यूपी को पसंद आ रहे योगी के तेवर

मुख्यमंत्री बनने के बाद जिस तरह से योगी आदित्यनाथ एक के बाद एक ताबड़तोड़ फैसले ले रहे हैं, उससे यूपी (UP) की जनता खुश है. जनता को विश्वास है कि योगी पांच सालों में प्रदेश का कायाकल्प करने में सफल होंगे. योगी के एजेंडे में कानून व्यवस्था और अवैध बूचड़खाने सबसे ऊपर हैं. कुर्सी पर बैठने के मात्र चंद घंटों में ही उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया है. एक अच्छी बात तो अब तक नज़र आ रही है वो यह है कि योगी अफसरों के ट्रांसफर पर जोर नहीं दे रहे हैं, जैसा कि पूर्व के मुख्यमंत्री करते आए हैं. आज का खबरी ने उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में लोगों से बात की और अधिकांश का यही कहना है कि योगी ने जिस तरह से आगाज़ किया है उससे वो खुश हैं.
up
अब नया अभियान
योगी ने अवैध बूचड़खानों पर लगाम कसने के बाद लड़कियों को परेशान करने वाले रोमियों के खिलाफ अभियान का आगाज़ किया और अब खुले में शराब पीने वालों पर भी पुलिस का कहर टूट रहा है. प्रदेश के अलग-अलग शहरों में वो पुलिस घूम-घूमकर सड़कों पर जाम छलकाने वालों को सलाखों के पीछे पहुंचा रही है, जिस पर कभी सोते रहने के आरोप लगा करते थे. गौरतलब है कि अपराध में इजाफे की एक बड़ी वजह खुलेआम शराब का सेवन भी है.

गायब हुए अपराधी
यूपी में योगी का सख्त अंदाज़ देखकर ज़्यादातर अपराधी अंडरग्राउंड हो गए हैं. एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक, कुछ वक़्त पहले तक सक्रीय गिरोह के बारे में अब कोई सूचना नहीं है. अपराधियों को डर सता रहा है कि जिस तरह योगी फैसले ले रहे हैं, उससे उनकी जान आफत में पड़ सकती है. सूत्र तो यहां तक कहते हैं कि अन्य सियासी दलों ने भी अपने कार्यकर्ताओं को किसी भी तरह की गड़बड़ न करने के आदेश दिए हैं.

क्या कहते हैं लोग
आज का खबरी से बातचीत में लोगों के कहा, यूपी को जिस धमाकेदार मुख्यमंत्री की तलाश थी, वो पूरी हो गई है. प्रदेश में सबसे बड़ी समस्या लचर कानून व्यवस्था है, जिस तरह से योगी ने सख्ती दिखाई है उससे तो यही लगता है कि बढ़ते अपराधों पर लगाम लगेगी. लोगों के माना कि एंटी-रोमियो अभियान से कुछ परेशानी हो सकती है, पर यह आवश्यक कदम था. कुछ राजनीतिक दलों के छोटे-मोटे कार्यकर्ता ही छेड़छाड़ को बढ़ावा देते थे, लेकिन अब उन्हें भी खामोश बैठने पड़ेगा. सीएम से लोगों की यही अपील है कि जो सख्ती वो दिखा रहे हैं वो आगे भी कायम रहे तभी सुधार संभव होगा. बूचड़खाने के मामले पर लोगों की राय कुछ हद तक बंटी हुई है, समुदाय विशेष के कुछ लोगों को जहां लगता है कि इसकी आड़ में उन्हें बेवजह परेशान होना पड़ेगा बाकियों का मानना है कि यह अच्छा कदम है.

सबके मन में बस गए हैं मोदी

  • बहुत कुछ कहती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत.

