सिंधु संधि रद्द नहीं होगी! ये हैं कारण

उरी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच पैदा हुए तनाव के मद्देनजर सिंधु समझौते पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। देश का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि भारत इस समझौते को तत्काल प्रभाव से रद्द करे, ताकि पाकिस्तान को उसके दुस्साहस का सबक सिखाया जा सके। सरकार के भीतर भी यह आवाज अब जोर पकड़ने लगी है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने इस विषय पर संभावनाएं तलाशना शुरू कर दिया है। हालांकि यह मानना बेहद मुश्किल है कि भारत समझौता रद्द करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। यदि वे ऐसा करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का सामना तो करना ही पड़ेगा, इस बात की भी आशंका बनी रहेगी कि भविष्य में उसे जल संकट से दो चार होना पड़े।

36 फीसदी का नुकसान
सिंधु नदी का उद्गम स्थल चीन है। गौर करने वाली बात यह है कि भारत पाकिस्तान की तरह उसने जल बंटवारे पर कोई अंतरराष्ट्रीय संधि नहीं की है। इस लिहाज से वह किसी भी स्तर तक जाने के लिए स्वतंत्र है। चीन कई मौकों पर यह साफ कर चुका है कि मुश्किल वक्त में वह पाकिस्तान के साथ देगा। ऐसे में यदि भारत सिंधु समझौते को रद्द करता है, तो चीन सिंधु का बहाव मोड़ने का निर्णय ले सकता है। उसे इस तरह के कामों में महारथ हासिल है। थोड़ा आगे जाकर अगर इस निर्णय के दुष्प्रभावों पर गौर करें तो हम पाएंगे कि इससे भारत को नदी के 36 फीसदी पानी से हाथ धोना पड़ेगा। जो निश्चित तौर पर वो कभी नहीं चाहेगा।

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पड़ेगी दोहरी मार
बात केवल सिंधु नदी की नहीं है। पाकिस्तान को तकलीफ में देखकर यदि चीन भारत से नाराज होता है, तो मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी। उत्तर पूर्वी भारत में बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम स्थल भी चीन में ही है। ब्रह्मपुत्र चीन में यारलुंग जांग्बो नाम से पहचानी जाती है। यह नदी भारत से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। ब्रह्मपुत्र के पानी पर भारत के साथ साथ बांग्लादेश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भी निर्भर है। चीन ब्रह्मपुत्र का बहाव मोड़ सकता है, बीच में ऐसी खबरें सामने आ भी चुकी हैं। चीन ने ब्रह्मपुत्र पर तकरीबन 11 बड़े बांध बनाए हैं। यदि नदी के बहाव में परिवर्तन होता है तो भारत की धरती तो सूखेगी ही, बांग्लादेश भी उसका दुश्मन बन जाएगा। यानी उसे दोहरी मार सहनी पड़ेगी।

पानी की तरह बहेगा पैसा
यदि भारत सभी आशंकाओं को नकाराते हुए सिंधु समझौते को रद्द करने का कदम उठाता है, तो भी उसे कई व्यावहारिक कठिनाइयों से गुजरना होगा। पानी रोकने के लिए कई बांध और नहरें बनानी होंगी। जिनके लिए बड़े पैमाने पर खर्चा करना होगा और समय भी काफी लगेगा। बात केवल पैसे की नहीं है, बांध बनेंगे तो विस्थापन की समस्या पैदा होगी। इतना ही नहीं पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी भारत को झेलने पड़ सकते हैं।

सिंधु का महत्व
सिंधु दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। इसकी लंबाई 3000 किलोमीटर से भी ज्यादा है, दूसरे शब्दों में कहें तो यह गंगा नदी से भी बड़ी है। सहायक नदियां चिनाब, झेलम, सतलुज, राबी और ब्यास के साथ इसका संगम पाकिस्तान में होता है। सिंधु नदी बेसिन तकरीबन साढ़े ग्यारह लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। सिंधु नदी का इलाका 11ण्2 लाख किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। ये पाकिस्तान में 47 प्रतिशत, भारत में 39 प्रतिशत, चीन में 8 प्रतिशत और अफगानिस्तान में 6 प्रतिशत है। एक अनुमान के मुताबिक 30 करोड़ लोग सिंधु नदी के आसपास के इलाकों में रहते हैं।

