क्या दलित राष्ट्रपति दलितों का भला कर पाएंगे?

रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं. उनके नाम की चर्चा उनकी काबिलियत से ज्यादा इस बात को लेकर थी कि वो दलित हैं. भाजपा की देखादेखी कांग्रेस ने भी दलित कार्ड खेलते हुए मीरा कुमार को मैदान में उतारा था, हालांकि उन्हें सफलता नहीं मिली. कोविंद की जीत पर उनके गांव और दलित समुदाय में ख़ुशी की लहर है, लेकिन क्या यह ख़ुशी किसी तरह के लाभ में परिवर्तित हो सकती है? हमारे संविधान में राष्ट्रपति को जो अधिकार प्राप्त हैं, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि दलित राष्ट्रपति से दलितों का कुछ भला होने वाला नहीं है. हां, इतना ज़रूर है कि इससे भाजपा के दलित वोट बैंक में इजाफा ज़रूर हो सकता है.

संविधान के अनुसार राष्ट्रपति केवल सरकार को मशविरा दे सकते हैं और पुनर्विचार के लिए कह सकते हैं, अगर सरकार इंकार कर दे तो उनके पास सहमति देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह जाता. देश के पहले राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद इस पीड़ा को समझते थे. उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि हमें आंख बंद करके ब्रिटेन के पदचिन्हों पर नहीं चलना चाहिए, राष्ट्रपति के अपने कुछ अधिकार होने चाहिए. उस दौर में जवाहरलाल नेहरु और प्रसाद के बीच मतभेद जगजाहिर थे, नेहरू ने राजेन्द्र प्रसाद के 10 साल के कार्यकाल में उनकी कोई बात नहीं मानी.

वैसे भी ज्यादा सलाह-मशविरा देने वाले राष्ट्रपति सरकार को पसंद नहीं आते. अब्दुल कलाम तकरीबन हर बिल पर सरकार को सलाह देते थे. इसी वजह से बेहद लोकप्रिय होने के बावजूद कांग्रेस ने उन्हें दूसरी बार रायसीना हिल्स भेजना मुनासिव नहीं समझा. उनकी जगह कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बना दिया. हमारे राष्ट्रपति की स्थिति इंग्लैंड की महारानी जैसी होती है, जिसके पास कोई ख़ास अधिकार नहीं होते. लिहाजा राष्ट्रपति की कुर्सी पर चाहे दलित बैठे या कोई और होगा वही जो सरकार चाहेगी.

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