By Neeraj Nayyar

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा, पार्टी ने यहां 300 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है, जो कुछ वक़्त पहले तक शायद उसके लिए सपना ही थी. भाजपा की इस कामयाबी ने जहां यह साबित कर दिया है कि देश में नोटबंदी को लेकर मोदी के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, वहीं यूपी की जनता पर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने आरोपों की धार को भी कुंद किया है. 300 का आंकड़ा पार करना बताता है कि भाजपा को सभी वर्गों के वोट मिले, फिर चाहे वो हिंदू हों, मुस्लिम या दलित. इस चुनाव से पहले की बात करें तो यूपी की राजनीति हिंदू, मुस्लिम और दलित वोटों के बीच बंटी हुई थी, ये मानकर चला जाता था कि दलित बसपा का वोट बैंक हैं और मुस्लिम या अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस एवं सपा का. और देखा जाए तो इसमें कुछ गलत भी modiनहीं था, पिछले दो चुनावों को छोड़कर यदि हम देखें तो प्रदेश की जनता मिश्रित जनादेश ही देती आ रही थी. ऐसे में यह  कल्पना किसी ने नहीं की थी कि भाजपा बहुमत के आंकड़े को भी बौना कर देगी. ये जीत काफी हद तक 2014 के लोकसभा चुनावों का परिदृश्य प्रकट कर रही है, उस वक़्त भी भाजपा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.

सबसे बड़ा टेस्ट

भले ही पंजाब, मणिपुर या गोवा में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वो राजनीति के सबसे बड़े टेस्ट को पास करने में सफल रही है. भाजपा रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि उत्तर प्रदेश में उनकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है. इसलिए नरेंद्र मोदी ने बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा समय यूपी में ही बिताया. वैसे भी उत्तर प्रदेश में हर पांच साल में बदलाव की परंपरा है, इस लिहाज से भी सपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल था और मायावती के कार्यकाल में मूर्तियां बनवाने के अलावा ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं था, जिसे जनता याद रखे. सपा, बसपा और कांग्रेस केवल नोटबंदी की आंच में कमल को झुलसता देखने की उम्मीद पाले हुए थे. खासकर उत्तर प्रदेश में इस फैक्टर के काम करने की संभावना राजनीतिक पंडितों ने भी व्यक्त की थी, क्योंकि नोटबंदी के दौरान जान गंवाने वालों में यूपी की हिस्सेदारी ज्यादा भी. इसके अलावा एक निश्चित अवधि के बाद जब लोगों का धैर्य टूटने लगा तो उसके नकारात्मक प्रभाव भाजपा पर पड़ने के आशंका बलवती होने लगी. लेकिन नरेंद मोदी की यहां तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हाथ से फिसलती पारी को जीत की इबारत में तब्दील कर दिया. मोदी ने लोगों को समझाया कि नोटबंदी देशहित में क्यों ज़रूरी है और देशहित में परेशानियों की कोई जगह नहीं. यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर नोटबंदी के तुरंत बाद चुनाव होते तो शायद परिणाम कुछ जुदा देखने को मिलते.

मोदी को श्रेय

इस जीत का पूरा श्रेय मोदी (MODI) को दिया जाना चाहिए है, भले ही चुनाव सामूहिक प्रयासों से जीते जाते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने 2014 से लेकर अब तक जनता के बीच अपने जादू को बरकरार रखा है, वो कोई दूसरा नहीं कर सकता. मोदी तब भी जनता के मन में थे और अब भी. दूसरी तरफ यदि बात सत्ताधारी पार्टी की करें तो सपा के सारे समीकरण गलत साबित हुए. दरअसल अखिलेश के कार्यकाल में सपा ने खुद को एक वर्ग तक सीमित कर लिया था. अब इसे उनकी नासमझी कहें या अतिआत्मविश्वास कि वो यह मान बैठे थे कि समाज का बाकी वर्ग उनके कामों को तवज्जो देगा, वो काम जो कभी हुए ही नहीं.

UPबदली सोच

मायावती लेकर अखिलेश के कार्यकाल तक यूपी का कितना विकास हुआ, जनता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. यदि वास्तव में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बना होता तो नरेंद्र मोदी का जादू भी अखिलेश की साइकिल पंक्चर नहीं कर पता. बसपा को भी अब नए सिरे से अपनी राजनीति पर विचार करना होगा, एक बात तो तय हो गई है कि दलित भी अब इन जुमलों में विश्वास नहीं करता कि भाजपाकाल में उसका शोषण होगा, वरना बसपा महज 18 सीटों पर सिमटकर नहीं रह जाती. कांग्रेस के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि पंजाब, मणिपुर और गोवा उसकी झोली में आ गिरे.

