Gujarat: इस जीत में छिपी हैं चिंताएं!

गुजरात (Gujarat) में भाजपा ने लगातार छठवीं बार सत्ता पर कब्ज़ा ज़रूर कर लिए है, लेकिन इस जीत में कई चिंताएं भी छुपी हैं. जिस तरह के प्रचंड बहुमत की उम्मीद नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह कर रहे थे, वोट का आंकड़ा उससे काफी दूर रहा. भाजपा यहां 100 के फेर में ही उलझ गई, जबकि पिछली बार यानी 2012 के विधानसभा चुनाव में उसने 115 सीटें हासिल की थी. इस बात में कोई दोराय नहीं कि जो जीता, वही सिकंदर, लेकिन गिरता वोट प्रतिशत कहीं न कहीं दर्शाता है कि गुजरात की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सत्ताधारी पार्टी के कामकाज से खुश नहीं था. जहाँ तक बात हिमाचल की है, तो वहां नरेंद्र मोदी लहर पूरी तरह नज़र आई. राज्य की जनता ने कांग्रेस को काफी गंभीर चोटें दी हैं. हिमाचल में एक तरह से यह साफ़ हो गया था कि जनता सत्ता परिवर्तन चाहती है. क्योंकि कांग्रेस उसकी उम्मीदों के अनुरूप शासन देने में नाकाम रही. पार्टी नेता जनता की सुध लेने के बजाए अपने लड़ाई-झगड़े सुलझाने में ही लगे रहे.

फायदे में कांग्रेस
गुजरात के नतीजे भाजपा के पक्ष में ज़रूर हैं, मगर कांग्रेस राज्य में मज़बूत होती दिखाई दे रही है. अगर पिछले चुनाव से तुलना की जाए, तो पार्टी का रिकॉर्ड सुधरा है. 2012 में कांग्रेस को 61 सीटें मिलीं थीं और इस बार वो 80 के आंकड़े को पार कर गई है. उसे 20 से ज्यादा सीटों का फायदा मिला है. सौराष्ट्र में भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा हुआ है. जबकि भाजपा को अपने गढ़ में उम्मीद माफिक परिणाम नहीं मिले हैं. इसके अलावा पटेल बहुल इलाकों में भी भाजपा को नुकसान झेलना पड़ा है.

भाजपा को नुकसान
गुजरात भाजपा को इस बार सीधे तौर पर 19 से 20 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है. 182 सीटों वाले राज्य में 20 सीटों पर हार काफी मायने रखती है. हालांकि इसके पीछे हार्दिक पटेल फैक्टर ने भी काम किया है. भाजपा यदि पटेल को अपने पाले में करने में कामयाब रहती तो जिस प्रचंड जीत के दावे पीएम मोदी और शाह कर रहे थे उसे हासिल किया जा सकता था.

नहीं संभले तो….
गुजरात के नतीजे इशारा कर रहे हैं कि लोगों में भाजपा को लेकर सोच बदल रही है. आलाकमान को ख़ुशी मानाने के साथ ही मंथन भी करना होगा, अन्यथा आने वाले चुनावों में इसका खामियाजा उठाना पड़ सकता है. भाजपा की जीत के एक बड़ी वजह यह भी रही कि लोग राहुल गांधी को उतना परिपक्व नहीं मानते हैं. कांग्रेस पर भरोसा करने के उनके पास वाजिब कारण नहीं हैं. ये स्थिति काफी हद तक बिल्कुल वैसी ही है, जैसी 2014 से पहले भाजपा की थी. लेकिन समय बदला और भाजपा ने सारे समीकरण बदल दिए. इसलिए भाजपा को भी इसी नज़रिए से सोचना होगा.

Gujarat: विकास पर क्यों खामोश रहे मोदी?

