Railway: अनधिकृत हॉकरों के खिलाफ छेड़ी जंग

Railway Passengers की सुरक्षा के लिए मुकेश की मुहिम

ट्रेन में सफर के दौरान अक्सर हमारा सामना अनधिकृत हॉकरों से होता है। यह जानते हुए भी कि ये हॉकर यात्रियों की सेहत से खिलवाड़ कर सकते हैं, हम किसी तरह की शिकायत की जहमत नहीं उठाते। शायद इसकी मुख्य वजह सरकारी उदासीनता है। हमें मालूम है कि अनधिकृत हॉकरों को रेल Railwayपरिसर और ट्रेनों से बाहर रखने की जिम्मेदारी रेलवे की है, और जब वही गंभीरता नहीं दिखाता तो हमारी सक्रियता किस काम की। लेकिन एक शख्स है, जिसकी सोच हमसे बिल्कुल जुदा है। वो मानता है कि रेल प्रशासन की नींद तोड़ने के लिए सबसे पहले हमें अपनी खामोशी तोड़नी होगी। उस शख्स का नाम है मुकेश तांतेड़। महज 28 वर्षीय मुकेश अनधिकृत हॉकरों के खिलाफ जंग का ऐलान कर चुके हैं। सफर के दौरान उन्हें जब भी कोई अवैध हॉकर दिखाई देता है, वे टीटीई के मार्फत शिकायत दर्ज करवाना नहीं भूलते। मूलरूप से  हुबली  निवासी मुकेश को काम के सिलसिले में अक्सर एक शहर से दूसरे शहर आना जाना पड़ता है। ऐसे में हॉकरों से उनका आमना-सामना आम बात है। मुकेश ने सबसे ज्यादा शिकायतें मध्य रेलवे में दर्ज करवाई हैं। जिसमें से मुंबई ने उनकी कुछ शिकायतों पर कार्रवाई भी की, लेकिन पुणे रेल मंडल की तरफ से उन्हें कोई खास रिस्पॉन्स नहीं मिला। आज का खबरी से बातचीत में मुकेश ने कहा, अनधिकृत हॉकर जो खाद्य सामग्री बेचते हैं, उसकी क्वालिटी सब जानते हैं। बावजूद इसके रेलवे उनके खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाता। ट्रेन में टीटीई के साथ-साथ आरपीएफ-जीआरपी के जवान भी होते हैं, लेकिन हॉकरों पर किसी ने खुद कार्रवाई की हो मैंने ऐसा आज तक नहीं देखा। अवैध हॉकरों के हौसले इसलिए बुलंद रहते हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि कार्रवाई नहीं होगी।

कैसे हुई शुरुआत
अनधिकृत File Photoहॉकरों के खिलाफ मुकेश की जंग की शुरुआत कुछ वक्त पहले ट्रेन सफर के दौरान ही हुई। मुकेश बताते हैं, मैं अपने परिवार के साथ हुबली जा रहा था। ट्रेन के पुणे स्टेशन छोड़ते ही कुछ हॉकर हमारी बोगी में सवार हुए। उन्होंने न तो कोई यूनिफॉर्म पहनी थी और न ही उनके पास कोई आईकार्ड था। वे दोगुने दाम पर सामान बेच रहे थे, जिसे लेकर मेरी उनसे कहासुनी हो गई। जब मैंने शिकायत की धमकी दी तो उनमें से एक हॉकर ने अपने कुछ साथियों को फोन कर दिया। ट्रेन के अगले स्टेशन पहुंचते ही कुछ और लोग हमारी बोगी में धमके। उन हॉकरों से काफी देर तक हमारा विवाद हुआ। उसी दिन मैंने ठान लिया कि इन अनधिकृत हॉकरों के खिलाफ अभियान छेडक़र रहूंगा।

हुई कार्रवाई
मुकेश ने अलग-अलग रेल मंडलों में सैंकड़ों शिकायतें दर्ज कराई हैं। उन्हें सबसे अच्छा रिस्पॉन्स वेस्टर्न रेलवे से मिला। इसके अलावा मुंबई रेल मंडल ने भी मुकेश की कुछ कम्प्लेंट्स के आधार पर कार्रवाई की जानकारी उन्हें दी। लेकिन पुणे मंडल की प्रतिक्रिया काफी फीकी रही। मुकेश कहते हैं, पुणे से जो जवाब आए उससे एक में इस बात का जिक्र था कि पिछले कुछ वक्त में कितने अनधिकृत हॉकरों पर कार्रवाई की गई। जबकि दूसरे में हॉकरों के अस्तिव पर ही सवाल उठाए गए।

