती के उपदेश देने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। जिस तरह की संगोष्ठी का गवाह मैं बना, वो इस गंभीर और संवेदनशील मुद्दे के प्रति लोगों की सोच को दर्शाती है, अगर इस सूरत में जल्द बदलाव नहीं हुआ तो परिणाम और भी भयानक होंगे।

इतने क्रूर कैसे हो गए हम?

बीते कुछ वक्त में जो घटनाएं सामने आईं हैं, उसे देखकर यही सवाल मन में उठ रहा है कि आखिर हम इतने क्रूर कैसे बनते जा रहे burnहैं। हैदराबाद में कुछ लड़कों ने कुत्ते के तीन बच्चों को जिंदा जलाकर मौत के घाट उतार दिया। इससे पहले तमिलनाडु में एक मेडिकल स्टूडेंट ने कुत्ते को छत से नीचे फेंक दिया था। थोड़ा और पीछे जाएं तो पुणे में अज्ञात व्यक्ति ने दो कुत्तों पर एसिड फेंककर उन्हें मारने का प्रयास किया था। इसी तरह बेंगलुरू में एक महिला ने 8 पिल्लों को उनकी मां के सामने पटक पटककर मार डाला था। जानवरों के साथ इस तरह की हैवानियत अब आम बनती जा रही है। सबसे ज्यादा चौंकाने और परेशानी करनी वाली बात ये है कि बच्चे भी इस हैवानियत का हिस्सा बनते जा रहे हैं।

बांधा और जला दिया
हैदराबाद के मोशीराबाद इलाके में 17 से 18 साल के लड़कों ने आवारा कुत्ते के तीन बच्चों को पहले पकड़कर काफी दूर तक घसीटा और जूट के थैले में डालकर जिंदा जला दिया। इस पूरी घटना को एक आरोपी ने अपने कैमरे में कैद किया। जिसका वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। वीडियो रौंगटे खड़े करने वाला है। वीडियो में दिखाया गया है कि सभी लड़के हंसते हुए पहले पिल्लों को उठाते हैं और आग के हवाले कर देते हैं।

dogआरोपी अब भी लापता
पुणे में पिछले महीने दो कुत्तों पर एसिड अटैक किया गया था। दोनों की हालत अब भी नाजुक बनी हुई है। इस घटना के खिलाफ पशु प्रेमियों ने विरोधी प्रदर्शन भी किया था, लेकिन पुलिस अब तक आरोपियों की पहचान नहीं कर पाई है। एसिड के चलते कुत्ते बुरी तरह जल गए हैं। उनके शरीर के कई अंग पूरी तरह डैमेज हो चुके हैं। स्थानीय निवासियों ने जब कुत्तों को बुरी अवस्था में देखा तो केशवनगर स्थित ब्लू क्रॉस हॉस्पिटल को इसकी सूचना दी।

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पेड़ से लटकाया
कुछ वक्त पहले पुणे में ही कुछ 10 से 12 साल के लड़कों ने एक कुत्ते को बुरी तरह पीटने के बाद उसे पेड़ से लटका दिया था। कोंढवा के इस मामले में पशुप्रेमी प्राची शर्मा ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। आठ महीने के कुत्ते की हड्डियां कई जगह से टूटी थीं। उसका शव करीब तीन दिन तक पेड़ से लटका रहा। प्राची ने जब आसपास लोगों से जानकारी जुटाई तो पता चला कि 10 12 साल के कुछ बच्चों ने कुत्ते को केवल इसलिए मौत के घाट उतार दिया क्योंकि वो उनमें से एक के घर में खाने की तलाश में घुस आया था।