अपने हर भाषण में विकास की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Gujarat चुनाव में विकास से बचते नजर आए. अपनी चुनावी रैलियों में उनका पूरा जोर कांग्रेस खासकर राहुल गांधी की कमजोरियों को रेखांकित करने पर ही केन्द्रित रहा. मोदी में आए इस बदलाव से यह कयास लगाए जा रहे हैं कि गुजरात में इस बार भाजपा को नुकसान होने जा रहा है. कांग्रेस नेता मणिशंकर के “नीच” वाले बयान के बाद जिस तरह से मोदी ने अपने लिए इस्तेमाल हुए शब्दों की दुहाई दी और जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस के तार पाकिस्तान से जोड़े, उससे इन कयासों को बल मिलता है. जीएसटी आदि कई ऐसे मुद्दे रहे जिन्होंने गुजरात में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाया और हार्दिक पटेल ने इस हवा की गति बढ़ाने का काम किया. बावजूद इसके भाजपा का पलड़ा कुछ हद तक भारी समझा जा रहा था, लेकिन पार्टी नेता और खासकर नरेंद्र मोदी के हावभाव देखकर अब यह लगने लगा है कि कांग्रेस की वर्षों की मुराद पूरी हो सकती है.

नयापन नदारद
गुजरात में मोदी के भाषण कांग्रेस की बुराई और राष्ट्रवाद, सेना, चीन, पाकिस्तान, भ्रष्टाचार और गुजराती अस्मिता के इर्द-गिर्द रहे. उन्होंने गुजरात में विकास की बात छेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और न ही बेरोजगारी, निवेश में कमी, लघु एवं मध्यम उपक्रमों की बर्बादी, स्थिर निर्यात एवं मूल्यवृद्धि जैसे मुद्दों पर बात की. कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा बार-बार विकास पर बात करने की चुनौती को भी मोदी ने नहीं स्वीकारा. मोदी के भाषण इस बार पारंपरिक राजनीति तक ही सिमटकर रह गए, उनमें कुछ नयापन नजर नहीं आया. उन्होंने खुद को गुजरात के बेटे के रूप में प्रोजेक्ट कर भावनात्मक आधार पर वोट मांगे. राजनीति का यह अंदाज़ 2014 के नरेंद्र मोदी के अंदाज़ से बिल्कुल अलग है. जो कहीं न कहीं यही इशारा करता है कि गुजरात के लिए भाजपा के पास कोई विकास मॉडल नहीं है.

बदली रणनीति
मोदी यह समझ गए हैं कि इस बार समीकरण अलग हैं. अच्छे दिनों के जो सपने उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान दिखाए थे, वे अब तक पूरे नहीं हुए हैं. इसलिए विकास की बातों से बात बनने वाली नहीं है. शुरुआती मौकों पर जब स्वयं मोदी और अमित शाह की सभाओं से भीड़ कम होती चली गई और रैलियों में भाजपा के खिलाफ हुटिंग हुई, तभी पार्टी ने अपनी रणनीति को जाति-धर्म से जोड़ दिया. कभी अयोध्या के राम मंदिर का मुद्दा उठाया गया, तो कभी राहुल गांधी के धर्म का. हालांकि सभाओं में पहले जैसी भीड़ फिर भी न खिंच सकी. हालांकि जनता का फैसला आना अभी बाकी है, इसके बात ही तय होगा कि उसे भाजपा पसंद है या कांग्रेस.

बदलते गए नारे
अगर 2007 से अब तक की बात करें, जो 2017 के चुनाव में भाजपा किसी खास स्लोगन के साथ मैदान में नहीं आई है.

  • 2002 के गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी का मुख्य नारा था आतंकवाद विरुद्ध राष्ट्रवाद. ये चुनाव गुजरात दंगों के कुछ महीने बाद ही हुए थे. सांप्रदायिक हिंसा के साये में एक भव्य गौरव यात्रा का आयोजन किया गया था, जिसमें गुजरात की गरिमा और सम्मान को चुनाव का केंद्र बिंदु बनाया गया था.
  • 2007 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ‘जीतेगा गुजरात’ नाम से स्लोगन जारी किया था. इस चुनाव में विकास के प्रति झुकाव देखा गया. कांग्रेस के लिए सोनिया गांधी का मौत के सौदागर वाला बयान नुकसानदायक साबित हुआ था.
  • 2012 में भाजपा ने एकमत गुजरात का नारा केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार की तरफ से गुजरात की गई अनदेखी के खिलाफ एकजुट होने के लिए बनाया गया।
‘सिंगल’ जीत रहे सिसायत का खेल

