J&K आपबीतीः पहचान जाते तो हमें मार देते

जम्मू कश्मीर (J&K ) में हालात अब तक सामान्य नहीं हुए हैं। आतंकी बुरहान वानी की मौत के इतने दिनों बाद भी हिंसा बदस्तूर जारी है। भारत के इस स्वर्ग का दीदार करने के लिए जो लोग घाटी पहुंचे थे, उनमें से कई अब तक वहीं फंसे हुए हैं। जो किसी तरह वापस आने में सफल रहे, वो खुद को खुशनसीब मान रहे हैं। 60 वर्षीय पुणे निवासी चंद्रकांता मेहरा उन्हीं लोगों में से एक हैं। चंद्रकांता कुछ दिनों के लिए अपनी बेटी और दामाद से मिलने कश्मीर गईं थीं, लेकिन हिंसा के चलते उन्हें लंबे समय तक वहीं रहना पड़ा। चंद्रकांता के दामाद सशस्त्र बल में हैं और पिछले काफी वक्त से कश्मीर में पदस्थ हैं। आज का खबरी से बातचीत में चंद्रकांता ने अपनी आपबीती बयां कीः

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“मैं जुलाई के पहले सप्ताह में कश्मीर पहुंची। मेरे बेटी और दामाद मुझे उधमपुर स्टेशन पर लेने आ गए थे। वहां से हमने कार में श्रीनगर तक का सफर तय किया। हसीन वादिया, पहाड़ों का सीना चीरकर बनाई गईं सड़कें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वाकई मैं किसी स्वर्ग में हूं। कुछ घंटों की यात्रा के बाद हम घर पहुंचे। यहां कड़ा पहरा था। चप्पे चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात थे। थोड़ी देर के लिए मुझे समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों, लेकिन जल्द ही इसका जवाब मिल गया।

अगले दिन हमने खूबसूरत डल झील का दीदार किया। जो शिकारा केवल मैंने केवल फिल्मों में देखा था, उस पर सवार होना किसी सपने के पूरे होने जैसा था। शाम को जब घर पहुंचे तो पता ही नहीं था कि डूबते सूरज के साथ कश्मीर में मेरे हसीन पलों का सूरज भी डूबने वाला है। अगली सुबह खबर आई कि बाहर कुछ हुआ है। क्या हुआ है पता नहीं। जब मेरे दामाद आए तो पता चला कि एक आतंकवादी की मौत हुई है। हमने सोचा भी नहीं था कि एक आतंकी के लिए इस कदर लोग सड़कों पर उतर सकते हैं।

जलने लगा कश्मीर
देखते ही देखते पूरे कश्मीर में हिंसा शुरू हो गई। हर रोज किसी के मौत की खबर आती। वो इंसान जो न जाने खुद कितने लोगों की हत्या का दोषी था, उसकी मौत पर इस तरह बेगुनाहों को निशाना बनाते देखना बहुत दुखदायी था। कल तक जिस कश्मीर को मैंने स्वर्ग की तरह देखा था, वो चंद घंटों में ही नर्क से बदतर हो गया था। हमारा हर पल दहशत और खौफ के साये में गुजर रहा था। गनीमत बस इतनी थी कि हम सशस्त्र बलों के घेरे में थे। एक भी दिन ऐसा नहीं गया जब गोलियों का शोर और नारों की आवाज कानों में न पड़े हों। मुझे 20 जुलाई को वापस पुणे जाना था, लेकिन घर से बाहर निकलने के बारे में हम सोच भी नहीं सकते थे।

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पूरी दुनिया से अलग
पूरा एक महीना ऐसे ही घर पर बैठे बैठे गुजर गए। फोन पर कभी कभी पुणे बात हो जाया करती थी, वहां भी सब लोग बहुत चिंतित थे। फिर एक दिन फोन भी बंद कर दिए गए। हम बाकी दुनिया से पूरी तरह कट गए थे। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम अपने ही देश के किसी हिस्से में हैं। जो फोन जिंदगी का हिस्सा बन गया है, वो लंबे वक्त तक किसी शो पीस की तरह टेबल पर पड़ा रहा। पहली बार मैं इस तरह के माहौल का सामना कर रही थी। शाम होते ही प्रदर्शनकारी गेट के बाहर जमा होकर नारे लगाते थे। मुझे यह देखकर बेहद हैरानी हुई कि नारे लगाने वालों में बच्चे भी शामिल थे। मुंह पर कपड़ा बांधे, हाथों में पत्थर लिए वो क्यों उग्र भीड़ का हिस्सा बन रहे थे, इसका इल्म उन्हें खुद भी नहीं होगा।

