फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से क्यों डर रहे हैं नेता?

आपराधिक मामलों का सामना कर रहे नेता इन दिनों खौफ में हैं. इस खौफ की वजह मोदी सरकार का वह हलफनामा जिसमें उसने आपराधिक मामलों में शामिल सांसद और विधायकों के मामलों के जल्द निपटारे के लिए विशेष अदालत बनाने की बात कही थी. नेताओं की बेचैनी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि समाजवादी पार्टी के सांसद नरेश अग्रवाल ने राज्यसभा में इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया. उन्होंने इस संबंध में संविधान की धारा 15 का उल्लेख करते हुए कहा, जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता. मैं सांसद और विधायक को अलग जाति मानता हूँ. तो फिर किस आधार पर सरकार सांसदों और विधायकों के लिए अलग अदालत बना सकती है?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले वकील अश्विनी उपाध्याय का मानना है कि जब नेताओं को स्पेशल स्टेटस चाहिए, तो फिर स्पेशल कोर्ट क्यों नहीं? उनके मुताबिक, देश में सांसद-विधायकों पर 1500 से ज्यादा आपराधिक मामले चल रहे हैं. यही वजह है कि उपाध्याय ने कोर्ट से गुहार लगायी है कि ऐसे मामलों के निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट बनाया जाए.

महाराष्ट्र सबसे आगे
एसोसिएशन ऑफ़ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) के अनुसार 2014 में लोकसभा में चुनकर आए 542 सांसदों में से 185 आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे हैं. इस लिहाज से देखा जाए तो देश के 34 फीसदी सांसद आपराधिक रिकॉर्ड वाले हैं. 2009 की लोकसभा में यह आंकड़ा 158 था. राज्यों के हिसाब से देखा जाए तो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसद हैं. दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश और फिर बिहार का नंबर आता है.

योगी राज में उत्तर प्रदेश (UP) पुलिस बिना किसी सियासी खौफ़ के काम कर रही है…इसकी एक बानगी उस वक़्त देखने को मिली जब अपने समर्थकों को छुड़ाने थाने पहुंचीं  सपा महिला नेता को SSP मंजिल सैनी ने खूब फटकार लगाई. आप भी देखिये यह VIDEO:

अपने ही कर रहे योगी की अनदेखी!

महीनों के सूखे के बाद जब बारिश की बूंदें धरती पर पड़ती हैं, तो दम तोड़ रहे शरीर में भी एक नई चेतना जग जाती है. उत्तर प्रदेश में भी आजकल कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिल रहा है, हालांकि चेतना का रूप थोड़ा जुदा है. लंबे इंतज़ार के बाद सत्ता का स्वाद चख रहे भाजपाई इतने मदमस्त हो गए हैं कि खुद मुख्यमंत्री की हिदायतों को नज़रंदाज़ कर रहे हैं. यूपी में कानून व्यवस्था सबसे बड़ा मुद्दा है और इसी को आधार बनाकर भाजपा सत्ता में आई है. कुर्सी संभालने के पहले दिन से ही योगी आदित्यनाथ ने साफ़ कर दिया था कि अराजकता बर्दाश्त नहीं की जाएगी, लेकिन कुछ भाजपा नेताओं पर इसका कोई असर नहीं है या फिर शायद वे अपने कृत्यों को अराजकता की श्रेणी से बाहर समझते हैं. मेरठ में बीते दिनों पार्टी नेता संजय त्यागी और उनके समर्थकों ने पुलिस थाने पर जमकर हंगामा किया, ये हंगामा अगर किसी पीड़ित को न्याय दिलाने को लेकर होता तो समझा जा सकता था. मगर नेताजी ने कानून तोड़ने वाले अपने बेटे के पक्ष में पूरा थाना सिरपर उठा लिया.

yogiरोका तो दी धमकी
आरोप तो यहां तक लग रहे हैं कि नेता और उनके समर्थकों ने कुछ पुलिस कर्मियों के साथ मारपीट भी की. पुलिस की गलती बस इतनी थी कि उसने सख्त मुख्यमंत्री के राज में सख्ती बरतते हुए गाड़ी पर काली फिल्म और हूटर लगाने के लिए नेताजी के बेटे का चालान काट दिया. मेरठ के नगर पुलिस अधीक्षक आलोक प्रियदर्शी के मुताबिक जब पुलिसकर्मियों ने गाड़ी रोकी तो नेता का बेटा धमकी देने लगा. जब उसे थाने चलने को कहा तो उसने फ़ोन करने अपने पिता को बुला लिया.