सियासत में आजकल सिंगल ही मिंगल कर रहे हैं. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विवादित भाषणों पर चर्चा छोड़कर यदि भाजपा के दिलचस्प पहलू पर नज़र डाली जाए, तो यह पता चलता है कि पार्टी में वही नेता ऊंचाइयों को छू रहा है जो अकेला है. अटल बिहारी वाजपेयी के बाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण नरेंद्र मोदी हैं, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी से होते हुए आज प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए हैं. भले ही उनकी शादी हुई थी, लेकिन राजनीति में पूरी तरह सक्रिय होने के बाद वे अकेले ही रह रहे हैं. इसी तरह आदित्यनाथ भी सिंगल हैं और मनोहर लाल खट्टर, सर्बानंद सोनेवाल भी.

सबसे बड़ा नाम
सोनेवाल इस समय असम के मुख्यमंत्री हैं और खट्टर हरियाणा के, इस हिसाब से देखें तो तीन राज्यों की कमान भाजपा के सिंगल नेताओं के हाथ है और देश ही मोदी के हाथ. वैसे अन्य पार्टियों के भी कई नेता हैं, तो अकेले रहकर सियासत के घोड़े को सरपट दौड़ा singleरहे हैं. इनमें ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी शामिल हैं. अगर जयललिता जीवित होतीं, तो उन्हें भी इस लिस्ट में जगह मिलती.

माया से उमा तक
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती भी अब तक कुंवारी हैं. मौजूदा संकट को छोड़ दें तो वे लम्बे समय से राजनीति में अपना लोहा मनवाती रहीं हैं. केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भी अब तक शादी नहीं की है. एक ज़माने में उमा भाजपा की फायर ब्रैंड नेता थीं और उनका कद पार्टी में बहुत बड़ा था. हालांकि विवादों के चलते भाजपा छोड़कर नई पार्टी बनाने के फैसले के चलते उन्हें काफी नुकसान उठाना पड़ा.

और राहुल भी कुंवारे
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी अब तक कुंवारे हैं, उनकी शादी की बातें ज़रूर चलीं मगर मामला उनसे आगे नहीं बढ़ा. राहुल इसलिए शादी नहीं करना चाहते क्योंकि वो अभी राजनीति में अपना भविष्य संवारना चाहते हैं. हालांकि उत्तर प्रदेश में पार्टी की हार के बाद उनके सिंगल होने को लेकर भो सोशल मीडिया पर काफी जोक बन रहे हैं.

Must watch video…अब तो विदेशी भी उड़ा रहे मजाक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नारियल के जूस पर राहुल गांधी का मजाक उड़ाया तो कांग्रेस ने उन्हें कपिल शर्मा के शो में जाने की नसीहत दे डाली। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है, राहुल इससे पहले भी कई बार अपने बयानों के चलते हंसी का पात्र बन चुके हैं। इतना ही नहीं अब विदेशी भी सार्वजनिक मंचों से कांग्रेस के युवराज पर तीर दाग रहे हैं, देखिए ये Video:

फिर कुछ ज्यादा बोल गए राहुल

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री को निशाना बनाने की चक्कर में फिर कुछ ऐसा बोल गए हैं, जिस पर बवाल होना लाजमी है। किसान यात्रा के अंतिम पड़ाव में दिल्ली पहुंचे राहुल ने नरेंद्र मोदी पर शहीदों के खून की दलाली खाने का आरोप लगाया। गौर करने वाली बात यह है कि राहुल ने भी सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पीएम मोदी की तारीफ की थी। किसानो को सम्बोधित करते हुए rahul-gandhiराहुल ने कहा, हमारे जवानों ने जम्मू कश्मीर में अपना खून दिया, जिन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक किया, आप उनके खून के पीछे छिपे हुए हैं। आप उनकी दलाली कर रहे हैं, जवानों ने अपना काम किया है, आप अपना काम कीजिए।