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क्या है सिंधु संधि
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अयूब खान के बीच 1960 में सिंधु समझौता किया गया। इसके तहत सिंधु नदी बेसिन में बहने वालीं 6 नदियों को पूर्वी और पश्चिमी दो हिस्सों में बांटा गया। पूर्वी भाग में बहने वाली नदियों सतलुज, रावी और ब्यास के पानी पर भारत का पूर्ण अधिकार है। जबकि पश्चिमी हिस्से की सिंधु, चिनाब और झेलम पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र में हैं। भारत इन नदियों के पानी का केवल सीमित इस्तेमाल कर सकता है। वह इन नदियों पर हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट बना सकता है, लेकिन यह ध्यान रखते हुए कि नदी का पानी रोका नहीं जाए। देश में कृषि के लिए इन नदियों के पानी का इस्तेमाल होता है।

भारत को एडवांटेज
सिंधुं समझौते में भारत के पास एडवांटेज यह है कि नदियां भारत से होते हुए पाकिस्तान पहुंचती हैं। ऐसे में वो यदि चाहे तो पानी का बहाव रोक सकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान घबराया हुआ है। पाक के दो तिहाई हिस्से में सिंधु और इसकी सहायक नदियां बहती हैं। एक अनुमान के मुताबिक, करीब उसका 65 प्रतिशत भू भाग सिंधु बेसिन पर ही है। पाकिस्तान ने बिजली बनाने के लिए इस पर कई बांध बनाए हैं। इसके अलावा खेती के लिए भी सिंधु नदी के पानी का उपयोग करता है। अगर सिंधु का बहाव रोका जाता है, तो पाकिस्तान बूंद बूंद के लिए मोहताज हो जाएगा।

अंतरराष्ट्रीय दबाव
सिंधु समझौते को रद्द न करने को लेकर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी है। चूंकि यह दो देशों के बीच का मामला है, इसलिए भारत को वैश्विक मंच पर कई सवालों के जवाब देने होंगे। पाकिस्तान इसे मानवाधिकारों से जोड़कर भारत के खिलाफ माहौल तैयार करेगा। भारत की बांग्लादेश और नेपाल के साथ जो जल संधियां हैं उन पर भी प्रभाव पड़ सकता है। ये भी एक वजह है कि सरकार बात इतनी आगे नहीं बढ़ने देगी।

विकल्प तो है
पानी पर वैश्विक झगड़ों को लेकर किताब लिख चुके ब्रह्म चेल्लानी का मानना है कि भातर वियाना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 के तहत इस आधार पर संधि से पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान आतंकी गुटों का इस्तेमाल उसके खिलाफ कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने कहा है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन होता है, तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है।

खून और पानी साथ नहीं बह सकते

सिंधु जल समझौते पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तानी को चेतावनी देते हुए कहा है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। पीएम ने इस मुद्दे पर सोमवार को एक बैठक की। गौरतलब है कि उरी हमले के बाद मांग की जा रही है कि पाकिस्तान के modiसाथ सिंधु समझौते को रद्द किया जाए। सरकार के भीतर भी इस तरह की मांग अब जोर पकड़ने लगी है। ये संधि 1960 में हुई थी। इसके तहत सिंधु, ब्यास, रावी, सतलुज, चेनाब और झेलम नदियों के पानी का भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारा होता है। पिछले सप्ताह विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने समझौते पर पुनर्विचार के संकेत दिए थे। उन्होंने कहा था कि कोई भी समझौता एक तरफा नहीं हो सकता।

हुआ नुकसान
कुछ वक्त पहले जम्मू कश्मीर के उप मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने कहा था कि सिंधु जल समझौते के कारण राज्य को काफी नुकसान हुआ है। इसके तहत राज्य की जनता सिंधु नदी के पूरे पानी का इस्तेमाल नहीं कर सकती। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सिंध ुजल समझौते पर दाखिल जनहित याचिका पर जल्द सुनवाई से इंकार कर दिया है। वकील एमएल शर्मा की ओर से दाखिल की गई इस याचिका में समझौते को असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है।