दोस्त भी हुए प्रेरित
अवैध हॉकरों के खिलाफ मुकेश की जंग ने उनके कई दोस्तों को भी प्रभावित किया है। मुकेश के दोस्तों को भी सफर के दौरान अगर कोई हॉकर नजर आता है, तो वो उसकी शिकायत जरूर दर्ज करवाते हैं। मुकेश कहते हैं, हमारी शिकायतों पर रेलवे वास्तव में कितनी कार्रवाई करता है, ये तो नहीं पता। लेकिन हम आवाज उठाना बंद नहीं करेंगे। आखिरकार ये लाखों यात्रियों की सेहत का मामला है। मेरा मानना है कि अगर बाकी यात्री भी आवाज उठाएं, तो अनधिकृत हॉकरों की समस्या कुछ हद तक सुलझ सकती है।

प्यार का इंतजार: 20 साल से स्टेशन के बाहर बैठा  है शख्स

प्यार में हद से गुजर जाने की कहानियां तो आपने बहुत सुनी होंगी, लेकिन ये कहानी कुछ हटके है। ताईवान के ताइनान शहर में रहने वाला एक शख्स पिछले 20 सालों से रेलवे स्टेशन के बाहर अपनी प्रेमिका का इंतजार कर रहा है। वर्तमान समय में आह जी की उम्र 47 साल है, जब वो महज 27 साल manwaitingका था, तब उसे ट्रेन में एक युवती मिली थी। बातों-बातों में दोनों एक दूसरे को इतना पसंद करने लगे कि चंद पलों की मुलाकात दोस्ती से होते हुए प्यार में तब्दील हो गई। उस युवती ने आह जी से अगले दिन ताइनान स्टेशन के बाहर मिलने को कहा था। आह जी तो वक्त पर पहुंच गया, लेकिन वो युवती नहीं आई। उस दिन को आह जी इंतजार करने के बाद वापस लौट गया, मगर दूसरे दिन भी जब युवती नहीं आई तो उसने स्टेशन के बाहर ही अपना डेरा जमा लिया। पिछले 20 सालों से आह जी अपने प्यार के लौटने का इंतजार कर रहा है, उसे उम्मीद है कि एक न एक दिन उसका ये इंतजार जरूर खत्म होगा। आह जी के खाने-पीने का इंतजाम स्टेशन से गुजरने वाले लोग करते हैं। उसके परिवार वालों ने कई बार घर वापस लौटने की गुजारिश की, लेकिन आह जी ने इंकार कर दिया।

वो जरूर आएगी
आह जी ने कहा, ट्रेन में कुछ देरी की बातचीत में मुझे उससे प्यार हो गया था। वो भी मुझे पसंद करने लगी थी। हम दोनों ने अगले दिन मिलने का फैसला लिया। हमने सोचा कि हमारी मुलाकात ट्रेन में हुई है, इसलिए पहली डेटिंग के लिए स्टेशन से बेहतर कुछ और नहीं हो सकता। उसने अलगे दिन स्टेशन के बाहर आने का वादा किया। दूसरे दिन मैं तय वक्त से पहले ही स्टेशन पर पहुंच गया था, लेकिन वो नहीं आई। मुझे लगा शायद वो किसी काम में फंस गई होगी, अगले दिन जरूर आएगी। मगर ऐसा नहीं हुआ। मुझे हर पल उसका इंतजार है, और मैं जानता हूं कि एक न एक दिन वो जरूर आएगी।

स्टेशन परिसर में चलता है जुआ

pune
पुणे रेल मंडल जुआरियों के लिए स्वर्ग बनता जा रहा है। बीते दिनों जुए के लेनदेन को लेकर यार्ड में हुए जानलेवा हमले के
बाद भी रेल प्रशासन द्वारा इस बारे में कुछ खास नहीं किया गया, उल्टा मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक शाम ढलते ही रेलवे परिसर में जुआरियों का जमावड़ा लग जाता है, इसमें रेल कर्मचारी, रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (आरपीएफ) और गवर्नमेंट रेलवे पुलिस (जीआरपी) जवानों के साथ-साथ बाहर के जुआरी भी शामिल होते हैं। पुणे स्टेशन के पार्सल गेट के अंदर जहां आरपीएफ के मंडल सुरक्षा आयुक्त का कार्यालय है वहां से कुछ ही दूरी पर जुए की बाजियां लगाई जाती हैं, शेड के नीचे हर रोज लाखों के वारे-न्यारे होते हैं। सूत्र बताते हैं कि रेलवे क्वॉट्र्स से अवैध व्यापार संचालित करने वाले रेलकर्मियों द्वारा ही वरिष्ठ अधिकारियों की छत्रछाया में जुए का ये कारोबार चलाया जा रहा है। रेल परिसर में पुलिस की कार्रवाई का किसी तरह का भय नहीं रहता, इसलिए जुआरी बेधडक़ यहां अपनी किस्मत आजमाने आ जाते हैं। जानकारी के अनुसार पैसों के लेनदेन को लेकर छोटा-मोटा विवाद यहां अक्सर होता रहता है। चूंकि आरपीएफ और जीआरपी का भी इस गैरकानूनी कारोबार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर सहयोग रहता है, लिहाजा मामला सामने आने से पहले ही दबा दिया जाता है। रेलकर्मी अनिल गायकवाड़ और उसके साथियों द्वारा की गई मारपीट का मामला भी इसलिए सामने आया क्योंकि पीडि़त को गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

