व्हाट्स एप पर अफसरों की खबर ले रहे लोहानी

  • गैंगमैन के मुद्दे पर हर रोज़ मांगा जा रहा अपडेट

रेलवे बोर्ड की कमान संभालने वाले अश्विन लोहानी उन अफसरों में शुमार हैं, जिन्हें आदेश की तामील कराना बखूबी आता है. पदभार ग्रहण करने के साथ ही लोहानी ने अधिकारियों के घरों में चाकरी कर रहे रेलकर्मियों को उनकी सही जगह भेजने के निर्देश दिए थे. तब से अब तक इस मामले में कितनी प्रगति हुई है, लोहानी इस पर स्वयं नज़र रखे हुए हैं. इतना ही नहीं उन्होंने सभी महाप्रबंधकों और मंडल रेल प्रबंधकों का एक व्हाट्स एप ग्रुप भी तैयार किया गया है. जिस पर इस बारे में रोजाना अपडेट लिया जाता है. लोहानी ने रेल अधिकारियों को स्पष्ट कर दिया है कि वीआईपी संस्कृति बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

सूत्रों के मुताबिक, लोहानी ने व्हाट्स एप ग्रुप ख़ासतौर पर इसलिए तैयार किया है, ताकि अफसरों के घरों से कर्मचारियों को निकालने के काम में तेज़ी लाई जा सके. सभी महाप्रबंधकों और मंडल रेल प्रबंधकों से रोजाना इस बारे में जानकारी देने को कहा गया कि किस विभाग से कितने कर्मचारियों को उनकी यूनिट वापस भेजा गया.

समय के पाबंद हुए अधिकारी
अश्विन लोहानी के चेयरमैन बनते कि समय पर कार्यालय पहुंचने वाले अधिकारियों की संख्या बढ़ गई है. इसके साथ ही लंच के बहाने घंटों दफ्तर से बाहर रहने वाले रेलकर्मी भी समय के पाबंद हो गए हैं. पुणे मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, आसपास रहने वाले अधिकांश अफसर लंच करने घर जाते हैं. पहले वो घंटों बाद वापस लौटते थे, लेकिन अब लंच टाइम समाप्त होते ही वापस आ जाते हैं.

हर्षा शाह: रेलवे के नाम की जिंदगी

  • रेलमंत्री ने भी काम को सराहा

जून में पुणे और मुंबई के बीच दौड़ने वाली डेक्कन एक्सप्रेस का जन्मदिन मनाया गया. यूं तो हर साल ही इस मौके पर केक काटकर ख़ुशी बयां की जाती है, लेकिन इस बार का जन्मदिन कुछ ख़ास रहा, ख़ास इस लिहाज़ से कि पहली बार किसी रेलमंत्री ने न सिर्फ आयोजन को सराहा बल्कि उस हस्ती के सम्मान में कुछ शब्द भी कहे, जो असल मायनों में इस परंपरा की जननी है. 70 वर्षीय हर्षा शाह पिछले कई सालों से डेक्कन क्वीन का जन्मदिन मानती आ रही हैं, विशेष बात यह है कि इस आयोजन के सभी इंतजाम वो स्वयं करती हैं, मसलन, केक की व्यवस्था करना, अतिथियों को निमंत्रण भेजना. शुरुआत में यह आयोजन महज कुछ यात्रियों की मौजूदगी में केक काटने भर तक ही सीमित था, लेकिन अब पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर जैसी सम्मानित हस्तियां इसका हिस्सा बन रही हैं. वैसे बात केवल जन्मदिन मनाने की ही नहीं है, हर्षा का जीवन पूरी तरह से रेलवे के लिए समर्पित है. चाहे बात यात्रियों की शिकायत की हो, रेलकर्मियों की परेशानी की या फिर रेलवे में सुधार की, वो हर पल मुस्तैद रहती हैं. हर्षा की लोकप्रियता का आलम यह है कि उन्हें न केवल पुणे बल्कि सेंट्रल रेलवे का हर छोटा-बड़ा अधिकारी जानता है. स्थानीय मीडिया में वो ‘रेलवे वाली आंटी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं.

हर्षा का रेलवे से रिश्ता दशकों को पुराना है. बचपन में वो अपने पिता के साथ अक्सर पुणे-मुंबई के बीच अप-डाउन किया करती थीं. उस दौर के अनुभवों ने उनके मन में रेलवे के प्रति प्रेम जागृत किया, जो अब तक कायम है. हर्षा रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष और एकमात्र सदस्य भी हैं, इस ग्रुप की स्थापना उन्होंने ही की थी. यह ग्रुप न सिर्फ यात्रियों की आवाज़ बुलंद करता है, बल्कि रेल कर्मियों की समस्याओं से भी उच्च अधिकारियों को अवगत कराता है. उम्र के इस पड़ाव में भी हर्षा हर रोज़ पुणे रेलवे स्टेशन का एक चक्कर लगाना नहीं भूलतीं फिर चाहे आंधी आए या तूफान. शायद यही वजह है कि रेलकर्मियों में उनके प्रति सम्मान भी है और भय भी. भय इसलिए कि यदि उनका कोई गलत काम हर्षा की नज़र में आ गया, तो फिर बचना मुश्किल है.