काट दिए हाथ!
सुरक्षा बलों की मौजूदगी में जो प्रदर्शनकारी इस तरह नारेबाजी करते थे, उनकी गैरमौजूदगी में वो हमारे साथ क्या करते ये सोचकर भी मेरी रूह कांप जाती थी। 15 अगस्त के मद्देनजर हालात और बिगड़ने की आशंका थी, इसलिए मेरे दामाद ने कहा कि इससे पहले ही निकलना होगा। मौजूदा स्थिति में उधमपुर या जम्मू तक पहुंचना मुमकिन नहीं था, इसलिए हमने फ्लाइट से जाने का फैसला किया। हमारे घर से श्रीनगर एयरपोर्ट की दूरी मुश्किल से आधा घंटा थी। सारी तैयारियां हो चुकी थीं, मगर बाहर से आ रही खबरें हमें किसी एक निर्णय पर कायम होने नहीं दे रही थीं। जिस दिन हमें निकलना था उससे एक रोज पहले जो खबर आई, उसने कुछ देर के लिए मेरी सांसें रोक दीं। इस खबर में कितनी सच्चाई थी, ये तो नहीं पता लेकिन लोग चर्चा जरूर कर रहे थे कि किसी जवान के हाथ काट दिए गए हैं। वो जवान छुट्टी से वापस अपने कैंप लौट रहा था।

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अजनबी पर भरोसा
आखिरकार हमने 11 अगस्त को श्रीनगर से निकलने के फैसले पर मुहर लगाई। अब समस्या यह थी कि एयरपोर्ट तक कैसे पहुंचा जाए। भले ही एयरपोर्ट घर से 30 मिनट की दूरी पर था, लेकिन उग्र प्रदर्शनकारियों के बीच से वहां तक पहुंचना लगभग असंभव था। इसके अलावा सबसे बड़ा सवाल यह भी था कि हमें वहां तक लेकर कौन जाएगा। क्या कोई टैक्सी या रिक्शे वाला अपनी जान जोखिम में डालेगा? सुरक्षा बलों के वाहनों को देखते ही प्रदर्शनकारी बेकाबू हो जाते थे, इसलिए हमें एयरपोर्ट किसी प्राइवेट वाहन से ही जाना था। हमने पास में ही रहने वाले एक टैक्सी ड्राइवर से बात की, पहले तो उसने इंकार कर दिया। मगर थोड़े अनुरोध के बाद वो तैयार हो गया। उसने हमसे कहा कि आपकी फ्लाइट का समय चाहे जो हो, हमें सुबह की पहली अज़ान से पूर्व एयरपोर्ट पहुंचना होगा। क्योंकि अज़ान होते ही प्रदर्शनकारी सड़कों पर कब्जा जमा लेते हैं। हमारी फ्लाइट सुबह आठ बजे थी, लेकिन हमें घर से रात तीन बजे निकलना पड़ा। ड्राइवर पर भरोसा करें या नहीं ये उलझन हमारे दिमाग में थी, पर हमारे पास उस पर भरोसा करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था।

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हम घिर चुके थे
इस बात की प्रबल संभावना थी कि अगर ड्राइवर जिहादी सोच से इत्तेफाक रखता होगा, तो वो हमें एयरपोर्ट के बजाए कहीं और ले जाए। क्योंकि प्रदर्शनकारी सुरक्षा बल को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझते हैं। अब तक जिन जवानों के साये में मैं खुद को महफूज महसूस कर रही थी, उस सुरक्षा घेरे से बाहर निकलना एक अजीब सा डर पैदा करने वाला था। सर्द हवाओं में भी मेरे माथे पर पसीना था। हमारी कार सुनसान सड़कों पर दौड़ती जा रही थी, मेरे मन में बस यही सवाल चल रहा था कि 30 मिनट कब पूरे होंगे। तभी अचानक ड्राइवर ने ब्रेक लगाए। सामने कुछ लोग खड़े थे। ड्राइवर ने हमसे सोने का नाटक करने को कहा। अधिकतर लोगों ने अपना चेहरा ढंका हुआ था। उन्होंने कश्मीरी भाषा में ड्रावइर से कुछ कहा। शायद हमारे बारे में पूछ रहे थे। ड्राइवर कार से उतरकर उनसे बात करने लगा। हमारी धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। अगले पल क्या होने वाला है, हमें कुछ पता नहीं था। डर के चलते मेरे हाथ पैर कांपने लगे थे। लगभग 5-6 मिनट के बाद ड्राइवर वापस आया और हम वहां से आगे बढ़ दिए। ड्राइवर हमारी पहचान बता देता तो शायद वो हमें मार देते।