AGRA: ताज है, विकास नहीं

  • ऐतिहासिक विरासत से संपन्न शहर मूलभूत जरूरतों के लिए भी तरस रहा 

Taj Mahal

Agra की पहचान ऐतिहासिक रूप से संपन्न शहरों में होती है। यहां छोटी-बड़ी कई ऐतिहासिक धरोहरें हैं, जिसमें ताजमहल सबसे प्रमुख है। ताज के दीदार के लिए हर साल लाखों पर्यटक आगरा आते हैं। इसके बावजूद सरकार यहां के विकास को लेकर गंभीर नहीं। आगरा को देखकर आज भी ऐसा लगता है, जैसे ये शहर पुरातनकाल से बाहर नहीं निकल सका है। सालों पहले मुख्य सड़कों  की चौड़ाई जितनी थी, वो आज भी लगभग उतनी ही है। जबकि इस दरमियान आबादी और वाहनों की संख्या में जबदस्त इजाफा हुआ है। ऐसा लगता है जैसे राज्य सरकार ने ऐतिहासिक धरोहरों के स्वरूप में बदलाव पर रोक संबंधी अदालती आदेश को पूरे शहर के संदर्भ में मान लिया है। इसलिए वो कुछ भी बदलना नहीं चाहती। मूलभूत जरूरतें जैसे बिजली-स्वच्छ पानी आज भी आगरा के लिए अबूझ पहेली बनी हुई हैं। स्वच्छा आगरा का नारा यहां भी बिल्कुल वैसा ही नजर आता है, जैसा प्रधानमंत्री का स्वच्छ भारत अभियान। पूरे शहर की बात छोड़ दीजिए ताजमहल के आसपास और यमुना किनारे की गंदगी बिना चश्मे के भी देखी जा सकती है। ऐसे में सरकार का मूल समस्याओं को सुलझाने के बजाए पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए महज अस्थायी विकल्पों तक सीमित होकर रहना आगरावासियों को अब अखरने लगा है। उनका मानना है कि शहर की आतंरिक जरूरतों को पूरा करके एवं सुनियोजित विकास को आगे बढ़ाकर भी पर्यटकों को अपनी ओर खींचा जा सकता है। बैलून उड़ाने जैसी योजनाओं को अमल में लाने से ज्यादा जरूरी ऐसी व्यवस्था करना है कि पर्यटक आगरा से अच्छी यादों के साथ विदा हो।

नाइट कल्चर जरूरी
वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक मल्होत्रा मानते हैं कि आगरा की अहमियत के हिसाब से उसका विकास नहीं हो सका है। वे कहते हैं, जिस तरह ताजमहल भारत की शान है, ठीक वैसे ही आगरा को भी देश की शान बनाने के बारे में सोचना होगा। राज्य सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वो स्थायी तौर पर abhishekविकास का खाका तैयार करे। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए आगरा में नाइट कल्चर विकसित किया जाना चाहिए, अभी क्या रहा है कि पर्यटक सुबह आते हैं, ताज देखते हैं और शाम को वापस दिल्ली निकल जाते हैं। जब वो शहर में रुकेंगे ही नहीं, तो इससे उनका जुड़ाव कैसे होगा। अभिषेक कहते हैं, सरकार को लगता है कि वो 10 दिन ताजमहोत्सव लगाकर या वैकल्पिक योजनाएं बनाकर साल भर के लिए पर्यटकों को आकर्षित कर सकती है। जबकि ऐसा नहीं है। एक दूसरी बात जो इस शहर को लगातार पीछे धकेल रही है, वो है गंदगी। आगरा में दाखिल होते ही पर्यटकों को गंदगी के अंबार नजर आने लगते हैं। ऐसे में वो यहां से अच्छी यादें लेकर जाएंगे भी तो कैसे। तीसरी बात जो मुझे जरूरी लगती है वो ये कि आगरा आने वाले प्रशासनिक अधिकारियों का तबादला जल्दी न किया जाए। कोई अधिकारी जब तक शहर के विकास का खाका खींचता है, तब तक उसका तबदाला कर दिया जाता है। कम से कम 10 साल की योजना बनाई जाए और सरकार स्वयं इस बात की निगरानी करे कि अधिकारी उस पर कितना अमल कर रहे हैं।