कुछ नहीं सुना
गोरखपुर में हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने चर्च में प्रार्थना को यह कहकर रुकवा दिया कि वहां धर्मांतरण हो रहा है. पुलिस के ऐसी किसी घटना से इंकार करने के बावजूद कार्यकर्ताओं ने प्रार्थना नहीं होने दी. इसके अलावा कई जगहों पर पुलिस और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच झड़प भी देखने को मिली. गौर करने वाली बात यह है कि सरकार में होने के बावजूद कुछ भाजपा नेता पुलिस पर पुरानी सरकार का हमदर्द होने का आरोप लगाकर उससे उलझ रहे हैं.

क्या फर्क रह जाएगा
समाजवादी पार्टी भाजपा पर कानून व्यवस्था दुरुस्त करने में नाकाम होने का आरोप लगा रही है, लेकिन इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी. नई सरकार को व्यवस्था समझने और उसे अपने हिसाब से पटरी पर लाने में वक़्त लगता है और योगी को तो अभी एक महीना भी नहीं हुआ है. हालांकि भगवा चोले में कानून व्यवस्था को ठेंगा दिखाने वालों पर लगाम लगाने के लिए योगी को कुछ ज़रूर करना होगा. यदि भाजपा नेता और कार्यकर्ता ऐसे ही बवाल मचाते रहेंगे तो फिर सपा और पार्टी विद द डिफरेंस कहलाने वाली भाजपा में क्या फर्क रह जाएगा.

ये तस्वीर बदलनी है
सपा सरकार के दौरान पार्टी नेता ने एक पुलिसकर्मी को सरेआम महज इसलिए थप्पड़ मार दिया था, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन कर रहा था. अदालत ने ताजमहल के एक निश्चित दायरे से आगे वाहन ले जाने पर पाबंदी लगाई हुई है. जब नेताजी अपनी गाड़ी लेकर आगे जाने लगे तो पुलिसकर्मी ने उन्हें कोर्ट के आदेश का हवाला दिया, इस पर नेताजी इतने भड़क गए कि उन्होंने पुलिसकर्मी हो थप्पड़ रसीद कर डाला. योगी सरकार पर इस तस्वीर को बदलने की ज़िम्मेदारी है, अब देखने वाली बात ये है कि क्या वो ऐसा कर पाते हैं?

सबके मन में बस गए हैं मोदी

  • बहुत कुछ कहती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत.

By Neeraj Nayyar

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा, पार्टी ने यहां 300 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है, जो कुछ वक़्त पहले तक शायद उसके लिए सपना ही थी. भाजपा की इस कामयाबी ने जहां यह साबित कर दिया है कि देश में नोटबंदी को लेकर मोदी के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, वहीं यूपी की जनता पर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने आरोपों की धार को भी कुंद किया है. 300 का आंकड़ा पार करना बताता है कि भाजपा को सभी वर्गों के वोट मिले, फिर चाहे वो हिंदू हों, मुस्लिम या दलित. इस चुनाव से पहले की बात करें तो यूपी की राजनीति हिंदू, मुस्लिम और दलित वोटों के बीच बंटी हुई थी, ये मानकर चला जाता था कि दलित बसपा का वोट बैंक हैं और मुस्लिम या अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस एवं सपा का. और देखा जाए तो इसमें कुछ गलत भी modiनहीं था, पिछले दो चुनावों को छोड़कर यदि हम देखें तो प्रदेश की जनता मिश्रित जनादेश ही देती आ रही थी. ऐसे में यह  कल्पना किसी ने नहीं की थी कि भाजपा बहुमत के आंकड़े को भी बौना कर देगी. ये जीत काफी हद तक 2014 के लोकसभा चुनावों का परिदृश्य प्रकट कर रही है, उस वक़्त भी भाजपा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.