सबसे खौफनाक अनुभव

ये 6 मिनट मेरी जिंदगी का सबसे खौफनाक अनुभव थे। हालांकि मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई थीं। हम थोड़ा सा ही आगे बढ़े होंगे कि एक पत्थर कार की खिड़की के ठीक ऊपर लगा। अगर वो जरा सा भी नीचे लगता तो शायद हमें चोट लग सकती थी। ड्राइवर भी समझ नहीं पा रहा था कि इतनी रात में पत्थर कौन फेंक रहा है। चंद ही सेकंड में उसे इस सवाल का जवाब मिल गया। बाइक पर सवार तीन लड़के तेजी से हमारी कार के पास आ रहे थे। वो शायद हमें रोकना चाहते थे, मगर ड्राइवर ने स्पीड बढ़ा दी। अगले कुछ मिनटों में हम एयरपोर्ट पहुंच गए। एक दिल दहलाने वाले सफर के समाप्त होने की खुशी मेरे चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। हमने ड्राइवर का शुक्रिया अदा किया और अंदर आ गए। अपनी इस कश्मीर यात्रा और उस कश्मीरी ड्राइवर को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी”।

J&K: जवानों के साथ बर्बरता!

जम्मू कश्मीर (J&K) में हालात सुधरने के बजाए और बिगड़ते जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों द्वारा सुरक्षाबलों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। खबर है कि चंद रोज पहले कुछ स्थानीय लोगों ने एक सीआरपीएफ जवान के साथ बर्बर सलूक किया। उसे आर्मी J&Kअस्पताल में भर्ती कराया गया है। जवान छुट्टी से वापस लौट रहा था। हालांकि अभी आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है। इससे पहले एक जवान को गोली मारने की भी खबर मिली थी। सूत्र बताते हैं कि सीआरपीएफ जवान कश्मीर स्थित अपने कैंप वापस लौट रहा था। तभी कुछ लोगों ने उसे रास्ते में रोक लिया। जवान ने अपनी पहचान छिपाने की कोशिश की, लेकिन उसका आई कार्ड हमलावरों की नजर में आ गया। इसके बाद उन्होंने जवान को बेरहमी से मारापीट और फिर उसे धारधार हथियारों से घायल कर दिया। पीडि़त जवान को गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

विशेष निर्देश
कश्मीर स्थित सुरक्षाबलों के कैंप के आसपास बड़ी संख्या में एकट्ठा होकर प्रदर्शनकारियों द्वारा नारेबाजी की जा रही है। इसके मद्देनजर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। प्रदर्शनकारी आजादी, आजादी, कश्मीर लेकर रहेंगे जैसे नारे लगा रहे हैं। खबरें हैं कि पाकिस्तान से कुछ आतंकी घाटी में दाखिल हो चुके हैं और उनके निशाने पर सुरक्षा बल हैं। प्रदर्शनकारियों के रूप में वही जवानों पर हमले कर रहे हैं ताकि और हिंसा भड़काई जा सके। इसे देखते हुए सुरक्षा बलों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं।

उखाड़ रहे सड़कें
सुरक्षा बलों की परेशानी बढ़ाने के लिए प्रदर्शनकारियों द्वारा सड़कें खोदी जा रही हैं। रात के वक्त उपद्रवी बाहर निकलते हैं और प्रमुख सड़कों को खोद देते हैं। कहीं कहीं तो इसके लिए बाकायदा बुल्डोजर की मदद भी ली जा रही है। सड़कें खुदी होने के चलते सुरक्षा बलों को एक स्थान से दूरे स्थान तक पहुंचने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कर्फ्यू के बावजूद उपद्रवी इस तरह की वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।

दगा किया तो मिली गोली!

हिजबुल आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद से कश्मीर घाटी सुलग रही है। स्थानीय तौर पर दावा किया गया है कि वानी के जनाजे में 2 लाख लोग शामिल हुए, इससे वानी की फैन फॉलोइंग का अंदाजा लगाया जा सकता है। वानी ने घाटी में थोड़े ही वक्त में vaniखुद को एक हीरो के तौर पर स्थापित कर लिया था। उसके चाहने वालों में महिलाओं की संख्या भी काफी ज्यादा थी। वानी मूलरूप से श्रीनगर से 50 किलोमीटर दूर शरीफाबाद नामक गांव का रहने वाला था। इस गांव तक पहुंचने का रास्ता जिस तरह से टेड़ामेड़ा है, उसी तरह से वानी की जिंदगी भी चरमपंथ की आड़ी तिरछी राहों से होते हुए सुरक्षा बलों की गोली पर जाकर खत्म हुई।