शहीदों का अपमान
इससे पहले, राहुल ने पीएम पर हमला बोलते हुए कहा कि मोदी जी ने सबसे वादा किया था कि बैंक अकाउंट में 15 लाख रुपए आएंगे, लेकिन उनका यह वादा झूठा निकला। यह देश मोदीजी से इंसाफ चाहता है, कहां हैं 15 लाख रुपए, कहां हैं उनके वादे? उन्होंने आगे कहा, आपने दो चीज जरूर की हैं, एक हिंदुस्तानी को दूसरे से लड़ाना और बांटना। वहीं, भाजपा ने राहुल के बयान को शहीदों का अपमान करार दिया है।

वाजिब तो है Rahul का सवाल

Rahul Gandhi एक अर्से के बाद संसद में आक्रामक नजर आए। सबसे अच्छी बात ये है कि उनकी आक्रामता एक ऐसे मुद्दे को लेकर थी, जिसका जुड़ाव देश की आबादी के एक बड़े हिस्से से है। राहुल ने महंगाई पर केंद्र सरकार को न केवल घेरा बल्कि प्रधानमंत्री के उन वादों को भी दोहराया जो उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान जनता से किए थे। इस बात में कोई दोराय नहीं कि कांग्रेस के rahul1कार्यकाल में भी महंगाई एक बड़ा मुद्दा थी, लेकिन जिस तरह से भाजपा ने आम आदमी को अच्छे दिनों का सपना दिखाया था उस परिप्रेक्ष्य में यह सवाल मोदी के लिए और भी बड़ा हो जाता है कि महंगाई कब थमेगी?

भाजपा ने 2014 में केंद्र में सरकार बनाई तब से अब तक महंगाई के मोर्चे पर ऐसा कुछ भी खास नहीं हुआ है, जिससे यह लग सके कि आम आदमी के अच्छे दिन आ रहे हैं। भले ही वित्तमंत्री आंकड़ों की जादूगिरी दिखाकर महंगाई को कम दर्शाने का प्रयास कर रहे हों, मगर हकीकत क्या है ये वह खुद भी जानते होंगे। हकीकत यही है कि महंगाई कमाई का आधे से ज्यादा हिस्सा डकार रही है। आटे, दाल से लेकर सब्जियां, फल सभी के दाम आसमान पर हैं। जमीन पर अगर कुछ आया है तो वो है आम जनता के अरमान, जो उसने भाजपा को वोट देते वक्त जगाए थे।

वादे हैं वादों का क्या
राहुल गांधी ने संसद में बोलते हुए कहा कि 16 फरवरी 2014 को मोदी ने कहा था कि देश के सामने महंगाई सबसे बड़ी समस्या है। मां बच्चे रात भर नहीं सोते, आंसू पीकर सोते हैं। तब उन्होंने वादा किया था कि महंगाई रोकेंगे पर आज दाल और सब्जियां कई गुना महंगी हो गई हैं। टमाटर के भाव 200 प्रतिशत बढ़े हैं। राहुल ने मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जब बनारस में चुनाव के दौरान मोदी ने कहा था कि आप मुझे प्रधानमंत्री मत बनाइए, मैं आपका चौकीदार हूं। पर आज उनकी नाक के नीचे से दाल चोरी हो रही है। कीमतें आसमान छू रही हैं। राहुल ने कहा, आप प्रधानमंत्री बन गए हैं अब आप क्या करेंगे, चौकीदारी का काम कांग्रेस कर लेगी। इस दौरान राहुल ने अरहर मोदी का नारा भी दिया।

कैसी है महंगाई की चाल?
आंकड़ों की बात करें तो महंगाई यहां भी बढ़ती नजर आ रही है। जून में थोक महंगाई दर बढ़कर 1 16 फीसदी हो गई, जो एक महीने पहले 0 70 प्रतिशत थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जून में आलू 64 48 फीसदी महंगा हुआ और दलहन कीमतों में 26 61 प्रतिशत का इजाफा हुआ। इस दौर में सब्जियां भी 16 91 फीसदी महंगी हुईं।

ये तो कोई तर्क नहीं
राहुल गांधी के सवाल का जवाब संसद में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने दिया। जेटली ने मौजूदा सीजन को महंगाई का सीजन करार देकर लगभग वैसे ही तर्क पेश किए जैसे यूपीए के कार्यकाल में दिए जाते थे। जेटली ने कहा, मानसून आने से पहले खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोत्तरी आम बात है। राहुल गांधी के अरहर मोदी के नारे पर वे बोले, सवाल नारे देने का नहीं, आंकड़े पेश करने का है। हमारी सरकार ने महंगाई रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं। कांग्रेस के कार्यकाल में नीतिगत विकलांगता थी। कीमतें मांग और आपूर्ति से तय होती हैं। भारत में दाल की कमी वैश्विक मंदी की वजह से है।

क्या वाकई राहुल को पप्पू समझने लगी है जनता?