अपने खर्चे पर सेवा
वैसे तो रेलवे में सुधार के नाम पर कई प्रवासों ग्रुप अस्तित्व में हैं, लेकिन यह हर्षा की निस्वार्थ सेवा ही है कि रेलमंत्री रहते हुए सुरेश प्रभु ने अपने वीडियो संदेश में उनकी सराहना की. रेलवे प्रवासी ग्रुप को किसी तरह की वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं होती, हर्षा अपने खर्चे से ही इसे चला रही हैं. रेल बजट के दिनों में हर्षा की सक्रियता काफी बढ़ जाती है. पुणे को नई ट्रेन दिलवाने या किसी ट्रेन के फेरे बढ़वाने के लिए हर्षा दिल्ली के चक्कर लगाने से भी गुरेज नहीं करतीं.

आवारा कुत्तों को दिया आसरा
वैसे हर्षा का प्यार केवल रेलवे तक ही सीमित नहीं है, उनके दिल में बेजुबान जानवरों के लिए भी अथाह प्यार है. उन्होंने अपने घर में 6 आवारा कुत्तों को आसरा दिया हुआ है, जिनकी वो अपने बच्चों की तरह देखभाल करती हैं. हर्षा को अगर सड़क पर कोई घायल जानवर दिख जाए तो उसका इलाज कराए बिना वो आगे नहीं बढ़तीं. उन्होंने रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स के डॉग स्क्वायड की बेहतरी के लिए भी काफी काम किया है. वो इस संबंध में अधिकारियों से लगातार बात करती रहती हैं. उनका कहना है कि काम के हिसाब से स्क्वायड में कुत्तों की संख्या कम है, और जब तक यह संतुलन बन नहीं जाता वो प्रयास करती रहेंगी.

 

रेलवे से दलालों की छुट्टी करने के भले ही लाख दावे किए जाएं, लेकिन हकीकत वैसी ही है। पटना जंक्शन पर जब एक फौजी रिजर्वेशन के लिए गया तो बुकिंग काउंटर पर बैठे रेलकर्मी ने उसे सीट खाली न होने का हवाला देकर वापस लौटा दिया, लेकिन जब फौजी दलाल के मार्फत गया तो उसे तुरंत कन्फर्म सीट मिल गई। फौजी ने इसका Video भी तैयार किया, हालांकि अब देखने वाली बात यह है कि क्या रेलवे इस पर कोई एक्शन लेगा?
टीसी ने यात्री को मारे थप्पड़!

  • पुणे रेलवे स्टेशन की घटना, TC के बचाव में उतरा रेलवे.
पुणे रेलवे स्टेशन पर एक टीसी द्वारा यात्री से मारपीट का मामला सामने आया है। ‘आज का खबरी’ के पास इस घटना का वीडियो में जिसमें साफ तौर पर नजर आ रहा है कि पहले एक युवा टीसी बिना उकसावे के यात्री को थप्पड़ मारता है उसके बाद वहां मौजूद आरपीएफ कर्मी भी उसके साथ मारपिटाई करता है। हालांकि रेलवे का कहना है कि उक्त यात्री ने पहले टीसी के साथ बदसलूकी की थी। जानकारी के मुताबिक एक फरवरी रात 12.30 बजे के आसपास टिकट चेकिंग स्टाफ ने यात्री को प्लेटफॉर्म नंबर 6 से पकड़ा। इसके बाद उसे डीसीटीआई कार्यालय लेकर लाया गया और यहां उसके साथ मारपीट की गई। जबकि, रेलवे का कहना है कि यात्री से जब टिकट दिखाने को कहा गया तो उसने न केवल गालीगलौच की बल्कि टीसी की शर्ट भी फाड़ दी।
गलती उसकी थी पर हाथ उठाना गलत
सीनियर डिविजनल कमर्शियल मैनेजर क्रिष्णनथ पाटिल ने कहा, “उक्त यात्री के पास मान्य टिकट नहीं थी, जब टीसी ने उसे जुर्माना भरने को कहा तो उसने गालियां देना शुरू कर दिया। इसके बाद उसे टीसी ऑफिस लाया गया, यहां भी उसने रेलवे स्टाफ के साथ बदसलूकी की। हालांकि बाद में उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने लिखित माफी मांगी”। पाटिल का भी मानना है कि इस तरह टीसी का हाथ उठाना गलत है। उन्होंने कहा, हमने टीसी को इस बारे में हिदायत दे दी है।
आम हैं घटनाएं
एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा, “पुणे स्टेशन पर इस तरह की घटनाएं आम हैं। खासकर देर रात यात्रा करने वालों के साथ रेलवे स्टाफ और पुलिसकर्मी सबसे ज्यादा बदसलूकी करते हैं। यात्रियों से मोबाइल दिखाने को कहा जाता है और गलती से उसमें कोई अश्लील वीडियो क्लिप मिल गई तो जबरन वसूली की जाती है। जो पैसे देने से इंकार करता है उसके साथ मारपीट होती है”।
छोड़ा क्यों, कार्रवाई करते
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्षा हर्षा शाह ने कहा, “अगर यात्री ने बदसलूकी की थी तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए थी, ताकि भविष्य में लोगों को सबक मिल सके। महज माफीनामा लेकर उसे छोड़ना समझ से परे है। जहां तक बात टीसी द्वारा हाथ उठाए जाने की है तो वो बिल्कुल गलत है। सरकारी अधिकारी को इस तरह अपना आपा नहीं खोना चाहिए”।