सबके मन में बस गए हैं मोदी

  • बहुत कुछ कहती है उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत.

By Neeraj Nayyar

उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा, पार्टी ने यहां 300 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की है, जो कुछ वक़्त पहले तक शायद उसके लिए सपना ही थी. भाजपा की इस कामयाबी ने जहां यह साबित कर दिया है कि देश में नोटबंदी को लेकर मोदी के खिलाफ कोई गुस्सा नहीं है, वहीं यूपी की जनता पर जातिगत राजनीति को बढ़ावा देने आरोपों की धार को भी कुंद किया है. 300 का आंकड़ा पार करना बताता है कि भाजपा को सभी वर्गों के वोट मिले, फिर चाहे वो हिंदू हों, मुस्लिम या दलित. इस चुनाव से पहले की बात करें तो यूपी की राजनीति हिंदू, मुस्लिम और दलित वोटों के बीच बंटी हुई थी, ये मानकर चला जाता था कि दलित बसपा का वोट बैंक हैं और मुस्लिम या अन्य पिछड़ा वर्ग कांग्रेस एवं सपा का. और देखा जाए तो इसमें कुछ गलत भी modiनहीं था, पिछले दो चुनावों को छोड़कर यदि हम देखें तो प्रदेश की जनता मिश्रित जनादेश ही देती आ रही थी. ऐसे में यह  कल्पना किसी ने नहीं की थी कि भाजपा बहुमत के आंकड़े को भी बौना कर देगी. ये जीत काफी हद तक 2014 के लोकसभा चुनावों का परिदृश्य प्रकट कर रही है, उस वक़्त भी भाजपा ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे.

सबसे बड़ा टेस्ट

भले ही पंजाब, मणिपुर या गोवा में पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वो राजनीति के सबसे बड़े टेस्ट को पास करने में सफल रही है. भाजपा रणनीतिकारों को यह बखूबी पता था कि उत्तर प्रदेश में उनकी जीत की संभावना सबसे ज्यादा है, क्योंकि जनता दोनों ही प्रमुख पार्टियों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है. इसलिए नरेंद्र मोदी ने बाकी राज्यों के मुकाबले सबसे ज्यादा समय यूपी में ही बिताया. वैसे भी उत्तर प्रदेश में हर पांच साल में बदलाव की परंपरा है, इस लिहाज से भी सपा का पुन: सत्ता में लौटना मुश्किल था और मायावती के कार्यकाल में मूर्तियां बनवाने के अलावा ऐसा कुछ ख़ास हुआ नहीं था, जिसे जनता याद रखे. सपा, बसपा और कांग्रेस केवल नोटबंदी की आंच में कमल को झुलसता देखने की उम्मीद पाले हुए थे. खासकर उत्तर प्रदेश में इस फैक्टर के काम करने की संभावना राजनीतिक पंडितों ने भी व्यक्त की थी, क्योंकि नोटबंदी के दौरान जान गंवाने वालों में यूपी की हिस्सेदारी ज्यादा भी. इसके अलावा एक निश्चित अवधि के बाद जब लोगों का धैर्य टूटने लगा तो उसके नकारात्मक प्रभाव भाजपा पर पड़ने के आशंका बलवती होने लगी. लेकिन नरेंद मोदी की यहां तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने हाथ से फिसलती पारी को जीत की इबारत में तब्दील कर दिया. मोदी ने लोगों को समझाया कि नोटबंदी देशहित में क्यों ज़रूरी है और देशहित में परेशानियों की कोई जगह नहीं. यहां ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर नोटबंदी के तुरंत बाद चुनाव होते तो शायद परिणाम कुछ जुदा देखने को मिलते.