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद कांग्रेस अब तक की सबसे बुरी स्थिति में पहुंच गई है। 1951 52 में जहां देश के 93 फीसदी हिस्से पर कांग्रेस का राज था, आज वो सिमटकर मात्र 14 प्रतिशत रह गया है। जबकि भाजपा ने पिछले कुछ सालों में जबरदस्त छलांग लगाई है। साल 2000 में पार्टी देश के महज 19 फीसदी हिस्से पर अपनी मौजूदगी का अहसास करा रही थी, वहीं आज 65 फीसदी क्षेत्र में भगवा झंडा लहरा रहा है। कांग्रेस के इस हाल के लिए पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर उंगलियां उठ रही हैं। Rahul कांग्रेस के सिर्फ पोस्टर ब्वॉय ही नहीं हैं, बल्कि नीति निर्धारण में सबसे ज्यादा उन्हीं ही चलती है। पांच राज्यों में rahul-gandhi-पार्टी के चुनावी अभियान का खाका उन्हीं की देखरेख में तैयार किया गया था। अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही, लेकिन बीते 2 सालों में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस 6 राज्य गंवा चुकी है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या जनता वास्तव में राहुल को पप्पू समझने लगी है। एक ऐसा पप्पू जिसके पास होने की संभावना दिन ब दिन और कम होती जा रही हैं। चुनावी नजीते बताते हैं कि मतदाताओं को राहुल गांधी में ऐसा करिश्माई नेता नजर नहीं आता, जो उनके सपनों को साकार कर सके।

राहुल का व्यक्तित्व एक ऐसे नेता का बन गया है, जिसके साथ लोग फोटो खिंचवाना तो पसंद करते हैं, लेकिन वोट देना नहीं। कुछ हद तक राज ठाकरे की तरह। ठाकरे की हर सभा में जबरदस्त भीड़ रहती है। इतना ही नहीं, टीवी पर जब उनका भाषण चल रहा होता है, तो लोग काम धंधा छोड़कर उन्हें सुनने बैठ जाते हैं। महाराष्ट्र में उनकी कड़वी जुबान को बेहद पसंद किया जाता है, बावजूद इसके ठाकरे को वोट नहीं मिलते। पिछले विधानसभा चुनाव में मनसे की दुर्गती इसका सबसे जीवंत सबूत है। वैसे ऐसा नहीं है कि राहुल ने जमीनी स्तर पर काम करने का प्रयास नहीं किया। उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन तैयार करने के लिए वे गांव गांव घूमे। दलितों के घर रात गुजारी, उनके साथ खाना खाया, उनकी समस्याएं जानीं। भट्टा पारसौल में जहां यूपी सरकार के मंत्री तक नहीं पहुंच सके, वहां राहुल ने सबसे पहले पहुंचकर हर किसी को चौंका दिया था। केवल यूपी ही नहीं उन्होंने देश के कई राज्यों में दौरे किए, और वीआईपी नेता एवं जनता के बीच की दूरी को कम करने का प्रयास किया। ये कहना गलत नहीं होगा कि कुछ वक्त पहले तक राहुल को पसंद करने वालों की संख्या अच्छी खासी थी, लेकिन अब वो जैसे नगण्य होती जा रही है। इसके लिए कुछ हद राहुल खुद भी जिम्मेदार हैं।