खर्चों में कटौती बस दिखावा है!

  • रेलवे बोर्ड चेयरमैन की फिजूलखर्ची से उठे सवाल
  • निजी यात्रा के लिए किया था सैलून का इस्तेमाल
  • औपनिवेशिक परंपरा को आगे बढ़ा रहा रेलवे.

रेलवे को घाटे से उबारने की कोशिशों में लगी सरकार को उसके अफसर ही मुंह चिढ़ा रहे हैं। हाल ही में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन एके मित्तल ने अपनी निजी यात्रा के लिए भी स्पेशल कोच (सैलून) का इस्तेमाल किया। वो पहले शिर्डी गए फिर भीमाशंकर दर्शन के लिए पुणे आए। इस बेहद निजी दौरे पर रेलवे ने लाखों रुपए खर्चा किया। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या प्रधानमंत्री की सरकारी खर्चे में कटौती की नसीहत के प्रति अधिकारी गंभीर नहीं या फिर यह सब एक दिखावा है? आज का खबरी ने इस मुद्दे पर वरिष्ठ पत्रकार, नेता और रेलवे के जानकारों से बात की, सबका लगभग यही मानना है कि सरकार अपने अधिकारियों को नियंत्रित करने में नाकाम रही है।

अंग्रेजी मानसिकता हावी
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक कहते हैं, “न तो अधिकारियों पर पीएम की समझाइश का कोई असर है और न ही सरकार खर्चों में कटौती जैसी बात पर अमल कर रही है। यह सबकुछ एक दिखावा है। हमारे देश में अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही औपनिवेशिक ved-pratap-vaidikपरंपरा को ही आगे बढ़ाया जा रहा है। अंग्रेज अधिकारी जब गर्मियों में कहीं जाते थे, तो उनके लिए बर्फ की सिल्लियां रखी जाती थीं। क्योंकि उन दिनों एसी नहीं होते थे। उन्हें हर तरह की सुविधाएं दी जाती थीं, वही स्थिति अब भी है। अंग्रेजी मानसिकता हम पर हावी है, वरना एक आदमी के लिए पूरा सैलून देने की क्या जरूरत है”। डॉ. वैदिक आगे कहते हैं, “लोगों में आजकल नैतिकता बची ही नहीं है। अगर अपनी जेब से खर्चा करना हो, तो एक पैसा भी खर्च नहीं करेंगे। उन्हें यह समझ नहीं आता कि आदमी को बड़ा होना चाहिए, बड़ी कार में बैठने से कोई बड़ा नहीं हो जाता”।

इस औपनिवेशिक परंपरा के एक उदाहरण का जिक्र करते हुए डॉ.वैदिक ने कहा, “सालों पुरानी बात है। मैं उन दिनों रेलवे कमेटी का सदस्य था। किसी काम के चलते मुझे पॉडेचेरी से कन्याकुमारी जाना था। रेल अधिकारियों ने मुझे बताया कि मेरे जाने के लिए सैलून की व्यवस्था की गई है। जब मैंने इंकार किया तो मुझसे कहा गया कि सैलून एक मंत्री को लेने के लिए कन्याकुमारी जा रहा है। वहां पहुंचने के बाद मुझे पता चला कि कोई मंत्री नहीं आ रहा था, सारी कवायद मुझे खुश करने के लिए की गई थी। मैंने संबंधित अधिकारियों को बहुत डांटा। जब तक यह परंपरा समाप्त नहीं होती, देश का भला होने वाला नहीं है”।

सिर्फ मार्केटिंग करते हैं मोदी
पुणे कांग्रेस नेता रमेश धर्मावत को लगता है कि सरकार खर्चों में कटौती का सिर्फ दिखावा कर रही है। वो कहते हैं, “जिस व्यक्ति dharmavatपर पीएम ने खुद भरोसा जताया, वही अगर इस तरह से सरकारी पैसों की बर्बादी कर रहा है तो साफ है कि बचत की बात महज दिखावा है। धर्मावत आगे कहते हैं, नरेंद्र मोदी जो बोलते हैं, वो हो नहीं रहा। ऐसा इसलिए पीएम मार्केटिंग के लिए बोलते हैं। अब सर्जिकल स्ट्राइक के मुद्दे को ही ले लीजिए, इस पर कितनी मार्केटिंग हो रही है। सीमा पर जाकर जवानों के साथ दिवाली तो पहले भी लोग मनाते रहे हैं, लेकिन उसे कभी तरह प्रचारित प्रसारित नहीं किया गया। सरकारी अधिकारियों के खर्चे में किसी तरह की कटौती तो नहीं बल्कि उसमें इजाफा जरूर हुआ है। अगर ऐसे ही अधिकारी पैसा लुटाते रहे तो रेलवे घाटे से कभी उबर नहीं पाएगा”।