सबका हिस्सा
एक जवान ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि रात 8 से 9 के बीच ही जुआ शुरू हो जाता है। पुणे स्टेशन के अलावा खडक़ी, शिवाजीनगर और दूसरे छोटे स्टेशनों पर भी रात के अंधेरे में जुआरी सक्रिय रहते हैं। आरपीएफ और जीआरपी दोनों को इसकी जानकारी रहती है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं करता, क्योंकि इस अवैध कारोबार से जो कमाई होती है उसमें सबका हिस्सा होता है। जवान के मुताबिक ज्यादातर गोदाम, यार्ड और बंद पड़े केबिन में जुआ खेला जाता है। चिंचवड़ के सेंट्रल केबिन में चलने वाला जुआ रविवार को बंद रहता है।

फिर शुरू हुआ धंधा
कई दिनों तक पुणे स्टेशन से गायब रहे अनधिकृत हॉकर फिर से सक्रिय हो गए हैं। सूत्रों के अनुसार हॉकरों के मुखिया और कुछ अधिकारियों में चल रहा विवाद लंबी कोशिशों के बाद सुलझ गया है, अब हॉकर पहले की ही तरह प्लेटफॉर्म नंबर दो से 6 तक सामान बेच सकते हैं। ताड़ीवाला रोड स्थित रेलवे कॉलोनी से अवैध व्यापार संचालित किया जाता है। अनधिकृत हॉकर बकायदा सिर पर सामान रखकर रेल अधिकारियों के घर के सामने से प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर दाखिल होते हैं। हॉकरों पर कार्रवाई के अधिकार रेलवे के कमर्शियल विभाग से लेकर आरपीएफ तक के पास हैं, लेकिन हर कोई जिम्मेदारी दूसरों पर डालकर खुद को पाकसाफ बताता रहता है। गौरतलब है कि लोकमत समाचार के लगातार खुलासे और किंग कोबरा नामक संगठन के प्रदर्शन के बाद स्टेशन से अनधिकृत हॉकर पूरी तरह से गायब हो गए थे। तभी से सुलह का दौरा जारी था, जो हाल ही में खत्म हुआ है।

parking'अगर आप पुणे स्टेशन की निर्धारित पार्किंग में वाहन लगाकर सोच रहे हैं कि वो सुरक्षित है तो सावधान हो जाइए। हो सकता है कि आपके खून-पसीने की कमाई से खरीदी गई गाड़ी को कोई दूसरा लेकर चलता बने और पार्किंग ठेकेदार उसे रोकने की जहमत भी न उठाए। पार्किंग के लिए टू-व्हीलर से 20 और फोर व्हीलर से 40 रुपए वसूले जाते हैं, बावजूद इसके गाडिय़ों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। मारपीट पर उतारू रहने वाले ठेकेदार के कर्मचारियों का ध्यान महज इस बात पर रहता है कि किस तरह नो-पार्किंग में खड़ी गाडिय़ों से भी पैसे उगाहे जाएं। ताज्जुब की बात तो ये है कि सबकुछ जानते हुए भी रेल प्रशासन इस अंधेरगर्दी पर आंखें मूंदें बैठा है।

एक स्टिंग ऑपरेशन में पाया गया कि पार्किंग में गाडिय़ों की सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह की सतर्कता नहीं बरती जाती। ठेकेदार के कर्मचारी न तो वाहन का नंबर देखते हैं और न ही वापसी पर स्लिप (पर्ची) की मांग करते हैं। ऐसे में कोई भी किसी का वाहन महज 20 या 40 रुपए में लेकर चंपत हो सकता है। लगातार मिल रहीं शिकायतों के बाद टीम को पड़ताल के लिए स्टेशन पहुंची। एक प्रतिनिधि ने जीआरपी कार्यालय के सामने से दाखिल होते हुए पार्किंग में बाइक लगाई। इसके लिए बाकायदा दूसरे राज्य के नंबर वाली बाइक का इस्तेमाल किया गया ताकि वो आसानी से पहचान में आ जाए। इस दौरान प्रतिनिधि ने जानबूझकर कर्मचारियों से बातचीत की, लेकिन गाड़ी लगाने तक किसी ने भी नंबर देखकर पर्ची देने की जहमत नहीं उठाई। वापसी में एक कर्मचारी ने पूछा गाड़ी का नंबर क्या है और पर्ची पर लिखकर दे दिया। जो नंबर बताया गया, वो असली था भी या नहीं ये जांचने की उसने कोशिश तक नहीं की।