   कहा जा रहा है कि वानी को सुरक्षाबल केवल इसलिए निशाना बना सके क्योंकि उसकी गर्लफ्रेंड ने उसके ठिकाने के बारे में सूचना दी थी। हालांकि ये बात अलग है कि घाटी के लोग इस बात पर यकीन नहीं करते। उनके मुताबिक बुरहान वानी के साथ चंद पल बिताने के लिए लड़कियां अपना सबकुछ कुर्बान करने को तैयार रहती थीं। ऐसे में यह जानते हुए भी कि सुरक्षा बल उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे, कोई क्यों भला मुखबरी करेगा। वैसे वानी की आशिक मिजाजी के किस्से श्रीनगर से लेकर शरीफाबाद तक फैले हैं। उसके कई महिलाओं से संबंध थे। अपनी कदकाठी और चरपमंथी विचारधारा वाले समुदाय में फिली शौहरत के चलते वह हर थोड़े वक्त में माशूका बदलता रहता था। लड़कियां इस बात को बखूबी जानती थीं कि वानी ज्यादा वक्त तक उनके साथ नहीं रहेगा बावजूद इसके वो रिश्ता बनाने को तैयार हो जाती थीं।

साथी से किया दगा
वानी के खिलाफ घाटी में कोई कुछ सुनना, बोलना नहीं चाहता। जो उसकी विचारधारा से सहमत नहीं हैं, वो भी खामोश रहना पसंद कर रहे हैं। उन्हें लगता है यदि उन्होंने कुछ कहा तो उनकी जिंदगी खतरे में पड़ सकती है। हालांकि दबी जुबान में वो यह स्वीकारते हैं कि वानी की रंगीन मिजाजी के चलते अंदरूनी तौर पर असंतोष बढ़ रहा था। ऐसी चर्चा है कि वानी ने अपने साथी की गर्लफ्रेंड के साथ भी संबंध बनाए थे। जिसके चलते दोनों में विवाद हुआ था। वानी के ठिकाने के बारे में उसकी महबूबाओं को कोई जानकारी नहीं होती थी, केवल साथी जानते थे कि वो कब कहां जाएगा। लिहाजा स्थानीय लोगों को लगता है कि वानी से नफरत करने वाले उसके किसी साथी ने ही मुखबरी की और गर्लफ्रेंड वाला मामला उछाल दिया ताकि उस पर किसी को शक न हो।

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लगते थे पोस्टर
22 वर्षीय वानी अपनी आतंकी सोच के चलते घाटी में पोस्टरबॉय बन गया था। आलम ये था कि वानी के पोस्टर घरों में लगे मिल जाया करते थे। सोशल मीडिया पर सक्रिय वानी का स्थानीय नेटवर्क बेहद मजबूत था। घाटी के किस घर में क्या हो रहा है, उसे हर बात की जानकारी थी। वैसे ऐसा नहीं है कि पूरी की पूरी घाटी उसे पसंद करती थी। अमन पसंद लोग वानी की सोच के विस्तारित रूप को देखकर चिंतित भी थे और आक्रोषित भी। हालांकि ये बात अलग है कि उनकी संख्या बेहद सीमित थी। कहा जाता है कि वानी बीच बीच में युवाओं से प्रत्यक्ष तौर पर मुखातिब होता था। वो तब तक उन्हें बरगलाता था, जब तक कि वो जिहाद के इस रूप को अपना नहीं लेते।

भाई के नाम पर
कहा जाता है कि वानी ने 2010 में घाटी में हुई हिंसा का हवाला देकर बंदूक उठाई। उस दौरान पुलिस के साथ संघर्ष में वानी का भाई घायल हुआ था, जिसका प्रतिशोध लेने के लिए वो आतंकी बन गया। हालांकि स्थानीय लोग बताते हैं कि वो बचपच से ही चरमपंथी विचारधारा से प्रभावित था।  पाकिस्तान से भारत के प्रति आग उगलने वाले आतंकी वानी के हीरो हुआ करते थे। 2010 में जो हुआ, उसने केवल बुरहान वानी को जल्दी बंदूक उठाने के लिए प्रेरित किया।

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कई पुलिसकर्मी लापता
घाटी में हिंसा के बाद से अब तक कई पुलिसकर्मी लापता हैं। आशंका जताई जा रही है कि प्रदर्शनकारियों ने उन्हें अगवा कर लिया है। जो सुरक्षाकर्मी हिंसा में घायल हुए थे उनमें से कुछ ही हालत गंभीर बताई जा रही है। सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बीच प्रदर्शनकारी सड़कों पर फैले हैं।

जानें कैसे धधका कश्मीर
स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर कैसे नफरत और हिंसा की आग में जला, कैसे कश्मीर के युवाओं ने अमन परस्ती के बजाए पाकिस्तान के बहकावे में आकर बंदूक को अपना साथ बनाया। इस तरह के कई सवालों के जवाब आप कश्मीर पर लिखी गईं किताबों से प्राप्त कर सकते हैं। यहां हम आपकी सहायता के लिए कुछ किताबों के लिंक दे रहे हैं। जो एमाजोन पर काफी सस्ते दामों में उपलब्ध हैं।