आम आदमी ही क्यों दे कुर्बानी?
Samachar4media.com के एडिटोरियल हेड अभिषेक मेहरोत्रा भी मानते हैं कि सरकार अपने अधिकारियों पर नियंत्रण रखने में अब तक नाकाम रही है। वो कहते हैं, इस बात में कोई दोराय नहीं कि मोदी अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि उनके abhiमंत्री और ब्यूरोक्रेट्स किस दिशा में जा रहे हैं। यह सोशल मीडिया का दौर है, कोई भी बात ज्यादा देर तक छिपी नहीं रह सकती। यह खबर सरकार के लिए एक आईना है, उसे इस बात पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए कि जो कहा जा रहा है वह आकार लेता नजर आए। अभिषेक आगे कहते हैं, सरकार गैस सब्सिडी के लिए लक्ष्मण रेखा खींच रही है, लेकिन अपने अधिकारियों के खर्चे पर उसका नियंत्रण नहीं है। क्या देश हित में सहूलियतों की कुर्बानी देना सिर्फ आम आदमी का काम है? सबसे पहले पीएम को ब्यूरोक्रेट्स के लिए लक्ष्मण रेखा खींचनी चाहिए, जनता बाद में आती है। पहले वो अधिकारियों को सुधारें, जनता तो हमेशा तैयार है पैसे देने के लिए। सरकार जिनते टैक्स लगाएगी, वो तो देती रहेगी”।

रेलमंत्री उठाएं कदम
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्षा हर्षा शाह कहती हैं, “जब रेलवे बोर्ड के चेयरमैन ही निजी यात्रा के लिए सरकारी सुख सुविधाओं का harsha-shahदोहन करेंगे, तो बाकि अधिकारियों से क्या उम्मीद की जा सकती है। चेयरमैन को तो उदाहरण पेश करना चाहिए था। यदि वह यदि सैलून के बजाए आम यात्रियों की तरह आते, तो इससे लोगों में रेलवे के प्रति विश्वास मजबूत होता और फिजूल खर्ची करने वाले अधिकारियों को भी एक सबक मिलता। वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है। इससे पहले भी कई अधिकारी निजी यात्रा पर सरकारी सहूलियतों का इस्तेमाल कर चुके हैं। एक तरफ यात्रियों को पर्याप्त सुविधाएं देने के लिए रेलवे के पास पैसा नहीं है, और दूसरी तरफ इस तरह पैसा लुटाया जा रहा है। रेलमंत्री को चाहिए कि वो अपने अफसरों को सादगी का पाठ पढ़ाएं, तभी सुधार संभव है”।

निजी यात्रा पर लुटाई रेलवे की कमाई!