सबसे बड़ा टेस्ट

भले ही पंजाब, मणिपुर या गोवा में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वो राजनीति के सबसे बड़े टेस्ट को पास करने में सफल रही है. भाजपा रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि उत्तर प्रदेश में उनकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है. इसलिए नरेंद्र मोदी ने बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा समय यूपी में ही बिताया. वैसे भी उत्तर प्रदेश में हर पांच साल में बदलाव की परंपरा है, इस लिहाज से भी सपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल था और मायावती के कार्यकाल में मूर्तियां बनवाने के अलावा ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं था, जिसे जनता याद रखे. सपा, बसपा और कांग्रेस केवल नोटबंदी की आंच में कमल को झुलसता देखने की उम्मीद पाले हुए थे. खासकर उत्तर प्रदेश में इस फैक्टर के काम करने की संभावना राजनीतिक पंडितों ने भी व्यक्त की थी, क्योंकि नोटबंदी के दौरान जान गंवाने वालों में यूपी की हिस्सेदारी ज्यादा भी. इसके अलावा एक निश्चित अवधि के बाद जब लोगों का धैर्य टूटने लगा तो उसके नकारात्मक प्रभाव भाजपा पर पड़ने के आशंका बलवती होने लगी. लेकिन नरेंद मोदी की यहां तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हाथ से फिसलती पारी को जीत की इबारत में तब्दील कर दिया. मोदी ने लोगों को समझाया कि नोटबंदी देशहित में क्यों ज़रूरी है और देशहित में परेशानियों की कोई जगह नहीं. यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर नोटबंदी के तुरंत बाद चुनाव होते तो शायद परिणाम कुछ जुदा देखने को मिलते.

मोदी को श्रेय

इस जीत का पूरा श्रेय मोदी (MODI) को दिया जाना चाहिए है, भले ही चुनाव सामूहिक प्रयासों से जीते जाते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने 2014 से लेकर अब तक जनता के बीच अपने जादू को बरकरार रखा है, वो कोई दूसरा नहीं कर सकता. मोदी तब भी जनता के मन में थे और अब भी. दूसरी तरफ यदि बात सत्ताधारी पार्टी की करें तो सपा के सारे समीकरण गलत साबित हुए. दरअसल अखिलेश के कार्यकाल में सपा ने खुद को एक वर्ग तक सीमित कर लिया था. अब इसे उनकी नासमझी कहें या अतिआत्मविश्वास कि वो यह मान बैठे थे कि समाज का बाकी वर्ग उनके कामों को तवज्जो देगा, वो काम जो कभी हुए ही नहीं.

UPबदली सोच

मायावती लेकर अखिलेश के कार्यकाल तक यूपी का कितना विकास हुआ, जनता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. यदि वास्तव में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बना होता तो नरेंद्र मोदी का जादू भी अखिलेश की साइकिल पंक्चर नहीं कर पता. बसपा को भी अब नए सिरे से अपनी राजनीति पर विचार करना होगा, एक बात तो तय हो गई है कि दलित भी अब इन जुमलों में विश्वास नहीं करता कि भाजपाकाल में उसका शोषण होगा, वरना बसपा महज 18 सीटों पर सिमटकर नहीं रह जाती. कांग्रेस के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि पंजाब, मणिपुर और गोवा उसकी झोली में आ गिरे.

सबके मन में बस गए हैं मोदी

  • बहुत कुछ कहती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत.

By Neeraj Nayyar

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा, पार्टी ने यहां 300 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है, जो कुछ वक़्त पहले तक शायद उसके लिए सपना ही थी. भाजपा की इस कामयाबी ने जहां यह साबित कर दिया है कि देश में नोटबंदी को लेकर मोदी के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, वहीं यूपी की जनता पर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने आरोपों की धार को भी कुंद किया है. 300 का आंकड़ा पार करना बताता है कि भाजपा को सभी वर्गों के वोट मिले, फिर चाहे वो हिंदू हों, मुस्लिम या दलित. इस चुनाव से पहले की बात करें तो यूपी की राजनीति हिंदू, मुस्लिम और दलित वोटों के बीच बंटी हुई थी, ये मानकर चला जाता था कि दलित बसपा का वोट बैंक हैं और मुस्लिम या अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस एवं सपा का. और देखा जाए तो इसमें कुछ गलत भी modiनहीं था, पिछले दो चुनावों को छोड़कर यदि हम देखें तो प्रदेश की जनता मिश्रित जनादेश ही देती आ रही थी. ऐसे में यह  कल्पना किसी ने नहीं की थी कि भाजपा बहुमत के आंकड़े को भी बौना कर देगी. ये जीत काफी हद तक 2014 के लोकसभा चुनावों का परिदृश्य प्रकट कर रही है, उस वक़्त भी भाजपा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.