मोदी को श्रेय

इस जीत का पूरा श्रेय मोदी (MODI) को दिया जाना चाहिए है, भले ही चुनाव सामूहिक प्रयासों से जीते जाते हैं, लेकिन जिस तरह से उन्होंने 2014 से लेकर अब तक जनता के बीच अपने जादू को बरकरार रखा है, वो कोई दूसरा नहीं कर सकता. मोदी तब भी जनता के मन में थे और अब भी. दूसरी तरफ यदि बात सत्ताधारी पार्टी की करें तो सपा के सारे समीकरण गलत साबित हुए. दरअसल अखिलेश के कार्यकाल में सपा ने खुद को एक वर्ग तक सीमित कर लिया था. अब इसे उनकी नासमझी कहें या अतिआत्मविश्वास कि वो यह मान बैठे थे कि समाज का बाकी वर्ग उनके कामों को तवज्जो देगा, वो काम जो कभी हुए ही नहीं.

UPबदली सोच

मायावती लेकर अखिलेश के कार्यकाल तक यूपी का कितना विकास हुआ, जनता से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. यदि वास्तव में उत्तर प्रदेश उत्तम प्रदेश बना होता तो नरेंद्र मोदी का जादू भी अखिलेश की साइकिल पंक्चर नहीं कर पता. बसपा को भी अब नए सिरे से अपनी राजनीति पर विचार करना होगा, एक बात तो तय हो गई है कि दलित भी अब इन जुमलों में विश्वास नहीं करता कि भाजपाकाल में उसका शोषण होगा, वरना बसपा महज 18 सीटों पर सिमटकर नहीं रह जाती. कांग्रेस के लिए संतोष की बात बस इतनी है कि पंजाब, मणिपुर और गोवा उसकी झोली में आ गिरे.

 

यूपी को सिर्फ मोदी पसंद हैं

उत्तर प्रदेश (UP) की जनता ने साफ़ कर दिया है कि उसे अखिलेश और राहुल का साथ नहीं बल्कि मोदी पसंद हैं. अब तक के रुझानों के आधार पर यूपी में भाजपा ने प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया है. यानी उसे सरकार बनाने के लिए किसी के साथ की ज़रूरत नहीं है. UPभाजपा ने पिछले चुनाव के मुकाबले ऐतिहासिक वोट प्राप्त किए हैं. इसके साथ ही यह भी साफ हो गया है कि नोटबंदी को लेकर जनता में केंद्र सरकार के प्रति किसी तरह गुस्सा नहीं है. वहीं इस चुनाव ने मायावती को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया है, बसपा 30-25 सीटों पर ही सिमटकर रह गई है. सपा और कांग्रेस के हाल भी काफी बुरा रहा है, दोनों पार्टियों को जनता ने पूरी तरह नकार दिया है. यूपी में कुल 404 सीटें हैं और बहुमत के लिए 202 सीटों की ज़रूरत है, और भाजपा इस आंकड़े से काफी आगे निकल गई है.

उत्तराखंड में भी भाजपा

उत्तर प्रदेश की तरह ही उत्तराखंड में भी भाजपा जीत की तरफ बढ़ रही है. अब तक के रुझानों के आधार भाजपा को 54 सीटें मिल रही हैं और कांग्रेस महज 9 सीटों पर सिमटकर रह गई है. वहीं पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनाती दिख रही है और गोवा में भी कांग्रेस आगे है. इन दोनों ही राज्यों में आम आदमी पार्टी को करार झटका लगा है. माना जा रहा था कि यहां आप की सरकार बन सकती है.

सास-बहू के झगड़े में बिखरी सपा!