राजबाला प्रकरण ने राहुल की छवि को काफी प्रभावित किया। इस घटना के बाद यह माना जाने लगा कि राहुल गांधी के लिए हर घाव के मायने अलग हैं। मसलन, यदि विपक्षी पार्टियों की सरकार वाले राज्य में यदि कोई गरीब रोता है तो राहुल को उसके आंसू नजर आ जाते हैं, लेकिन अपनी पार्टी की सरकार वाले राज्यों में गरीब की चीख पुकार भी उनके कानों तक नहीं पहुंचती। राजबाला जब दिल्ली पुलिस की लाठियों का शिकार हुईं उस वक्त राहुल गरीब और कमजोर तबके की आवाज बनने के लिए सुर्खियां बंटोर रहे है, मगर उन्होंने राजबाला का हाल जानने की जहमत नहीं उठाई। जबकि पूरा देश पुलिस के इस वहशीपन को कोस रहा था। राहुल के लिए राजबाला के घाव इसलिए अलग थे, चूंकि एक तो घटना दिल्ली में हुई जहां शीला दीक्षित की सरकार थी और केंद्र में कांग्रेस बैठी थी। दूसरी बात यह कि राजबाला बाबा रामदेव की भक्त थीं, जो कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। सोशल मीडिया पर इसके लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष की जमकर आलोचना हुई, शायद बाद में उन्हें इसका मलाल भी हुआ होगा।

Rahul-Gandhi-Sleeping

राहुल की ओर से आए दिन होने वाली गलतियों ने भी उन्हें एक गंभीर युवा नेता की छवि से मुक्त कर दिया है। सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो मौजूद हैं, जिसमें राहुल गलतियां करते नजर आ जाते हैं। जनता भला एक ऐसे व्यक्ति पर भरोसा कैसे कर सकती है, जो कागज पर लिखे होने के बावजूद आंकड़ों और तथ्यों गलतियां कर जाए। उम्मीदवारों की सूची बताकर खाली कागज फाड़ना या उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार के आंकड़ों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करना, राहुल हर ऐसे स्टंट के बाद मतदाता की नजर से गिरते चले गए। यही वजह है कि उन्हें आजकल पप्पू के नाम से भी संबोधित किया जाता है। जिस तरह बॉलीवुड में आलिया भट्ट पर चुटकुले बनते हैं, उसी तरह राजनीति में हंसने के लिए राहुल गांधी के नाम का सहारा लिया जाता है।

बदल गई सूरत
पांच राज्यों के चुनाव के बाद कांग्रेस विधायकों की संख्या 163 से घटकर 115 रह गई है। पुडुचेरी में भले ही कांग्रेस जीती हो, लेकिन यह जीत एक तरह से उसके लिए बेमानी है। इस वक्त उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम में ही कांग्रेस की सरकार बची है। 2014 से अब पार्टी के हाथ से 6 राज्य निकल चुके हैं। बिहार को छोड़ दिया जाए तो राहुल गांधी पार्टी के लिए कुछ खास नहीं कर सके हैं। बिहार में पार्टी को नीतीश कुमार और लालू यादव से हाथ मिलाने का फायदा हुआ।

 rahul gandhi

यहां भी की गलती
कांग्रेस का दम निकालने में बागियों की सबसे बड़ी भूमिका रही। असम में भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हेमंत बिस्वा शर्मा पहले कांग्रेस में थे, लेकिन अपनी अनदेखी के चलते उन्होंने कमल थाम लिया। शर्मा ने राहुल गांधी पर आरोप लगाया था कि वो जितनी बार भी चुनावी चर्चा के लिए राहुल के पास पहुंचे, उन्होंने कोई रुचि नहीं दिखाई। वे ज्यादातर अपने कुत्ते के साथ खेलने में व्यस्त रहे। राहुल को लेकर पार्टी के अंदर भी स्थितियां विपरीत होती जा रही हैं। दिग्विजय सिंह सरीखे नेता जो कल तक राहुल को कमान सौंपने की वकालत करते थे, आज वो इस मुद्दे पर कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं बोलते। अधिकतर वरिष्ठ नेता मानने लगे हैं कि यदि कांग्रेस की कमान राहुल को सौंपी जाती है, तो पार्टी इससे भी बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं। अब यह तो वक्त ही बताएगा कि युवराज से पप्पू बने राहुल राजनीतिक परीक्षा में कब पास हो पाते हैं।