आखिर क्यों हार रहे हैं केजरीवाल?

दिल्ली नगर निगम चुनावों में आप आदमी पार्टी को शिकस्त का सामना करना पड़ा. एग्जिट पोल भी कुछ ऐसे ही इशारे कर रहे थे. इस हार के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या आम आदमी पार्टी अपने शुरूआती बिंदु पर पहुंचने वाली है? क्या अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक करियर ख़त्म हो गया है? इन सवालों पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि हार और जीत केवल राजनीति ही नहीं बल्कि हर मुकाबले की हकीकत है. और यह ज़रूरी नहीं कि हारने वाला फिर से खड़े होने का साहस न जुटा पाए. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आज जिस दौर से गुज़र रही हैं, भाजपा भी उस दौर से गुज़र चुकी है. इसलिए अरविंद केजरीवाल के पास भी वापसी का मौका है और आगे भी रहेगा, जब तक कि वो खुद अपनी पारी समाप्ति की घोषणा नहीं करते. दिल्ली नगर निगम पर इससे पहले भी भाजपा का कब्ज़ा था, इसलिए यदि वो हारती तो उसे आप से ज्यादा आघात लगता. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह शिकस्त केजरीवाल और उनकी पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं. क्योंकि इससे यह प्रत्यक्ष तौर पर नज़र आता है कि जनता आम आदमी पार्टी से मुंह मोड़ रही है. लेकिन इसकी क्या वजह है? क्या केजरीवाल ने अपने वादे पूरे नहीं किए? क्या आप के विधायक और कार्यकर्ताओं ने वैसी ही दबंगई दिखाई, जैसी आजकल यूपी में भाजपाई या उससे पहले सपा और बसपा कार्यकर्ता दिखाते थे? अगर नहीं, तो फिर केजरीवाल में विश्वास दिखाने वाली दिल्ली की जनता एकाएक से उनके खिलाफ कैसे हो गई?
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सूरत तो बदली है
इससे शायाद ही कोई इंकार करे कि केजरीवाल राज में दिल्ली का विकास हुआ है. जिन सरकारी स्कूलों को हिकारत की नज़रों से देखा जाता था, वहां की स्थिति न केवल सुधरी है, बल्कि नई संभावनाएं भी वहां जन्म ले रही हैं. मोहल्ला क्लीनिक के रूप में लोगों को एक ऐसा डॉक्टर मिल गया है, जो बेवजह के चक्कर नहीं लगवाता और ना ही बेवजह जेब ढीली करने पर जोर देता है. सड़कों पर रात गुजरने वालों को भी अच्छे शेल्टर नसीब हो रहे हैं. ख़ास बात यह है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों पर भी ध्यान दिया जा रहा है, जो सबसे ज़रूरी और अहम् है. आमतौर पर शिक्षक भी सरकारी ढर्रे में शामिल हो जाते हैं और बच्चों की नैया राम भरोसे आगे बढ़ती रहती है. जैसे कि देश के अधिकांश सरकारी स्कूलों में हो रहा है. दिल्ली के लोग इस बदलाव को महसूस भी कर रहे हैं, लेकिन ये अहसाह अगर वोट में तब्दील नहीं हो सका तो इसकी वजह काफी हद तक आम आदमी पार्टी की कलह और केजरीवाल खुद हैं.

ऐसी पार्टी क्यों चुनें?
दिल्ली में ताजपोशी के बाद से ही लगभग हर सुबह आम आदमी पार्टी से किसी की विदाई का संदेश लेकर आई. गोपाल राय, योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण से लेकर अलग-अलग इकाई के छोटे-बड़े कई नेता पार्टी से अलग होते गए. पिछले कुछ वक़्त से तो पार्टी धधकते माहौल से गुज़र रही है, जिसका धमाका नगर निगम में मिली हार के साथ ही हो गया है. केजरीवाल के सबसे ख़ास कहे जाने वाले कुमार विश्वास भी अपने कवि अंदाज़ में भाजपा को निशाना बनाते-बनाते पार्टी मुखिया पर तीर दाग रहे हैं. और आशुतोष जैसे दूसरे नेताओं के साथ केजरीवाल के संबंधों में भी खिंचाव है. सीधे शब्दों में कहें तो पार्टी बिखराव के रस्ते पर चल निकली है और ऐसी स्थिति में उसके लिए जीत हासिल करना लगभग नामुमकिन है. जनता एक ऐसी पार्टी से अपनी समस्याएं सुलझाने की उम्मीद कैसे कर सकती है, जो खुद के झगड़े ही नहीं सुलझा पा रही है. जिसके नेता अपनी ही पार्टी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं. फिर भले ही विरोधी पार्टियां उससे कमतर क्यों न हों. मुंबई हमले के वक़्त देश में कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा था, महंगाई पहले से ही यूपीए सरकार की नींव कमज़ोर कर रही थी, बावजूद इसके जनता ने भाजपा को नकारते हुए कांग्रेस को दोबारा चुना. इसकी वजह महज इतनी ही थी कि भाजपा में आंतरिक कलह अपने चरम पर थी और लाख बुराइयों के बावजूद कांग्रेस एक अनुशासन वाली पार्टी बनी हुई थी.

इतने नकारात्मक क्यों?
इसके अलावा अरविंद केजरीवाल की नकारात्मक राजनीति भी जनता की नज़रों में आप की चमक को फीका करने में लगी है. सुधारों की बात करने वाले केजरीवाल अब राजनीति के कमाल खान बनते जा रहे हैं, जिन्हें हर मुद्दे पर हवा का रुख विरोधी पार्टियों की ओर मोड़ना है. चाहे सर्जिकल स्ट्राइक हो या नोटबंदी केजरीवाल प्रत्यक्ष तौर पर नरेंद्र मोदी को निशाना बनाते रहे, ये जानते हुए भी कि देश नोटबंदी के फैसले का समर्थन कर रहा है. बुलेट ट्रेन को भी केजरीवाल ने बेकार साबित करने में देर नहीं लगाई, और गोवा एवं पंजाब विधानसभा चुनावों में हार के लिए ईवीएम पर उंगली उठाना शुरू कर दिया. नगर निगम चुनाव में शिकस्त को भी वो इसी नज़रिए से देख रहे हैं. केजरीवाल की बातों में सच्चाई है या नहीं, विषय अब यह नहीं रह गया है, बल्कि यह हो गया है कि आखिर केजरी इतने नकारात्मक क्यों हैं? आप सोशल मीडिया पर देख लीजिये, लोग यही सवाल केजरीवाल से कर रहे हैं. ये वही सोशल मीडिया है, जिसने दिल्ली में आप की जीत में अहम् किरदार निभाया था. नगर निगम हार आम आदमी पार्टी के लिए एक सबक है, और यदि उसने इससे भी कुछ नहीं सीखा, तो परिणाम ज्यादा घातक होंगे.

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