सबसे बड़ा टेस्ट

भले ही पंजाब, मणिपुर या गोवा में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वो राजनीति के सबसे बड़े टेस्ट को पास करने में सफल रही है. भाजपा रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि उत्तर प्रदेश में उनकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है. इसलिए नरेंद्र मोदी ने बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा समय यूपी में ही बिताया. वैसे भी उत्तर प्रदेश में हर पांच साल में बदलाव की परंपरा है, इस लिहाज से भी सपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल था और मायावती के कार्यकाल में मूर्तियां बनवाने के अलावा ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं था, जिसे जनता याद रखे. सपा, बसपा और कांग्रेस केवल नोटबंदी की आंच में कमल को झुलसता देखने की उम्मीद पाले हुए थे. खासकर उत्तर प्रदेश में इस फैक्टर के काम करने की संभावना राजनीतिक पंडितों ने भी व्यक्त की थी, क्योंकि नोटबंदी के दौरान जान गंवाने वालों में यूपी की हिस्सेदारी ज्यादा भी. इसके अलावा एक निश्चित अवधि के बाद जब लोगों का धैर्य टूटने लगा तो उसके नकारात्मक प्रभाव भाजपा पर पड़ने के आशंका बलवती होने लगी. लेकिन नरेंद मोदी की यहां तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हाथ से फिसलती पारी को जीत की इबारत में तब्दील कर दिया. मोदी ने लोगों को समझाया कि नोटबंदी देशहित में क्यों ज़रूरी है और देशहित में परेशानियों की कोई जगह नहीं. यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर नोटबंदी के तुरंत बाद चुनाव होते तो शायद परिणाम कुछ जुदा देखने को मिलते.

मोदी को श्रेय

इस जीत का पूरा श्रेय मोदी (MODI) को दिया जाना चाहिए है, भले ही चुनाव सामूहिक प्रयासों से जीते जाते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने 2014 से लेकर अब तक जनता के बीच अपने जादू को बरकरार रखा है, वो कोई दूसरा नहीं कर सकता. मोदी तब भी जनता के मन में थे और अब भी. दूसरी तरफ यदि बात सत्ताधारी पार्टी की करें तो सपा के सारे समीकरण गलत साबित हुए. दरअसल अखिलेश के कार्यकाल में सपा ने खुद को एक वर्ग तक सीमित कर लिया था. अब इसे उनकी नासमझी कहें या अतिआत्मविश्वास कि वो यह मान बैठे थे कि समाज का बाकी वर्ग उनके कामों को तवज्जो देगा, वो काम जो कभी हुए ही नहीं.

UPबदली सोच

मायावती लेकर अखिलेश के कार्यकाल तक यूपी का कितना विकास हुआ, जनता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. यदि वास्तव में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बना होता तो नरेंद्र मोदी का जादू भी अखिलेश की साइकिल पंक्चर नहीं कर पता. बसपा को भी अब नए सिरे से अपनी राजनीति पर विचार करना होगा, एक बात तो तय हो गई है कि दलित भी अब इन जुमलों में विश्वास नहीं करता कि भाजपाकाल में उसका शोषण होगा, वरना बसपा महज 18 सीटों पर सिमटकर नहीं रह जाती. कांग्रेस के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि पंजाब, मणिपुर और गोवा उसकी झोली में आ गिरे.