नहीं बदली सूरत

आगरा कैन्टोन्मेंट बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. पंकज महेंद्रू कहते हैं, यह हकीकत है कि हेरीटेज सिटी के मुताबिक आगरा का विकास नहीं हुआ। जिस शहर में हर साल लाखों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं, वहां विकास को सबसे ज्यादा तवज्जो दी जानी चाहिए थी। आगरा में ऐसा बहुत कुछ है, जो इसे एक आदर्श शहर बनने से रोकता है। यहां न अच्छी सड़कें हैं, न साफ-सफाई। यातायात जाम की समस्या दिन ब दिन गंभीर होती जा रही है, लेकिन इससे निपटने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कोई हलचल दिखाई नहीं देती। सालों से शहर का स्वरूप लगभग एक जैसा है। हालांकि, यमुना एक्सप्रेस वे बनने से आगरा को फायदा हुआ है, मगर शहर के अंदरूनी परिदृश्य में बदलाव भी बेहद जरूरी है। आगरा को स्मार्ट सिटी बनाने की तैयारी है पर मेरा मानना है कि इसे टूरिज्म सिटी के तौर पर विकसित किया जाना चाहिए। जैसे कि गोवा। उनके मुताबिक, बिगड़ती कानून व्यवस्था इस शहर की सबसे बड़ी समस्या है। जिसने आगरा की छवि और पर्यटन व्यवसाय को प्रभावित किया है। साथ ही लपके नामक प्रजाति के फलने-फूलने से भी पर्यटन की दृष्टि से आगरा को नुकसान हुआ है।

अच्छा एयरपोर्ट तक नहीं
रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स में अतिरिक्त सुरक्षा आयुक्त के तौर पर पुणे में पदस्थ रहे विनोद कुमार को भी लगता है कि सालों बाद भी आगरा में कुछ नहीं बदला। वे कहते हैं, मैंने 1972-73 में आगरा छोड़ा, कई शहर होते हुए आखिरी पोस्टिंग पुणे मिली। पुणे में महज कुछ सालों में जो विकास देखा, Vinod Kumarउसका 10 फीसदी भी आगरा में देखने को नहीं मिला। आज भी जब कभी आगरा जाना होता है, तो लगता है सबकुछ पहले जैसा है। वही, संकरी सड़कें, गंदगी। नए आगरा को भी सुनियोजित ढंग से विकसित नहीं किया गया है, सड़कों की चौड़ाई यहां भी बहुत कम है। यह देखकर बेहद अफसोस होता है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आगरा में ढंग का हवाई अड्डा तक नहीं है। जहां लाखों सैलानी आते हैं, वहां इतने सालों में एक हवाई अड्डा तो विकसित हो ही सकता था। शिर्डी तक हवाई मानचित्र पर आ चुका है, लेकिन आगरा के लिए सीधी फ्लाइट नहीं मिलती। कभी-कभी मुझे लगता है कि अगर आगरा उत्तर प्रदेश की बजाए महाराष्ट्र में होता तो शायद ज्यादा विकसित होता।

योजनाबद्ध विकास नहीं

एक्सल कम्प्यूटर एजुकेशन प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर संजीव अरोड़ा कहते हैं, इस बात में कोई दोराय नहीं कि आगरा का विकास उस तरह से नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था। लेकिन जहां तक बात गंदगी की है, तो इसके लिए शहरवासी भी कम कुसूरवार नहीं हैं। जिस तरह से हम अपना घर साफ रखने के बारे में सोचते हैं, ठीक उसी तरह अगर शहर के बारे में सोचें तो तस्वीर काफी हद तक बदल सकती है। बाकी आगरा में ट्रैफिक समस्या गंभीर बनती जा रही है, इसकी वजह है सुनियोजित विकास का अभाव। एमजी रोड जैसी शहर की मुख्य सड़क की चौड़ाई भी सालों से लगभग एक जैसी है। एक्सप्रेस वे से दिल्ली से आगरा का सफर जितने समय में पूरा किया जाता है, उससे दोगुना शहर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में लग जाता है। विकास की योजनाएं भविष्य को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, लेकिन आगरा को देखकर ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता। आगरा ने उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश को जो ख्याति दिलाई है, उसके अनुरूप शहर को विकसित किया जाना बहुत जरूरी है। अगर पर्यटक यहां से अच्छी यादें लेकर जाएंगे, तभी वे दोबारा आने के बारे में सोचेंगे।