-शिर्डी, भीमाशंकर दर्शन के लिए स्पेशल कोच लेकर पहुंचे रेलवे बोर्ड चेयरमैन 
-सरकारी खर्चों में कटौती की पीएम की पहल का उड़ाया मजाक
-दौरे को आधिकारिक नाम देने की कोशिश में जुटा रेलवे.
एक तरफ जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकारी खर्चे में कटौती की बात कर रहे हैं, ताकि देश के विकास पर ज्यादा ध्यान दिया जा सके। वहीं रेल अधिकारी उनकी कोशिशों पर पलीता लगाने में जुटे हैं। हाल ही में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन (सीआरबी) एके मित्तल railनिजी यात्रा पर पुणे आए थे, लेकिन सरकारी सुख सुविधाओं का दोहन करने के लिए उसे आधिकारिक दौरे का रूप दिया गया। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, सीआरबी की यह यात्रा पूरी तरह से निजी थी। वे पहले शिर्डी गए फिर अष्टविनायक के दर्शन के लिए पुणे आए। उन्होंने न तो कोई निरीक्षण किया और न ही कोई बैठक ली। जबकि इस कवायद में रेलवे के लाखों रुपए जरूर खर्च हो गए। वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है, रेल अधिकारी अक्सर अपनी निजी यात्राओं को आधिकारिक रूप देकर इसी तरह घाटे में चल रहे रेलवे की कमर तोड़ते रहते हैं।
ऐसा था कार्यक्रम 
सीआरबी आठ अक्टूबर को अपनी स्पेशल कोच (सैलून) में सवार होकर दिल्ली से कोपरगांव के लिए निकले। उनकी कोच को 12628 एक्सप्रेस में अटैच किया गया था। कोपरगांव से वह सीधे शिर्डी दर्शन के लिए चले गए। 10 अक्टूबर को 12150 एक्सप्रेस से अपने सैलून में कोपरगांव से पुणे के लिए रवाना हुए। पुणे पहुंचने के बाद सीआरबी अपने काफिले के साथ सबसे पहले भीमाशंकर के दर्शन के लिए गए। दूसरे दिन उन्हें अष्टविनाक के दर्शन के लिए जाना था। लेकिन पारिवारिक कारणों के चलते उन्हें बीच में ही दिल्ली वापस लौटना पड़ा। इस छह दिनों के टूर को आधिकारिक बनाने के लिए आखिरी दिन पुणे में रेल अधिकारियों की बैठक बुलाई गई थी। तय कार्यक्रम के मुताबिक सीआरबी को 13 अक्टूबर को 12779 एक्सप्रेस से निजामुद्दीन लौटना था।
पानी की तरह बहाया पैसा
सीआरबी की निजी यात्रा पर रेलवे ने पानी की तरह पैसा बहाया। सूत्रों के मुताबिक, उन्हें भीमाशंकर ले जाने के लिए 10 गाडि़यों का काफिला मौजूद था। जिसमें कुछ किराए पर मंगाई गई थीं। जाहिर है इसका भुगतान रेलवे ने अपनी जेब से किया होगा। बात केवल किराए तक ही सीमित नहीं है, सीआरबी को खुश करने के लिए सभी स्टेशनों को चमकाया गया। जीएम स्तर के अधिकारी काम छोड़कर सीआरबी की आवभगत में लगे रहे। इतने सारे अधिकारियों के जमावड़े पर रेलवे का कितना खर्चा हुआ होगा इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चेयरमैन सैलून से आए, जिसका एक बार आने जाने का खर्चा ही लाखों में आता है।
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काम चलाऊ काम
पुणे रेल मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा, सीआरबी के आने के 10 दिन पहले से ही तैयारियां शुरू हो गई थीं। उनकी गुड लिस्ट में शामिल होने के लिए विभाग प्रमुखों ने फंड डायवर्ड करके वो काम भी करवाए, जिनकी कोई जरूरत नहीं थी। अधिकारी के मुताबिक, ऐसे मौकों पर किए जाने वाले काम की कोई गुणवत्ता नहीं होती। प्रशासन बस यही चाहता है कि वरिष्ठ अधिकारियों के रुकने तक सबकुछ सही दिखे। आमतौर पर प्रशासनिक दौरे की जानकारी पहले से ही दे दी जाती है, लेकिन सीआरबी पुणे में क्या करने वाले हैं यह किसी को नहीं बताया गया था। केवल आखिरी दिन के शेड्यूल में बैठक का जिक्र था। अगर सीआरबी निजी यात्रा पर नहीं आए थे, तो फिर बाकी दिन उन्होंने क्या किया? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
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प्रधानमंत्री से बड़े हैं सीआरबी?
कई रेल अधिकारी सवाल उठाते हैं कि जब प्रधानमंत्री मेट्रो में सफर करके यात्रियों का हालचाल जान सकते हैं, तो क्या सीआरबी उनसे भी बड़े हैं? स्पेशल कोच में बैठने के बजाए यदि चेयरमैन पैसेंजर गाड़ी में सवार होकर यात्रियों से रूबरू होते तो समस्याओं को ज्यादा करीब से समझ पाते। साथ ही यात्रियों में भी रेलवे के प्रति विश्वास पुख्ता होता। उनके मुताबिक, यदि सीआरबी ही अपनी सुख सुविधाओं पर रेलवे का पैसा बर्बाद करेंगे, तो फिर बाकी रेलकर्मियों से क्या उम्मीद की जा सकती है?
मुझे कुछ नहीं पता
इस संबंध में पुणे रेल मंडल के जनसंपर्क अधिकारी ने कहा, मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है, मैं उस समय छुट्टी पर था। लेकिन सीआरबी आधिकारिक दौर पर ही पुणे आए थे।
पीएम ने जताया था विश्वास
मित्तल पर प्रधानमंत्री ने विश्वास जातते हुए उन्हें दोबारा रेलवे बोर्ड चेयरमैन नियुक्त किया था। सीआरबी के पद से रिटायर्ड होने के बाद उन्हें दोबारा वही जिम्मेदारी दिए जाने को लेकर रेल अधिकारियों मे ंनाराजगी थी, क्योंकि इस वजह से कई अधिकारियों के प्रमोशन रुक गए। वही मित्तल आज पीएम की कोशिशों को पलीता लगाने में जुटे हैं। ऐसे वक्त में जब रेलवे को घाटे से उबारने की कोशिशें जारी हैं, मित्तल को खर्चों में कटौती का उदाहरण पेश करना चाहिए था। लेकिन वो अपनी निजी यात्रा पर भी रेलवे की कमाई लुटा रहे हैं।
शिकायत करें भी किससे?
रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्ष हर्षा शाह ने कहा, मुझे इस बारे में जानकारी मिली थी कि सीआरबी ने निजी यात्रा के harsha shahलिए भी सैलून का इस्तेमाल किया। अधिकांश अधिकारी इसी तरह से रेलवे की कमाई को पानी में बहाते हैं। इस संबंध में शिकायत करें भी तो किससे? पूरा का पूरा महकमा एक ही दिशा में चल रहा है। पीएम और रेलमंत्री जो प्रयास कर रहे हैं, उन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास अधिकारियों को करना चाहिए, लेकिन उन्हें सिर्फ अपनी सुख सुविधाओं का ख्याल है। सीआरबी यदि सैलून के बजाए पैसेंजर ट्रेन में सवार होकर आते तो बाकी अधिकारियों को भी एक सबक मिलता।
यहां भी वही हाल
कुछ दिनों पहले मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में भी मुख्य यात्री परिवहन प्रबंधक जबलपुर से अपने बेटे को परीक्षा दिलवाने के लिए सैलून लेकर आए थे। वहां, भी निजी यात्रा को सरकारी बनाने की कोशिश की गई। जानकारी के मुताबिक, प्रबंधक राजेश पाठक के बेटे की आईईएस इंजीनियरिंग कॉलेज में परीक्षा थी, इसके लिए वो स्पेशल सैलून में सवार होकर हबीबगंज स्टेशन पहुंचे। पाठक ने भोपाल रेलवे स्टेशन का निरीक्षण तक नहीं किया, जो उनके प्रोग्राम में शामिल था। वो पूरे दिन सैलून में ही आराम फरमाते रहे।
शताब्दी, राजधानी और दुरंतो में सफर महंगा