सास-बहू के झगड़े पारिवारिक शांति के दुश्मन को होते ही हैं, लेकिन अगर यह अपने चरम पर पहुंच जाएं तो राजपाट भी तबाह होते देर नहीं लगती। उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी सपा में आजकल इसी झगड़े के चलते घमासान मचा हुआ है। हालात ये हो चले हैं कि न पिता मुलायम सिंह यादव को बेटे अखिलेश की सूरत भा रही है और न अखिलेश को मुलायम की। घर का ये झगड़ा अब सार्वजनिक तौर पर सामने आ गया है। सूत्र बताते हैं कि मुलायम की दूसरी पत्नी साधना और अखिलेश की पत्नी डिंपल के बीच spविवाद चल रहा है। कुछ दिनों पहले यह विवाद तीखी कहासुनी में तब्दील हुआ और इसका प्रभाव पार्टी एवं सरकारी स्तर पर लिए जाने वाले फैसलों में देखने को मिला। यूपी समाजवादी पार्टी के एक नेता के मुताबिक, साधना अपने बेटे प्रतीक के लिए राजनीति में आगे लाना चाहती हैं। उनकी चाह है कि प्रतीक को इस बार के विधानसभा चुनाव में बड़े रूप में पेश किया जाए। इसी मुद्दे को लेकर सास बहू में कहासुनी हुई और विवाद आग की तरह भड़क उठा।

गायब हुआ प्यार
अखिलेश और मुलायम के बीच का प्यार अब गायब हो चुका है। सूत्रों के मुताबिक घर की चारदीवारी में दोनों के बीच यदि संवाद होता है तो बस आरोप प्रत्यारोप के लिए। इस पूरे खेल में अमर सिंह की भूमिका बेहद खास बताई जा रही है। अमर अपने अपमान का बदला लेने और अपना खोया रुतबा वापस पाने के लिए फूट डालो, राजनीति करो की भूमिका अपना रहे हैं। खुद अखिलेश यादव भी मानते हैं कि पारिवारिक कलह के पीछे अमर सिंह का हाथ है। दूसरी तरफ शिवपाल भी साधना के बेटे प्रतीत का साथ दे रहे हैं। इस वजह से विवाद और भी तेज हो गया है।

चुनावी मजबूरी
सूत्रों के अनुसार, मुलायम सिंह अखिलेश को पार्टी से बाहर करने का मन बना चुके हैं। लेकिन राजनीतिक मजबूरी के चलते वह फैसला नहीं ले पा रहे। यदि अभी अखिलेश को हटाया जाता है, तो इसका असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। वैसे एक बात यह है कि यदि सपा विधानसभा चुनाव जीतती है तो अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं सौंपी जाएगी।

यहां रावण दहन है महापाप!

हर साल विजयादशमी पर रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में कुछ स्थान ऐसे भी हैं, जहां रावण दहन के बारे में सोचना भी पाप है। वहां भगवान राम की तरह ही रावण को पूजा जाता है। आइए जानते हैं, ऐसे स्थानों के बारे मेंः

ravanहिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के बैजनाथ गांव को शिवनगरी के नाम से भी पहचाना जाता है। यहां रावण को जलाना महापाप है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि किसी ने रावण का पुतला जलाया तो उसकी मौत निश्चित है। मान्यता है कि रावण ने कुछ समय तक बैजनाथ में भगवान शिव की तपस्या कर मोक्ष का वरदान प्राप्त किया था। इसलिए शिव के सामने उनके भक्त के पुतले को जलाना उचित नहीं है। ऐसे करने वाले को स्वयं भगवान शिव दंड देते हैं। बैजनाथ में बिनवा पुल के पास रावण मंदिर भी है।
उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जिले के बिसरख गांव में भी रावण का मंदिर बनाया जा रहा है। मान्यता है कि गाजियाबाद से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव राणव का ननिहाल था। इस गांव का नाम पहले विश्वेश्वर था, जो रावण के पिता विश्रवा के नाम पर पड़ा। बाद में इसे बिसरख कहा जाने लगा।

महाकाल की नगरी उज्जैन में भी रावण की पूजा करने वाले मौजूद हैं। यहां के चिखली ग्राम में ऐसी मान्यता है कि यदि रावण की पूजा नहीं की गई तो पूरा गांव भस्म हो जाएगा। इसी के चलते गांववासी रावण दहन नहीं करते, बल्कि विजयादशमी पर उसकी पूजा की जाती है। गांव में रावण की एक मूर्ति भी स्थापित की गई है।