दुख होता है देखकर
पुणे रेल मंडल के सेवानिवृत्त जनसंपर्क अधिकारी वाई के सिंह मूल रूप से आगरा निवासी हैं। वे पिछले कई सालों से पुणे में हैं, जब कभी भी सिंह आगरा जाते हैं, उन्हें लगता है जैसे यह शहर आगे बढ़ने के बजाए पीछे लौट रहा है। सिंह कहते हैं, आगरा में स्वच्छता को लेकर कुछ खास किया गया yk singhहो, ऐसा नजर नहीं आता। जो स्थिति पहले थी कमोबेश वही आज है। एक ऐसा शहर जहां लाखों पर्यटक आते हैं, वहां साफ-सफाई बेहद जरूरी हो जाती है। पर्यटक जो देखेंगे वही आगे बताएंगे। आज के जमाने में माउथ पब्लिसिटी काफी मायने रखती है, अगर कोई एक पर्यटक 10 अन्य लोगों से आगरा की बुराई करता है तो संभव है उसमें से तीन-चार यहां आने की योजना रद्द कर दें। बात केवल पर्यटकों के न आने से होने वाले नुकसान की नहीं है, बात है हमारी छवि की। आगरा से फतेहपुर सीकरी जाते समय आपको सड़क किनारे शौच करते छोटे-बड़े अनगिनत लोग मिल जाएंगे। कई दफा विदेशी पर्यटक इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर लेते हैं। दूसरा मुद्दा है, कानून व्यवस्था का। आगरा की लचर कानून व्यवस्था के चलते ही पर्यटक यहां रुकने से कतराने लगे हैं। दिल्ली उन्हें ज्यादा सुरक्षित लगता है। वो दिल्ली में ठहरते हैं आगरा घूमने आते हैं और रात होने से पहले वापस लौट जाते हैं। यह देखकर बेहद दुख होता है कि जो शहर सरकार की आय का सबसे बड़ा जरिया है, उसी की सुध नहीं ली जा रही।

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  • सुल्तानगंज की पुलिया पर अब जाकर फ्लाईओवर बनाने का काम शुरू हुआ है। जबकि सालों से यहां ट्रैफिक जाम की समस्या है।

नहीं मिला ताज का फायदा
व्यवसायी प्रशांत अग्रवाल मानते हैं कि ताजमहल का जो फायदा आगरा को मिलना चाहिए था वो तो नहीं मिला, उल्टा उसे नुकसान जरूर उठाना पड़ा। ताज के लिए आगरा से बड़े पैमाने पर उद्योग हटाए गए। उस वक्त जिस खतरे की बात कही गई वो आज भी कायम है मसलन, ताज का काला पड़ना ,prashant यमुना के गंदे पानी से निकलने वाली गैसें उसे प्रभावित कर रही हैं। सालों से शहर का विकास थमा हुआ है अगर कुछ बढ़ा है वो है अपराध। सरकार पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए ढेरों काम कर रही है, मगर उसमें शहर का विकास शामिल नहीं है। सरकार को यह समझना चाहिए कि अगर शहर खूबसूरत होगा तो इससे पर्यटन को ही बढ़ावा मिलेगा। जयपुर जैसे दूसरे शहर देखने के बाद लगता है कि आगरा अभी बहुत पीछे है। पिछले 10 सालों पर अगर नजर डालें तो विकास के नाम पर महज औपचारिकताएं ही पूरी की गई हैं। मैं तो यही कहूंगा कि ताजमहल के होने का आगरा को कुछ खास फायदा नहीं मिला।