शताब्दी, दुरंतो और राजधानी ट्रेनों में सफर महंगा हो गया है। 9 सितंबर से इन ट्रेनों में यात्रा करने वालों को ज्यादा किराया चुकाना होगा। रेलवे ने इन गाडि़यों में फ्लेक्सी किराया सिस्टम लागू करने का ऐलान किया है। इसके तहत डिमांड के साथ किराया भी बढ़ता shatabdiजाएगा। किराया बढ़ाने के लिए 10 फीसदी के स्लैब बनाए गए हैं। पहली 10 फीसदी सीटों पर तो मूल किराया ही लिया जाएगा, लेकिन इनके फुल होते ही अगली 10 फीसदी सीटों के लिए किराया ज्यादा भरना होगा। इस प्रकार 10-10 फीसदी के अनुपात में 10 फीसदी किराया तब तक बढ़ाया जाएगा, जब तक कि यह 50 फीसदी तक नहीं पहुंच जाता। इस हिसाब से देखें तो ट्रेन के आधे यात्रियों को कम से कम 50 प्रतिशत अधिक किराया देना होगा।

अपर क्लास को छूट
महत्वपूर्ण बात ये है कि इस किराया सिस्टम को फर्स्ट एसी और एग्जिक्यूटिव क्लास पर लागू नहीं किया गया है। इन दोनों ही श्रेणियों के यात्रियों के किराए में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं की गई है और न ही डिमांड बढ़ने पर इन यात्रियों को अतिरिक्त किराया चुकाना होगा। रेलवे ने साफ किया है कि जो भी टिकट रद्द होंगे, उनके लिए करेंट रेट पर ही किराया लिया जाएगा।

हादसे के इंतजार में रेलवे!

जर्जर हो चुका है खड़की Railway Station पर लकड़ी का शेड……

पुणे रेल मंडल की लापरवाही कभी भी हादसे का सबब बन सकती है। खड़की स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 2 पर बना लकड़ी का शेड railwayजर्जर स्थिति में पहुंच गया है। हालात ये हो चले हैं कि लकड़ी गलकर कई जगह से टूट रही है, बावजूद इसके रेल प्रशासन नींद से जागने को तैयार नहीं। खड़की स्टेशन पर सबसे ज्यादा लोकल यात्रियों की भीड़ होती है, इसके अलावा कुछ एक्सप्रेस ट्रेनें भी यहां रूकती हैं। गर्मी के चलते अधिकतर यात्री सूरज की तपन से बचने के लिए शेड का सहारा लेते हैं, ऐसे में यदि शेड का छोटा हिस्सा भी गिरता है, तो जान माल का काफी नुकसान हो सकता है। एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने कहा, “प्रशासन महज पुणे स्टेशन तक सीमित होकर रह गया है। आला अधिकारी अक्सर पुणे स्टेशन का दौरा करते हैं, इसलिए छोटे स्टेशनों पर ध्यान नहीं दिया जाता”। अधिकारी के मुताबिक, पुणे मंडल में खड़की सहित कई ऐसे स्टेशन हैं, 20160422_072249जहां यात्री सुविधाएं नदारद हैं।