 

यूपी को सिर्फ मोदी पसंद हैं

उत्तर प्रदेश (UP) की जनता ने साफ़ कर दिया है कि उसे अखिलेश और राहुल का साथ नहीं बल्कि मोदी पसंद हैं. अब तक के रुझानों के आधार पर यूपी में भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया है. यानी उसे सरकार बनाने के लिए किसी के साथ की ज़रूरत नहीं है. UPभाजपा ने पिछले चुनाव के मुकाबले ऐतिहासिक वोट प्राप्त किए हैं. इसके साथ ही यह भी साफ हो गया है कि नोटबंदी को लेकर जनता में केंद्र सरकार के प्रति किसी तरह गुस्सा नहीं है. वहीं इस चुनाव ने मायावती को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया है, बसपा 30-25 सीटों पर ही सिमटकर रह गई है. सपा और कांग्रेस के हाल भी काफी बुरा रहा है, दोनों पार्टियों को जनता ने पूरी तरह नकार दिया है. यूपी में कुल 404 सीटें हैं और बहुमत के लिए 202 सीटों की ज़रूरत है, और भाजपा इस आंकड़े से काफी आगे निकल गई है.

उत्तराखंड में भी भाजपा

उत्तर प्रदेश की तरह ही उत्तराखंड में भी भाजपा जीत की तरफ बढ़ रही है. अब तक के रुझानों के आधार भाजपा को 54 सीटें मिल रही हैं और कांग्रेस महज 9 सीटों पर सिमटकर रह गई है. वहीं पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनाती दिख रही है और गोवा में भी कांग्रेस आगे है. इन दोनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी को करार झटका लगा है. माना जा रहा था कि यहां आप की सरकार बन सकती है.

Survey: साइकिल का पंक्चर होना तय!

  • Survey conducted by Aaj Ka Khabri, shows that SP may lose its shine.

यादव कुनबे में मचे घमासान के चलते समाजवादी पार्टी को विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ सकता है। सपा की स्थिति बिल्कुल वैसी हो गई है, जैसी कुछ साल पहले भाजपा की थी। आंतरिक कलह की वजह से भाजपा को लोकसभा सहित विधानसभा चुनावों में भी करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। सपा में सुलह के अब तक जितने भी फॉर्मूले निकाले गए हैं, सब नाकाम रहे हैं। इस बात की संभावना बेहद कम है कि पिता पुत्र की लड़ाई जल्द थम जाए, और यदि थमती भी है तो भी पार्टी को नुकसान तो उठाना ही पड़ेगा। यूपी की जनता एक ऐसी पार्टी को पुनः सत्ता में आने का मौका शायद न दे, जो अपने घर के झगड़े ही नहीं सुलझा पा रही है। जनता का मिजाज परखने के लिए आज का खबरी द्वारा कराए गए संक्षिप्त सर्वेक्षण में काफी हद तक यह साफ नजर surveyआ रहा है कि सपा के मतदाता इस बार छिटककर दूसरे खेमे में जाएंगे। इतना ही नहीं हर सूरत में अपनी जीत का दावा करने वाली पार्टी के नेता भी मानते हैं कि हालात इस बार बेहद विपरीत हैं।

जनता को आशंका
आज का खबरी ने अपने वन टू वन सर्वेक्षण में लोगों से जानना चाहा कि क्या मौजूदा परिदृश्य में वो सपा के साथ जाना चाहेंगे? मुलायम सिंह और अखिलेश यादव में से पार्टी का नेतृत्व कौन बेहतर ढंग से कर सकता है? सर्वे में शामिल अधिकतर लोगों ने माना कि सपा में मचे घमासान को देखते हुए वो दूसरा विकल्प तलाश रहे हैं। लोगों का तर्क था कि जो पार्टी घर के झगड़ों को नहीं सुलझा पा रही है, वो उनकी समस्याओं को क्या दूर करेगी। जनता में इस बात को लेकर भी आशंका है कि यदि वो सपा को पुनः सत्ता में लाती है, तो क्या वो स्थायी और मजबूत शासन दे पाएगी?

