UP: भीड़ तो जुटाई, क्या वोट दिला पाएंगे?

उत्तर प्रदेश (UP) में 6  चरणों की वोटिंग हो चुकी है और अब महज़ एक चरण बाकी है। लिहाजा सभी पार्टियां जोरशोर से मतदाताओं को लुभाने के प्रयासों मे लगी हुई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां सपा और कांग्रेस के राजकुमारों के पुराने भाषणों का जिक्र करके जनता को यह बताने में लगे हैं कि समझदारी कि बातें केवल भाजपाईयों के मुख से निकलती हैं, वहीं अखिलेश और राहुल यह साबित करने में जुटे हैं कि मोदी को मसखरी के अलावा कुछ नहीं आता। अब तक यूपी में जितनी वोटिंग हुई है, उसने राजनीतिक पंडितों को मुश्किल में डाल दिया है। पहले चरण में करीब 63, दूसरे में 65, तीसरे में 61, चौथे में 60.37 और पांचवें में 57.36% वोट पड़े। आमतौर पर ज्यादा मतदान को  सरकार में बैठी पार्टी के खिलाफ जनादेश समझा जाता है, लेकिन ऐसा होगा ही इसकी कोई गारंटी भी नहीं है। जनसंघ के ज़माने में भगवा नेता इस भ्रम को टूटते देख चुके हैं। फिर भी सम्भावना इस  बात की ज्यादा है कि भाजपा उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की स्थिति में आ जाये।

यूपी की जनता सपा और बसपा दोनों को पूर्ण बहुमत देकर परख चुकी है, और ये कहना गलत नहीं होगा कि दोनों ही बार उसे निराशा हाथ लगी। बात चाहे कानून व्यवस्था की हो या विकास की, राज्य की तस्वीर लगभग वैसी ही रही। सपाई मेट्रो को और बसपाई बड़ी-बड़ी आदमकद प्रतिमाओं को विकास का नाम दे सकते हैं, लेकिन यूपी सिर्फ कुछ शहर या जिलों तक ही सीमित नहीं है। आज भी राज्य की आबादी का एक बड़ा हिस्सा मूलभूत सुविधाओं की बांट जोह रहा है। यह बात अलग है कि फाइलों और सरकारी विज्ञापनों में यूपी कब का उत्तम प्रदेश बन चुका है।

धुंधली हुई उम्मीद

कांग्रेस-सपा और बसपा को उम्मीद है कि नोटबंदी उनके वोटों के उलझे गणित को सुलझा सकती है, लेकिन महाराष्ट्र में बीते दिनों हुए नगर पालिका चुनावों के परिणामों ने इस उम्मीद को काफी हद तक धुंधला कर दिया है। वैसे तो यूपी और महाराष्ट्र का कोई सीधा जुड़ाव नहीं है, मगर इससे नोटबंदी के प्रति जनता के रुख को ज़रूर समझा जा सकता है। कांग्रेस के साथ-साथ शिवसेना भी ये मानकर चल रही थी कि भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा पर हुआ इसके बिल्कुल विपरीत। भाजपा को जितनी सफलता प्राप्त हुई है, उसका अनुमान खुद पार्टी नेता नहीं लगा पाए थे। वैसे सपाई और कांग्रेसी अखिलेश एवं राहुल की रैलियों में उमड़ रही भीड़ को देखकर बेहद उत्साहित हैं, उन्हें लगता है कि ये भीड़ वोटों में तब्दील हो सकती है। हालांकि कम से कम राहुल के मामले में तो ये उम्मीद बेमानी नज़र आती है।

ख़राब इतिहास

पिछले साल पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में राहुल की सभाओं में इससे भी ज्यादा भीड़ देखने को मिली थी, पर उन्हें वोट नहीं मिल पाए। राहुल का व्यक्तित्व कुछ हद तक एक ऐसे नेता का बन गया है, जिसके साथ लोग फोटो खिंचवाना तो पसंद करते हैं, लेकिन वोट देना नहीं। महाराष्ट्र के संदर्भ में इसे राज ठाकरे से जोड़कर देखा जा सकता है। रही बात अखिलेश की तो भीड़ और वोटों का समीकरण उनके लिए क्या रहता है ये 11 मार्च को ही पता चलेगा, वैसे बतौर मुख्यमंत्री जूनियर यादव का रिकॉर्ड इतना शानदार नहीं रहा है उन्हें उम्मीदों के अनुरूप वोट हासिल हो।

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