Ganeshotsav में मिली मायूसी

गणेशोत्सव के दौरान पुणे में इस बार नदियों के बजाए टैंकों में विसर्जन को प्राथमिकता दी गई। पर्यावरण के प्रति गणेश भक्तों के इस उत्साह से जहां प्रशासन के 20150927_182902चेहरे पर खुशी दिखाई दी, वहीं कुछ चेहरों की खुशी मायूसी में भी बदल गई। विसर्जन में गणेश भक्तों की मदद करने वाले जितनी कमाई की उम्मीद लगाकर बैठे थे, उसका आधा भी उनके हाथ में नहीं आया। दरअसल, घाटों के आसपास रहने वाले तैराक कुछ पैसों के ऐवज में भक्तों से प्रतिमाएं लेकर उन्हें नदियों में विसर्जित करते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार बाकायदा बाप्पा की प्रतिमा को तीन डुबकियां लगवाई जाती हैं और फिर भक्तों को दिखाकर उसे बहते पानी में छोड़ दिया जाता है। इस चंद मिनट के काम के लिए स्थानीय तैराक को एक भक्त से 100 से 200 रुपए तक मिल जाते हैं। इस लिहाज से पूरे दिन में कमाई का आंकड़ा काफी अच्छा पहुंच जाता है। इस काम में बड़ों से लेकर बच्चे तक शामिल रहते हैं। विसर्जन के दौरान ज्यादा कमाई की आस में ये लोग बाकी काम-धंधा छोडक़र घाटों तक ही सीमित होकर रह जाते हैं, लेकिन ईको-फ्रेंडली Ganeshotsav के चलते इस बार उनकी उम्मीदें पूरी तरह से पानी में बह गईं। पुणे में बड़े पैमाने पर प्रतिमाओं को महानगर पालिका द्वारा बनाए गए टैंकों में विसर्जित किया गया। ये टैंक विसर्जन घाटों पर ही बनाए गए थे।
भलेराव पिंपरी-चिंचवड़ के पिंपले-गुरव स्थित एक घाट पर पिछले काफी सालों से प्रतिमाओं को नदियों में विसर्जित करते आ रहे हैं। लेकिन उनके लिए इस बार जैसे हालात पहले कभी नहीं रहे। वो कहते हैं, गणेशोत्सव के दसवें दिन सबसे ज्यादा लोग विसर्जन के लिए आते हैं, इसलिए कमाई भी ज्यादा होती है। मैं और मेरे कुछ साथी काफी समय से ये काम करते आ रहे हैं, मगर इतनी कम कमाई कभी नहीं हुई। घाटों पर आने वाले अधिकतर लोगों ने या तो गणेश प्रतिमाएं दान दीं या उन्हें टैंकों में विसर्जित किया। आखिरी दिन मैं सिर्फ 4-6 प्रतिमाओं को ही नदी में विसर्जित कर पाया। मैं एक दुकान पर काम करता हूं। गणेशोत्सव के लिए हर बार कुछ दिनों की छुट्टी लेता हूं, ताकि ज्यादा कमाई हो सके। मगर इस बार सिर्फ निराशा ही हाथ लगी।
हुआ कुछ और
पिंपरी-चिंचवड़ के ही एक अन्य घाट पर प्रतिमा को विसर्जित कर नदी से बाहर निकले रवि तुपे ने कहा, सुबह से ये मेरा पांचवां चक्कर है, इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ। खासकर अंतिम दिन तो मैं 20 से 30 विसर्जन करवा दिया करता था। पता नहीं इस बार लोगों को क्या हुआ, जिससे पूछो वो टैंक में ही विसर्जन की बात कह रहा है। धार्मिक माहौल में लोग मूर्ति विसर्जित करने के 150-200 रुपए देने से भी मना नहीं करते। इसलिए मैं विसर्जन के समय दिन-रात घाट पर रहता हूं। सोचा था इस बार अच्छी कमाई हो जाएगी तो दिवाली पर बच्चों के लिए कुछ नए कपड़े खरीद लेंगे, लेकिन हुआ कुछ और। मैं इसके लिए किसी को दोष नहीं दे सकता, जो बाप्पा चाहेंगे, वही होगा।