भरोसा नहीं
आगरा, लखनऊ सहित समाजवादी पार्टी के गढ़ समझे जाने वाले मैनपुरी, इटावा, आजमगढ़, सैफई और तमाम अन्य क्षेत्रों के मतदाताओं की सोच में परिवर्तन देखा जा रहा है। यहां तक की सपा का वोटबैंक समझे जाने वाला मुस्लिम समुदाय भी उससे दूर हो सकता है। इसका फायदा कुछ कांग्रेस को होने की उम्मीद है, क्योंकि यूपी में मुस्लिम समुदाय का वोट भाजपा के खेमे में कम ही जाता है। मतदाता मानते हैं कि सपा कई घड़ों में विभाजित हो चुकी है। भले ही आज सब एकजुट हो जाएं, लेकिन कल फिर भी कलह का मटका फूट सकता है।

अखिलेश बेहतर
मुलायम सिंह और अखिलेश यादव में से पार्टी का नेतृत्व कौन बेहतर ढंग से कर सकता है? इस सवाल के जवाब में अधिकतर लोगों ने अखिलेश की पैरवी की। हालांकि कुछ यह भी मानते हैं कि नेतृत्व बदलने से खास असर नहीं होगा पार्टी की सोच बदलने की जरूरत है। सर्वे की खास बात ये रही कि युवाओं के साथ साथ बुजुर्गों ने भी माना कि अखिलेश ज्यादा बेहतर ढंग से पार्टी को आगे ले जा सकते हैं। उनके मुताबिक, पिछले चुनाव में जनता ने सपा के नाम पर नहीं बल्कि अखिलेश के नाम पर वोट दिए थे, लिहाजा पार्टी को उनके फैसलों को तवज्जो देनी चाहिए।

अपनों को भी डर
पार्टी नेताओं को भी लग रहा है कि इस बार चुनाव में सपा का प्रदर्शन काफी खराब रह सकता है। एक युवा नेता ने कहा, इस लड़ाई में जीत किसी की भी हो, पार्टी की हार होगी। पिछले चुनावों में हम भाजपा की आंतरिक कलह का हवाला देकर जनता को समझाया करते थे कि जो पार्टी अपना घर नहीं संभाल पा रही, वो आपको क्या संभालेगी। आज हम खुद उस स्थिति में पहुंच गए हैं। चुनाव से ऐन पहले विवाद का इस तरह सार्वजनिक होना पार्टी के लिए नुकसानदायक है। हम ऊपरी तौर पर भले ही कुछ भी कहें, लेकिन अंदर से सब डरे हैं।

सास-बहू के झगड़े में बिखरी सपा!

सास-बहू के झगड़े पारिवारिक शांति के दुश्मन को होते ही हैं, लेकिन अगर यह अपने चरम पर पहुंच जाएं तो राजपाट भी तबाह होते देर नहीं लगती। उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी सपा में आजकल इसी झगड़े के चलते घमासान मचा हुआ है। हालात ये हो चले हैं कि न पिता मुलायम सिंह यादव को बेटे अखिलेश की सूरत भा रही है और न अखिलेश को मुलायम की। घर का ये झगड़ा अब सार्वजनिक तौर पर सामने आ गया है। सूत्र बताते हैं कि मुलायम की दूसरी पत्नी साधना और अखिलेश की पत्नी डिंपल के बीच spविवाद चल रहा है। कुछ दिनों पहले यह विवाद तीखी कहासुनी में तब्दील हुआ और इसका प्रभाव पार्टी एवं सरकारी स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों में देखने को मिला। यूपी समाजवादी पार्टी के एक नेता के मुताबिक, साधना अपने बेटे प्रतीक के लिए राजनीति में आगे लाना चाहती हैं। उनकी चाह है कि प्रतीक को इस बार के विधानसभा चुनाव में बड़े रूप में पेश किया जाए। इसी मुद्दे को लेकर सास बहू में कहासुनी हुई और विवाद आग की तरह भड़क उठा।

गायब हुआ प्यार
अखिलेश और मुलायम के बीच का प्यार अब गायब हो चुका है। सूत्रों के मुताबिक घर की चारदीवारी में दोनों के बीच यदि संवाद होता है तो बस आरोप प्रत्यारोप के लिए। इस पूरे खेल में अमर सिंह की भूमिका बेहद खास बताई जा रही है। अमर अपने अपमान का बदला लेने और अपना खोया रुतबा वापस पाने के लिए फूट डालो, राजनीति करो की भूमिका अपना रहे हैं। खुद अखिलेश यादव भी मानते हैं कि पारिवारिक कलह के पीछे अमर सिंह का हाथ है। दूसरी तरफ शिवपाल भी साधना के बेटे प्रतीत का साथ दे रहे हैं। इस वजह से विवाद और भी तेज हो गया है।