मध्यप्रदेश के ही मंदसौर में भी रावण पूज्यनीय है, यहां रावण की एक विशालकाय मूर्ति भी है। कहा जाता है कि रावण मंदसौर का दामाद था। उसकी पत्नी मंदोदरी मंदसौर की ही रहने वाली थी। मंदोदरी के कारण ही दशपुरा का नाम मंदसौर पड़ गया। इसी तरह छिंदवाड़ा में रावण को पूजा जाता है।

जोधपुर में भी रावण का मंदिर है। खासकर दवे, गोधा और श्रीमाली समाज के लोग रावण की पूजा करते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि जोधपुर रावण का ससुराल था, जबकि कुछ का कहना है कि रावण के वध के बाद उसके वंशज यहां बस गए थे। स्थानीय निवासी स्वयं को रावण का वंशज मानते हैं।

महाराष्ट्री के अमरावती और गढ़चिरौली जिले में रावण दहन नहीं होता। कोरकू और गोंड आदिवासी रावण और उसके पुत्र मेघनाद को अपना देवता मानते हैं। फागुन के अवसर पर दोनों की पूजा भी की जाती है।

कर्नाटक के कोलार जिले में रावण अब भी पूज्यनीय है। फसल महोत्सव के दौरान यहां रावण की पूजा अर्चना की जाती है। इसके पीछे लोगों का तर्क है कि क्योंकि रावण शिव का भक्त था, इसलिए वो हमारे लिए भी पूज्यनीय है। राज्य के मंडया जिले के मालवल्ली तालुका में रावण का एक मंदिर भी है।

ये 27 शहर भी बनेंगे स्मार्ट सिटी

स्मार्ट सिटी (Smart City) योजना में 27 नए शहरों को शामिल किया गया है। मंगलवार को केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई सूची में प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को भी जगह मिली है। इसके अलावा लिस्ट में बदहाली की मार झेल रहे आगरा के साथ साथ महाराष्ट्र से ठाणे को भी शामिल किया गया है। इन सभी शहरों को सरकार स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करेगी। इस पर कुल 66, 883 करोड़ रुपए का खर्चा आएगा। अब तक शहरी विकास मंत्रालय ने तीन चरणों में 60 शहरों को चुना है। आइए नजर डालते हैं उन शहरों पर जिन्हें सूची में जगह मिलीः

smartcity

खाट पंचायत में खटिया की लूट

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की खाट पंचायत में खटिया की जमकर लूटपाट हुई। उत्तर प्रदेश में जमीन तैयार करने के लिए राहुल ने खाट पंचायत शुरू की है। इसके पहले चरण में मंगलवार को देवरिया जिले के रूद्रपुर में राहुल किसानों से मिलने पहुंचे। राहुल का भाषण खत्म होते ही किसान बैठने के लिए लाई गईं खाटों को लेकर चलते बने। कुछ लोगों में खाट को लेकर छिना झपटी भी हुई। टीवी चैनलों के कैमरों में खटिया लूट के दृश्य कैद हुए हैं। पंचायत के दौरान राहुल ने किसानों की समस्याएं सुनीं और राज्य एवं केंद्र सरकार पर निशाना साधा। राहुल अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियों में जुट गए हैं।

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अब तो शर्म करो अखिलेश!

उत्तर प्रदेश में बलात्कार की घटनाएं और उन पर नेताओं की बेशर्म बयानबाजी बदस्तूर जारी है। बुलंदशहर के बाद अब बरेली में दिनदहाड़े एक टीचर के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। आरोपियों ने पीडि़ता का अश्लील वीडियो भी बनाया है। उधर, Akhilesh-Yadhavअखिलेश सरकार के मंत्री आजम खान के बुलंदशहर कांड को विरोधियों की साजिश करार देने के बाद सपा नेता अबू आजमी भी उनके नक्शे कदम पर चल निकले हैं। आजमी का मानना है कि रेप की घटनाएं सपा सरकार को बदनाम करने की साजिश है। वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब नेताओं ने अपनी असंवेदनशीलता का परिचय दिया है। समय समय पर वो इसका मुजारिया करते रहते हैं।

