UP: कांग्रेस की गलती से खिल सकता है कमल

उत्तर प्रदेश (UP) में जिस तरह चुनाव से पहले कांग्रेस और सपा का गठबंधन कोई असामान्य घटना नहीं लगी, उसी तरह चुनावी नतीजे भी कुछ खास चौंकाने वाले नहीं होंगे। यादव कुनबे में टकराव के बाद से यह काफी हद तक साफ हो गया था कि राहुल गांधी साइकिल की सवारी कर सकते हैं और कुछ यही स्थिति अखिलेश यादव के लिए भी थी। मौजूदा वक्त में सपा और कांग्रेस किसी के लिए अपने बूते सियासत के समुंदर को पार करना मुमकिन नहीं है। दोनों ही पार्टियां नाकामयाबियों के साये से घिरी हुई हैं। फर्क बस इतना है कि कांग्रेस पहले लोकसभा और फिर विधानसभा चुनावों में नाकामयाब रही जबकि अखिलेश जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकामयाब रहे। दोनों दलों के नेताओं को उम्मीद है कि यह नया समीकरण मतदाताओं को उनकी ओर खींचकर लाने में कारगर साबित होगा। हालांकि, इसकी संभावना बेहद कम है।

up    अब तक जितनी बार भी उत्तर प्रदेश की जनता का दिल टटोला गया है, उसमें सपा और कांग्रेेस के लिए लगभग एक जैसे ही भाव सामने आए हैं। अखिलेश मोदी सरकार के अच्छे दिनों पर तंज कस रहे हैं, लेकिन अपने आवाम का दर्द उन्हें नज़र नहीं आता। पांच साल तक विकास के पहिएं को जंजीरों पर जकड़कर रखने वाले सीएम साहब की धर्मपत्नी अब उस आगरा को पेरिस बनाने का ख्वाब दिखा रही हैं जो ताजमहल होने के बावजूद बिजली, पानी और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है।

अपना घर भी देखें
अखिलेश से जनता को उम्मीदें काफी ज्यादा थीं, इसलिए सपा को पूर्ण बहुमत मिला, लेकिन राज्य के हालात बसपा काल से बेहतर साबित नहीं हुए। लिहाजा ये कहना गलत नहीं होगा कि यूपी में हवा साइकिल के विपरीत चल रही है। इसी तरह बसपा का भी चुनाव में असर छोड़ना बेहद मुश्किल है। अपने पिछले कार्यकाल में मायावती ने विवादों में रहने के अलावा शायद ही कोई ऐसा काम किया हो, जिसके लिए जनता उन्हें एक बार फिर चुनने की हिम्मत जुटा पाए। यूपी का सियासी माहौल और कुछ हद तक केंद्र की मोदी सरकार को लेकर उपजा गुस्सा इस बार कांग्रेस के काम आ सकता था, मगर पार्टी ने खुद ही अपने भाग्य की लकीरों को मिटाने की कोशिश कर डाली। कांग्रेस ने राज बब्बर और शीला दीक्षित को यूपी की कमान सौंपी, जबकि दोनों ही पूरी तरह बैकफुट पर जा चुके हैं। आगरा से सांसद रहे राज बब्बर के प्रति लोगों  में जो दिलचस्पी थी, वो सालों पहले ही खत्म हो चुकी है। बतौर सांसद बब्बर ने जनता दरबार लगाने के अलावा कुछ खास नहीं किया, आगरे की इस लड़के ने अपने शहर को जिस तरह से ठेंगा दिखाया था उसे लोग अब तक भूले नहीं हैं। वहीं, शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री के तौर पर काफी नकारात्मक प्रसिद्धि हासिल कर चुकी हैं। ऐसे में जनता के सामने भाजपा के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

गलती का फायदा
upकुछ वक्त पहले अगर यूपी चुनाव होते तो भाजपा को जीत अपने कर्मों की वजह से मिलती, लेकिन इस बार वो विकल्प न होने की स्थिति में विकल्प बनेगी। नोटबंदी को लेकर भले ही पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बढ़त के सपने देख रहा हो पर जमीनी कार्यकर्ता जानते हैं कि एक बड़ा तबका भाजपा से नाराज है और इसमें केवल कालेधन वाले ही नहीं वो आम आदमी भी शामिल है जिसके या तो अपने उससे बिछड़ गए या वो दाने दाने के लिए मोहताज हो गया।

पुरानी कार्यशैली
नोटबंदी के चलते होने वाली मौतांे में यूपी की हिस्सेदारी भी कम नहीं है, इसके अलावा महंगाई को लेकर मोदी सरकार की मनमोहन सिंह सरीखी कार्यशैली से भी लोग खफा हैं। इन सबका फायदा कांग्रेस को मिल सकता था, लेकिन राणनीतिकारों ने अपने हाथों से ही अपनी संभावनाओं को खत्म कर दिया। खुद कांग्रेसी इस बात को मानते हैं कि अलाकमान ने यूपी में पार्टी का जो चेहरा पेश किया है उसके आधार पर वोट हासिल करना बेहद मुश्किल है। बहरहाल असल स्थिति का पता तो चुनाव बाद चलेगा, लेकिन जनता की सोच, उसके विचारों को जितना हमने जाना और समझा है, उससे तो यही लगता है कि कांग्रेस की गलती का फायदा भाजपा उठाएगी।

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