चुनावी मजबूरी
सूत्रों के अनुसार, मुलायम सिंह अखिलेश को पार्टी से बाहर करने का मन बना चुके हैं। लेकिन राजनीतिक मजबूरी के चलते वह फैसला नहीं ले पा रहे। यदि अभी अखिलेश को हटाया जाता है, तो इसका असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। वैसे एक बात यह है कि यदि सपा विधानसभा चुनाव जीतती है तो अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं सौंपी जाएगी।

अब तो शर्म करो अखिलेश!

उत्तर प्रदेश में बलात्कार की घटनाएं और उन पर नेताओं की बेशर्म बयानबाजी बदस्तूर जारी है। बुलंदशहर के बाद अब बरेली में दिनदहाड़े एक टीचर के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। आरोपियों ने पीडि़ता का अश्लील वीडियो भी बनाया है। उधर, Akhilesh-Yadhavअखिलेश सरकार के मंत्री आजम खान के बुलंदशहर कांड को विरोधियों की साजिश करार देने के बाद सपा नेता अबू आजमी भी उनके नक्शे कदम पर चल निकले हैं। आजमी का मानना है कि रेप की घटनाएं सपा सरकार को बदनाम करने की साजिश है। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब नेताओं ने अपनी असंवेदनशीलता का परिचय दिया है। समय समय पर वो इसका मुजारिया करते रहते हैं।

  उत्तर प्रदेश के और खासकर सपा नेताओं के लिए इस तरह की बयानबाजी आम है। जब सपा के मुखिया ही बलात्कार जैसी वीभत्स घटनाओं को लड़कों की नादानी करार दे चुके हैं तो उनके नेताओं से क्या उम्मीद की जा सकती है। कुछ वक्त पहले मुलायम ने कहा था कि रेप के आरोपियों को फांसी पर चढ़ाना गलत है। लड़के हैं, कभी कभी लड़कों से गलतियां हो जाती हैं।

उठाकर ले गए
बरेली के सीबीगंज इलाके में पस्तौर निवासी टीचर को कॉलेज जाते वक्त कुछ बदमाश नेशनल हाईवे से सेटी लिंक रोड से उठाकर ले गए। इसके बाद उसके साथ बलात्कार किया गया। इतना ही नहीं आरोपियों ने टीचर का अश्लील वीडियो भी बनाया। वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी पीडि़त को नग्न अवस्था में सड़क किनारे फेंककर फरार हो गए। इस घटना के बाद पुलिस महकमें में हड़कंप मचा हुआ है।

अखिलेश भी बेदम
अखिलेश यादव से उत्तर प्रदेश की जनता को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन वो उन पर खरा उतरने में नाकाम साबित हुए। मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने प्रदेश की कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने का भरोसा दिलाया था। आज इतने समय बाद भी वो सिर्फ भरोसा ही दिलाने की स्थिति में हैं। यूपी में हालात ये चुके हैं कि घर से बाहर निकलने में भी डर लगने लगा है। अपराधी बड़ी से बड़ी घटनाओं को अंजाम देने के लिए रात के इंतजार नहीं करते। बलात्कार, हत्या, डकैती जैसी वारदातें यूपी में आम हो गई हैं। अफसोस की बात तो ये है कि इतने सब के बाद भी अखिलेश और उनके मंत्री अपनी नाकामी स्वीकारने के बजाए विरोधियों पर ढीकरा फोड़ रहे हैं।

क्या तब भी यही बोलते?
आजम खान के बयान की जहां हर तरफ निंदा हो रही है। वहीं पीडि़ता के पिता ने सवाल किया है कि अगर आजम खान के साथ ऐसा होता तो क्या तब भी ऐसा बयान देते? पीडि़त के चाचा ने इस बयान के लिए आजम खान को पागल करार दिया है।