  उत्तर प्रदेश के और खासकर सपा नेताओं के लिए इस तरह की बयानबाजी आम है। जब सपा के मुखिया ही बलात्कार जैसी वीभत्स घटनाओं को लड़कों की नादानी करार दे चुके हैं तो उनके नेताओं से क्या उम्मीद की जा सकती है। कुछ वक्त पहले मुलायम ने कहा था कि रेप के आरोपियों को फांसी पर चढ़ाना गलत है। लड़के हैं, कभी कभी लड़कों से गलतियां हो जाती हैं।

उठाकर ले गए
बरेली के सीबीगंज इलाके में पस्तौर निवासी टीचर को कॉलेज जाते वक्त कुछ बदमाश नेशनल हाईवे से सेटी लिंक रोड से उठाकर ले गए। इसके बाद उसके साथ बलात्कार किया गया। इतना ही नहीं आरोपियों ने टीचर का अश्लील वीडियो भी बनाया। वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी पीडि़त को नग्न अवस्था में सड़क किनारे फेंककर फरार हो गए। इस घटना के बाद पुलिस महकमें में हड़कंप मचा हुआ है।

अखिलेश भी बेदम
अखिलेश यादव से उत्तर प्रदेश की जनता को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन वो उन पर खरा उतरने में नाकाम साबित हुए। मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश ने प्रदेश की कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने का भरोसा दिलाया था। आज इतने समय बाद भी वो सिर्फ भरोसा ही दिलाने की स्थिति में हैं। यूपी में हालात ये चुके हैं कि घर से बाहर निकलने में भी डर लगने लगा है। अपराधी बड़ी से बड़ी घटनाओं को अंजाम देने के लिए रात के इंतजार नहीं करते। बलात्कार, हत्या, डकैती जैसी वारदातें यूपी में आम हो गई हैं। अफसोस की बात तो ये है कि इतने सब के बाद भी अखिलेश और उनके मंत्री अपनी नाकामी स्वीकारने के बजाए विरोधियों पर ढीकरा फोड़ रहे हैं।

क्या तब भी यही बोलते?
आजम खान के बयान की जहां हर तरफ निंदा हो रही है। वहीं पीडि़ता के पिता ने सवाल किया है कि अगर आजम खान के साथ ऐसा होता तो क्या तब भी ऐसा बयान देते? पीडि़त के चाचा ने इस बयान के लिए आजम खान को पागल करार दिया है।

4 करोड़ का सोना पहनते हैं गोल्डन बाबा

आमतौर पर माना जाता है कि साधू सन्यासियों को मोह माया से कोई मतलब नहीं होता, लेकिन गोल्डन बाबा को देखकर ऐसा नहीं लगता। बाबा पर सोने के प्रति दीवानगी का आलम ये है कि वह लगभग 12.5 किलो सोने के आभूषण पहनते हैं। जिसकी कीमत golden babaबाजार में 4 करोड़ से ज्यादा है। इतना ही नहीं बाबा के हाथ में एक महंगी डायमंड घड़ी भी है, जिसकी कीमत 27 लाख के आसपास है। जाहिर सी बात है जब बाबा इतनी सोना पहनेंगे, तो उसकी सुरक्षा करनी पड़ेगी। इसलिए बाबा अपने साथ 10 बॉडीगार्ड लेकर चलते हैं। इसके अलावा बाबा जहां भी जाते हैं 200 अनुयायियों की फौज उनके साथ चलती है।

कभी कपड़े के व्यापारी थे
यूपी में कांवर या़त्री निकाल रहे बाबा का कारवां हरिद्वार में जहां से गुजरा उन्हें देखने वालों की भीड़ जमा हो गई। गोल्डन बाबा बनने पहले लोग उन्हें सुधीर कुमार कक्कड़ के नाम से जानते थे। किसी जमाने में उनका दिल्ली में कपड़ों का व्यापार था। सोने का शौक होने के चलते उनका नाम गोल्डन बाबा पड़ गया। बाबा के मुताबिक, पापों के प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने साधु बनने का फैसला लिया। वो हर साल 200 लड़कियों की शादी कराते हैं।