तो हटाया क्यों नहीं
सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि प्लेटफॉर्म नंबर दो को टीन शेड से कवर करने के बाद भी पुराने लकड़ी के शेड को हटाया नहीं गया है। अगर रेल प्रशासन की नजर में पुराना शेड जरूरी है, तो उसकी मरम्मत पर ध्यान क्यों नहीं दिया जा रहा? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। इस संबंध में पुणे मंडल के जनसंपर्क अधिकारी मनोज झवर से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन बात नहीं हो सकी।

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मुझे जानकारी नहीं
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इस संबंध में खड़की स्टेशन के स्टेशन मास्टर (एडमिनिस्ट्रेशनने कहा, यह सारी प्लानिंग हेड ऑफिस से होती है। उन्होंने इस बारे में क्या सोचा है, इसकी मुझे जानकारी नहीं है। यहां कवर शेड कम है, मुझे लगता है इस वजह से पुराने शेड को नहीं हटाया गया होगा।

समझ से परे
खड़की से लोनावला के बीच सफर करने वाले प्रशांत रणपिसे ने कहा, वैसे तो हम लकड़ी के शेड के नीचे जाने से बचते हैं, लेकिन जब धूप सीधी होती है, तो इसका सहारा लेना ही पड़ता है। एक बात मुझे समझ नहीं रही है कि जब बड़ा शेड डाला गया है, तो फिर इसे हटाया क्यों नहीं जा रहा। या तो प्रशासन शेड दुरूस्त करे और यदि ऐसा नहीं कर सकता तो फिर इसे पूरी तरह हटा दे। 

हादसे पूछकर नहीं होते
इस संबंध में रेलवे प्रवासी ग्रुप की अध्यक्षा हर्षा शाह ने कहा, प्रशासन को इस पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। हादसे किसी से पूछकर नहीं होते, यदि शेड गिर गया तो प्रशासन की ही बदनामी होगी। अगर पुणे मंडल को यात्रियों की चिंता नहीं है, तो कम से कम अपनी बदनामी के डर से ही शेड की मरम्मत करा दे। 

 

पानी पिया तो चलती ट्रेन से बाहर लटकाया

किसी दूसरे यात्री की बोतल से पानी पीने की कीमत एक लड़के को तकरीबन चार घंटे तक चलती Train से बाहर लटककर चुकानी पड़ी। trainआरोपियों ने उसे खिडक़ी से न केवल उल्टा लटकाया बल्कि बेरहमी से पिटाई भी की। यह घटना पाटलीपुत्र लोकमान्य तिलक टर्मिनस एक्सप्रेस में मध्यप्रदेश के जबलपुर से इटारसी रेलवे स्टेशन के बीच 25 मार्च को हुई। घटना का वीडियो सामने आने के बाद रेल प्रशासन में हडकंप मच गया है। यहां गौर करने वाली बात ये है कि जब आरोपी लड़के को खिड़की से उल्टा लटका रहे थे और मारपीट कर रहे थे, तब किसी ने भी उसे बचाने की कोशिश नहीं की। उल्टा लोग पूरी घटना को अपने मोबाइल में कैद करते रहे। पीडि़त युवक का नाम सुमित है। जानकारी के मुताबिक, सुमित ट्रेन की एस-2 बोगी में जबलपुर से सवार हुआ था। ट्रेन चलने के बाद जब उसे प्यास लगी तो उसने किसी यात्री की बोतल से थोड़ा पानी पी लिया। इस पर कुछ लड़के इतने नाराज हुए कि उन्होंने चेन पुलिंग कर ट्रेन रोकी और सुमित को खिडक़ी से उल्टा लटका दिया। रात में करीब चार घंटे तक वो ऐसे ही लटका रहा, इस दौरान ट्रेन की स्पीड 100 किमी प्रति घंटा थी। ट्रेन बीच में जहां भी रुकती आरोपी नीचे उतरकर बेल्ट से सुमित की पिटाई करते। इटारसी स्टेशन आने पर कुछ वेंडरों ने सुमित को नीचे उतारा।

बिहार के हैं आरोपी
trainसभी आरोपी बिहार के पटना के रहने वाले हैं और वे किसी परीक्षा के लिए मुंबई जा रहे थे। शुरुआत में जीआरपी ने इस मामले को हल्के में लिया, लेकिन जब वीडियो सामने आया तो उसके होश उड़ गए। आनन-फानन में वरिष्ठ अधिकारियों ने आरोपियों पर केस दर्ज करने के आदेश दिया। जीआरपी ने विक्की, रवि प्रसाद और बलराम के खिलाफ विभिन्न धाराओं में केस दर्ज कर लिया है।