कुछ देर बाद दूसरा प्रतिनिधि बिना पर्ची के वही बाइक लेेने पहुंचा। वो काफी देर तक गाड़ी खोलने की कोशिश करता रहा, लेकिन किसी ने उससे सवाल नहीं किया। इतना ही नहीं बाहर निकलते वक्त उससे 20 रुपए शुल्क मांगने वाले ने ये तक जानना जरूरी नहीं समझा कि जो गाड़ी वो ले जा रहा है वो उसकी है भी या नहीं। प्रतिनिधि ने जानबूझकर उसे खुले पैसा नहीं दिए, ताकि उसे पर्ची लेने की याद आ जाए। मगर लापरवाही की आदत उसकी याददाश्त पर भारी पड़ी। कर्मचारी ने बिना पर्ची देखे ही गाड़ी को जाने दिया। इससे साफ होता है कि पुणे स्टेशन की पार्किंग में अपना कीमती वाहन लगाना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। गाड़ी चोरी होने पर पार्किंग ठेकेदार पुलिस में शिकायत कराने की सलाह देक अपना पल्ला झाड़ लेगा।
नो-पार्किंग में पार्किंग का भी पैसा
पुणे स्टेशन पर पुराने डीआरएम कार्यालय के बाहर के हिस्से को नो-पार्किंग जोन बनाया गया है, लेकिन इस नियम की हर रोज धज्जिया उड़ती हैं। ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी में वाहन चालक वहां गाडियां लगा जाते हैं और लौटने पर उन्हें पार्किंग ठेकेदार के कर्मचारियों की बदतमीजी का सामना करना पड़ता है। अगर कोई वाहन चालक पैसे देने से इंकार करता है तो कर्मचारी उसके साथ हाथापाई करने से भी नहीं चूकते। सोमवार को पुराने डीआरएम कार्यालय के ठीक सामने एक चालक अपनी कार खड़ी कर गया। ठेकेदार के कर्मचारी भी उस वक्त वहां मौजूद थे, लेकिन उन्होंने निर्धारित पार्किंग में कार लगाने की उसे सलाह नहीं दी। जब वो लौटा तो कर्मचारी ने 40 रुपए की मांग की, इस पर संबंधित चालक ने नो-पार्किंग का हवाला देते हुए पैसे देने से इंकार कर दिया। इस बात पर कर्मचारी इतना आग-बबूला हुआ कि कार के आगे आकर गाली-गलौच करने लगा। काफी देर तक विवाद चलता रहा, मगर थोड़ी दूरी पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने सुध लेना जरूरी नहीं समझा।

एक अन्य घटना में जीआरपी कार्यालय के सामने एक बाइक चालक नो-पार्किंग में बाइक लगाकर चला गया। वापसी पर जैसे ही उसने बाइक स्र्टाट की, पार्किंग ठेकेदार कर्मचारी उससे वसूली के आ धमका। यहां भी इंकार करने पर उसे गालियां देते हुए पुलिस में चलने की धमकी देना शुरू कर दिया। काफी देर के बाद भी जब कर्मचारी की उग्रता में कोई कमी नहीं आई तो पीडि़त चालक को मजबूरन उसे 20 रुपए देने पड़े। सूत्र बताते हैं कि पुलिस की छत्रछाया में ही कर्मचारियों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं।

क्या सो रहा है प्रशासन
पार्किंग कर्मचारियों की उदंडता के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं, बावजूद इसके रेल प्रशासन द्वारा कड़ी कार्रवाई नहीं की जा रही। जब कोई वरिष्ठ अधिकारी या मंत्री आता है तो सारी व्यवस्थाएं सुधर जाती हैं, लेकिन कुछ ही देर बार सबकुछ पहले जैसा हो जाता है। आखिर आम यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के बारे में रेलवे की कोई जिम्मेदारी बनती भी है या नहीं। स्टेशन पर मौजूद ट्रैफिक पुलिसकर्मी भी महज बातों के अलावा कभी मुस्तैदी से अपना काम करते नजर नहीं आते।