Railway: अनधिकृत हॉकरों के खिलाफ छेड़ी जंग

Railway Passengers की सुरक्षा के लिए मुकेश की मुहिम

ट्रेन में सफर के दौरान अक्सर हमारा सामना अनधिकृत हॉकरों से होता है। यह जानते हुए भी कि ये हॉकर यात्रियों की सेहत से खिलवाड़ कर सकते हैं, हम किसी तरह की शिकायत की जहमत नहीं उठाते। शायद इसकी मुख्य वजह सरकारी उदासीनता है। हमें मालूम है कि अनधिकृत हॉकरों को रेल Railwayपरिसर और ट्रेनों से बाहर रखने की जिम्मेदारी रेलवे की है, और जब वही गंभीरता नहीं दिखाता तो हमारी सक्रियता किस काम की। लेकिन एक शख्स है, जिसकी सोच हमसे बिल्कुल जुदा है। वो मानता है कि रेल प्रशासन की नींद तोड़ने के लिए सबसे पहले हमें अपनी खामोशी तोड़नी होगी। उस शख्स का नाम है मुकेश तांतेड़। महज 28 वर्षीय मुकेश अनधिकृत हॉकरों के खिलाफ जंग का ऐलान कर चुके हैं। सफर के दौरान उन्हें जब भी कोई अवैध हॉकर दिखाई देता है, वे टीटीई के मार्फत शिकायत दर्ज करवाना नहीं भूलते। मूलरूप से  हुबली  निवासी मुकेश को काम के सिलसिले में अक्सर एक शहर से दूसरे शहर आना जाना पड़ता है। ऐसे में हॉकरों से उनका आमना-सामना आम बात है। मुकेश ने सबसे ज्यादा शिकायतें मध्य रेलवे में दर्ज करवाई हैं। जिसमें से मुंबई ने उनकी कुछ शिकायतों पर कार्रवाई भी की, लेकिन पुणे रेल मंडल की तरफ से उन्हें कोई खास रिस्पॉन्स नहीं मिला। आज का खबरी से बातचीत में मुकेश ने कहा, अनधिकृत हॉकर जो खाद्य सामग्री बेचते हैं, उसकी क्वालिटी सब जानते हैं। बावजूद इसके रेलवे उनके खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाता। ट्रेन में टीटीई के साथ-साथ आरपीएफ-जीआरपी के जवान भी होते हैं, लेकिन हॉकरों पर किसी ने खुद कार्रवाई की हो मैंने ऐसा आज तक नहीं देखा। अवैध हॉकरों के हौसले इसलिए बुलंद रहते हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि कार्रवाई नहीं होगी।

कैसे हुई शुरुआत
अनधिकृत File Photoहॉकरों के खिलाफ मुकेश की जंग की शुरुआत कुछ वक्त पहले ट्रेन सफर के दौरान ही हुई। मुकेश बताते हैं, मैं अपने परिवार के साथ हुबली जा रहा था। ट्रेन के पुणे स्टेशन छोड़ते ही कुछ हॉकर हमारी बोगी में सवार हुए। उन्होंने न तो कोई यूनिफॉर्म पहनी थी और न ही उनके पास कोई आईकार्ड था। वे दोगुने दाम पर सामान बेच रहे थे, जिसे लेकर मेरी उनसे कहासुनी हो गई। जब मैंने शिकायत की धमकी दी तो उनमें से एक हॉकर ने अपने कुछ साथियों को फोन कर दिया। ट्रेन के अगले स्टेशन पहुंचते ही कुछ और लोग हमारी बोगी में धमके। उन हॉकरों से काफी देर तक हमारा विवाद हुआ। उसी दिन मैंने ठान लिया कि इन अनधिकृत हॉकरों के खिलाफ अभियान छेडक़र रहूंगा।

हुई कार्रवाई
मुकेश ने अलग-अलग रेल मंडलों में सैंकड़ों शिकायतें दर्ज कराई हैं। उन्हें सबसे अच्छा रिस्पॉन्स वेस्टर्न रेलवे से मिला। इसके अलावा मुंबई रेल मंडल ने भी मुकेश की कुछ कम्प्लेंट्स के आधार पर कार्रवाई की जानकारी उन्हें दी। लेकिन पुणे मंडल की प्रतिक्रिया काफी फीकी रही। मुकेश कहते हैं, पुणे से जो जवाब आए उससे एक में इस बात का जिक्र था कि पिछले कुछ वक्त में कितने अनधिकृत हॉकरों पर कार्रवाई की गई। जबकि दूसरे में हॉकरों के अस्तिव पर ही सवाल उठाए गए।

दोस्त भी हुए प्रेरित
अवैध हॉकरों के खिलाफ मुकेश की जंग ने उनके कई दोस्तों को भी प्रभावित किया है। मुकेश के दोस्तों को भी सफर के दौरान अगर कोई हॉकर नजर आता है, तो वो उसकी शिकायत जरूर दर्ज करवाते हैं। मुकेश कहते हैं, हमारी शिकायतों पर रेलवे वास्तव में कितनी कार्रवाई करता है, ये तो नहीं पता। लेकिन हम आवाज उठाना बंद नहीं करेंगे। आखिरकार ये लाखों यात्रियों की सेहत का मामला है। मेरा मानना है कि अगर बाकी यात्री भी आवाज उठाएं, तो अनधिकृत हॉकरों की समस्या कुछ हद तक सुलझ सकती है।